दो गज़ ज़मीन नहीं नसीब लोगों को

  • 18 अक्तूबर 2016

इटावा ज़िला मुख्यालय से क़रीब चालीस किलोमीटर दूर स्थित चकरनगर इलाक़े में एक बस्ती है तखिया.

इस बस्ती की रहने वाली सुशीला बेग़म काफी दुखी होकर कहती हैं, "हमें न धन चाहिए, न दौलत चाहिए, न ही कुछ और चाहिए. हमें तो सिर्फ़ दो गज़ ज़मीन चाहिए. लेकिन हम इतने दुर्भाग्यशाली हैं कि हमें वो भी मयस्सर नहीं. "

यह तक़लीफ़ सिर्फ़ सुशीला बेग़म की नहीं है. बस्ती में रहने वाले क़रीब 70-80 मुस्लिम परिवारों को भी यही परेशानी है. वे अपने छोटे से घरों या यों कहें कि घरनुमा कमरों में ही अपने पुरखों की क़ब्र बनाने के लिए मजबूर हैं.

सुशीला बेग़म से हमारी मुलाक़ात तब हुई जब वो क़ब्र के ही बग़ल में बनी अपनी रसोई में मिट्टी के चूल्हे पर खाना पका रही थीं. चूल्हे से निकलते धुएं से तो उनके आंसू नहीं निकले लेकिन इन क़ब्रों के बारे में बताते हुए वे फूट-फूट कर रोने लगीं.

वो कहती हैं, "वैसे तो कोई अपना मर जाता है तो इंसान कुछ दिन रोता है, फिर उसकी यादें धुंधली होती जाती हैं. लेकिन इन क़ब्रों के हमेशा सामने होने के कारण हमेशा अपनों के मरने की ही घटना दिखती है. हम जब भी क़ब्रों को देखते हैं, बातें ताज़ा हो जाती हैं."

यही नहीं, इस बस्ती में कई ऐसे भी घर हैं जहां कमरे में एक ओर क़ब्र है तो दूसरी ओर सोने का बिस्तर लगा है. यानी बेडरूम और क़ब्रिस्तान एक साथ हैं.

तखिया बस्ती के ही यासीन अली बताते हैं, "हम सभी मज़दूरी करते हैं. किसी के पास ज़मीन है ही नहीं. सालों पहले ग्राम समाज से घर के लिए जो ज़मीनें मिली थीं, परिवार बढ़ने के साथ वो कम पड़ने लगीं. पहले हम खाली ज़मीनों पर शव दफ़नाते थे, लेकिन बाद में जगह नहीं मिलने के कारण घरों में ही दफ़नाना पड़ रहा है."

ऐसा नहीं है कि इस बात की किसी को जानकारी न हो. ये समस्या नई नहीं बल्कि सालों पुरानी है. ये बस्ती फ़कीर मुसलमानों की है. बस्ती के लोगों का कहना है कि इसके लिए हमने हर जगह दरख़्वास्त दी, लेकिन आज तक कोई सुनवाई नहीं हुई.

क़ब्रिस्तान की इतनी बड़ी समस्या यहां तब है जब कि इसी इटावा ज़िले में राज्य का ही नहीं बल्कि देश का सबसे ताक़तवर राजनीतिक परिवार रहता है. राज्य में उसी परिवार और उनकी पार्टी की सरकार है.

वहीं जब इस बारे में हमने चकरनगर गांव के प्रधान राजेश यादव से बात की तो उनका कहना था कि गांव में ऐसी कोई खाली ज़मीन है ही नहीं, जिसे क़ब्रिस्तान के लिए दिया जा सके.

राजेश यादव बताते हैं, "ये गांव सड़क से बिल्कुल लगा हुआ है और काफी घना बसा हुआ है. हालांकि हमने कुछ दूर पर इन लोगों को क़ब्रिस्तान के लिए ग्राम समाज की खाली ज़मीन दी. लेकिन वो क़रीब सात किलोमीटर दूर है और ये लोग उतनी दूर शव दफ़नाने के लिए जाना नहीं चाहते हैं."

राजेश यादव कहते हैं कि पास की ग्राम पंचायत में कुछ जगह है, जो यहां से नज़दीक भी है, उसे उपलब्ध कराने के लिए बात हो रही है.

ज़िले के प्रशासनिक अधिकारी भी तखिया में क़ब्रिस्तान न होने की बात से वाक़िफ़ हैं लेकिन वो भी यही समस्या बता रहे हैं जो कि ग्राम प्रधान राजेश यादव ने बताई.

इटावा के ज़िलाधिकारी शमीम अहमद खान कहते हैं, "आस-पास खाली ज़मीन है ही नहीं. किसी की निजी ज़मीन दी नहीं जा सकती है. कुछ दूर पर ज़मीन मुहैया कराई गई थी लेकिन वहां ये लोग क़ब्रिस्तान बनाने को राज़ी नहीं है."

ज़िलाधिकारी कहते हैं कि डेढ़ किमी. दूर चंदई गांव में कब्रिस्तान के लिए उपलब्ध ज़मीन पर शव दफ़नाने के लिए लोगों को मनाने की कोशिश हो रही है.

तखिया बस्ती की कुछ महिलाएं बताती हैं कि बच्चे अकसर रात में जग जाते हैं क्योंकि कई घरों में क़ब्रें बिस्तर के बिल्कुल पास में ही बनी हुई हैं.

वहीं रहीम मियां के घर के थोड़ा बाहर उनके पिता की क़ब्र बनी हुई है. क़ब्र के ऊपर हुई पुताई से पता चलता है कि ये नई बनी है. क़ब्र के ऊपर एक छोटा बच्चा खेल रहा था.

रहीम बताते हैं कि डेढ़ साल पहले उनके पिता का देहांत हुआ था. सामने ही क़ब्र है जिससे हर समय वो लम्हा याद आता है.

बस्ती के लोग बताते हैं कि इस्लाम धर्म के अनुसार क़ब्र और घर एक जगह नहीं होने चाहिए, लेकिन जगह न होने के कारण वो ऐसा करने को मजबूर हैं. इन लोगों का ये भी कहना है कि बस्ती में क़रीब 250-300 लोग रहते हैं लेकिन आस-पास कोई मस्जिद भी नहीं है.

लोगों का कहना है कि इस बारे में उन्होंने अपने धार्मिक नेताओं और मौलवियों से भी बात की लेकिन उनकी ओर से भी कोई ख़ास मदद नहीं मिली.

बहरहाल, प्रशासन और स्थानीय जनप्रतिनिधि तखिया बस्ती के लोगों के लिए आस-पास ही किसी क़ब्रिस्तान के इंतज़ाम में लगे हैं. लेकिन अभी तो इनकी यही मांग है कि मरने के बाद अपनी मातृभूमि में दफ़न होने के लिए इन्हें कम से कम दो गज़ ज़मीन तो मिल जाए.

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