भारत और पाकिस्तान में मीडिया कहां ज़्यादा आज़ाद?

  • 18 अक्तूबर 2016
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पाकिस्तान का डॉन अख़बार अपनी उस ख़बर पर कायम है जिसमें बताया गया था कि सुरक्षा के मुद्दे पर सेना और सिविलियन सरकार के बीच मतभेद हैं.

इस प्रसंग को भारत और पाकिस्तानी मीडिया में कई लोग, भारत के मुक़ाबले पाकिस्तानी मीडिया के ताक़तवर होने के सबूत के तौर पर देखते हैं.

ठीक इसी दौरान, भारत के उदारवादी माने जाने वाले चैनलों में से एक एनडीटीवी ने राष्ट्रीय सुरक्षा का हवाला देते हुए पूर्व गृह मंत्री पी चिदंबरम का इंटरव्यू ड्रॉप कर दिया.

एनडीटीवी की सह-संस्थापक और चेयरमैन राधिका रॉय ने ऑनलाइन प्रकाशन द वायर को दिए एक स्टेटमेंट में कहा, "एनडीटीवी के दूसरे तमाम फ़ैसलों की तरह, हम संपादकीय मूल्यों और पत्रकारिता के प्रति हमारी प्रतिबद्धता से प्रेरित हैं. हमारा मानना है कि सर्जिकल स्ट्राइक के मसले पर राजनीतिक छींटाकशी, जो बिना सबूत के की जा रही थी, उससे हमारी राष्ट्रीय सुरक्षा को नुकसान हो रहा था. "

पाकिस्तानी पत्रकारों को भी लगता है कि वो ज़्यादा साहसी हैं और वो सरकार का समर्थन करने वाले भारतीय पत्रकारों की तुलना में अपनी सरकार के पक्ष से अलग पक्ष रख सकते हैं.

हालांकि इस बहस का कोई नतीजा नहीं निकल सकता है. इतना ज़रूर साबित होता है कि दोनों देशों में प्रेस की आज़ादी की स्थिति बहुत ख़राब है.

भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है, बावजूद इसके रिपोर्ट्स बिदाउट बॉर्डर संस्था की ओर से 2016 में प्रकाशित वर्ल्ड प्रेस फ्रीडम इंडेक्स के मुताबिक प्रेस की स्वतंत्रता के पैमाने पर भारत निचले पायदानों पर है.

180 देशों की सूची में 133वां स्थान दर्शाता है कि देश में प्रेस की आज़ादी की स्थिति लगातार बिगड़ रही है.

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भारत में 2015 में चार पत्रकारों की हत्या हुई और हर महीने कम से कम एक पत्रकार पर हमला हुआ है. कई मामलों में पत्रकारों पर आपराधिक मानहानि के मुकदमे दर्ज किए गए. इसका नतीजा रहा है कि पत्रकारों ने ख़ुद पर सेंशरशिप लगा ली.

मीडिया पर नजर रखने वाली वेबसाइट द हूट डॉट ओआरजी की गीता सेशू कहती हैं, "इन हमलों का दायरा चौंकाने वाला है. राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर कश्मीर में इंटरनेट और समाचार पत्रों पर पाबंदी लगाई गई. कारपोरेट धोखाधड़ी पर मानहानि के मुकदमे, स्थानीय माफिया के भ्रष्टाचार की ख़बर करने पर पत्रकारों की हत्याओं से लकर छत्तीसगढ़ में सुरक्षा बल का स्वतंत्र पत्रकारों को प्रताड़ित करना और जेल भेजने की घटनाएं भी हुई हैं."

भारत प्रशासित कश्मीर में मौजूदा तनाव को देखते हुए सरकार ने प्रेस की आज़ादी पर कई तरह के अंकुश लगाए हैं. पत्रकारों को कर्फ्यू के दौरान पास नहीं दिया गया, पत्रकारों पर हमले हुए, राज्य में समाचार पत्रों के प्रसार को रोक दिया गया और कश्मीर रीडर नामक अख़बार पर पूरी तरह पाबंदी लगा दी गई.

दुनिया के किसी दूसरे हिस्से में अगर एक अख़बार पर पाबंदी लगाई जाती तो इस पर हंगामा मच जाता, लेकिन भारतीय मीडिया ने बड़े पैमाने पर इसको नज़रअंदाज़ किया.

पाकिस्तान में लोकतंत्र की स्थिति भी डांवांडोल रही है, बड़े पैमाने पर देश में चरमपंथ भी फैला हुआ है, इसलिए प्रेस फ्रीडम इंडेक्स में पाकिस्तान का 147वें पायदान पर होना बहुत चौंकाता नहीं है. ये रैंकिंग पाकिस्तान के मुक्त मीडिया के दावे से मेल नहीं खाती है.

2016 की रिपोर्टर विदाउट बॉर्डर की रिपोर्ट पाकिस्तान के बारे में कहती है- "पत्रकारों को जो निशाना बनाते हैं, उनमें चरमपंथी समूह, इस्लामिक संगठन, ख़ुफ़िया एजेंसियां शामिल है. ये प्रेस की आज़ादी में बाधा पहुंचाते हैं. ये सब एक दूसरे से भले लड़ रहे हों लेकिन जैसे हमेशा मीडिया को चोट पहुंचान के लिए तैयार रहते हैं. ऐसे में समाचार संगठनों ने सेल्फ-सेंसरशिप को अपना लिया है."

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Image caption कश्मीर में प्रेस पर अंकुश के विरोध प्रदर्शन करते पत्रकार

2014 में हत्या की नीयत से किए गए हमले में बाल बाल बचे और अब अमरीका में रह रहे पाकिस्तानी पत्रकार रज़ा रूमी कहते हैं, "जहां तक पाकिस्तान की राष्ट्रीय सुरक्षा की बात है, अंग्रेजी अख़बारों में थोड़ी जगह अलग विचार व्यक्त करने के लिए हो सकती है, लेकिन टीवी न्यूज़ में सत्ता प्रतिष्ठान का विरोध काफी ख़तरनाक है. संस्थाएं इसकी अनुमति नहीं देती हैं."

रूमी एक टीवी शो होस्ट करते थे और उन्होंने देश की विदेश नीति से मतभेद जताए थे और अल्पसंख्यकों के अधिकार के मुद्दे को उठाया था.

बलूचिस्तान में मानवाधिकार के मुद्दे पर रिपोर्टिंग करने के दौरान 2014 में पाकिस्तान के जाने माने एंकर हामिद मीर पर भी जानलेवा हमला हुआ था. तब मीर के भाई ने टीवी चैनल पर आकर इस हमले के लिए पाकिस्तानी सेना को जिम्मेदार ठहराया था.

वैसे शारीरिक हमला और सीधी सेंसरशिप- समस्या का छोटा हिस्सा भर हैं, दोनों देशों में मीडिया पर अंकुश लगाने की कोशिशें बढ़ती जा रही हैं.

टेलीग्राफ़ अख़बार में मानिनी चटर्जी ने लिखा है, "सेंसरशिप-सेल्फ सेंसरशिप, सच-प्रोपागैंडा और पत्रकारिता-अंधराष्ट्र भक्ति के बीच अंतर को शायद ही कोई जानता समझता हो."

इतना ही नहीं, नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली भारतीय जनता पार्टी ने ख़बर तक पत्रकारों की पहुंच के तरीके कम कर दिए हैं और पीआर को बढ़ावा दिया है ताकि मीडिया की ख़बरों को बेहतर ढ़ंग से नियंत्रित किया जा सके.

पाकिस्तान में सेना की ओर से दबाव ज़्यादा होता है. पाकिस्तान की सुरक्षा संबंधी नीतियों पर लगातार लिखने वाली आयशा सिद्दिका के लेख पाकिस्तान में कई बार रिजेक्ट कर दिए जाते हैं और वो भारत में कहीं ज़्यादा छपती हैं.

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आयशा सिद्दिका ने पाकिस्तानी अख़बार द न्यूज़ में लिखा है, "मौजूदा समय में इंटर सर्विस पब्लिक रिलेशन के मुखिया लेफ्टिनेंट जनरल हैं, सेना की पीआर एजेंसी आज बड़े पैमाने पर रेडियो चैनल चला रही है, कई टीवी चैनलों में हिस्सेदारी है. फ़िल्म और थिएटर को फ़ाइनेंस करते हैं. यह केवल संस्थागत विस्तार भर नहीं है, बल्कि यह देश के मीडिया की आवाज़ को आकार देने जैसा मामला है."

पाकिस्तान के बलूचिस्तान में पत्रकारों को स्वतंत्र रूप से जाने की इज़ाजत नहीं है. ऐसे में किस देश का मीडिया ज़्यादा स्वतंत्र है, इस बहस का कोई नतीजा नहीं निकल सकता.

भारत और पाकिस्तान, दोनों देशों में प्रेस की आज़ादी गंभीर ख़तरे के दौर से ज़रूर गुजर रही है.

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