दिल्ली के फूलवालों की सैर

  • प्रीति मान
  • फोटो जर्नलिस्ट, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए
फूलवालों की सैर

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कभी ग़ालिब ने फूलवालों की सैर का ज़िक्र करते हुए कहा था,"दिल्ली की हस्ती मुनासिर कई हंगामों पर है किला, चाँदनी चौक , हर रोज मजमा जामा मस्जिद, हर हफ़्ते सैर जमुना के पुल की और दिल्ली में हर साल मेला फूलवालों का ये पाँच बातें अब नहीं फिर दिल्ली कहां."

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दिल्ली के महरौली इलाके में हर साल अक्टूबर-नवम्बर के महीने में "सैर ऐ गुल फरोशां" यानी फूलवालों की सैर के रूप में धार्मिक सौहाद्र का उत्सव मनाया जाता है. इस सैर की शुरुआत 1812 में अकबर शाह द्वितीय द्वारा अपनी बेग़म मुमताज महल की मन्नत पूरी करने के लिए की गयी थी.

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जिसमें बेग़म ने मन्नत ली थी की उनके बेटे मिर्ज़ा जहाँगीर के सही सलामत दिल्ली लौटने पर वो माता योगमाया के मंदिर में फूलों का पंखा चढ़ाने जाएँगी और हज़रत बख्तियार काकी की दरगाह पर फूलों की चादर चढ़ाएंगी. जिसमें हिंदू - मुस्लिम दोनों समुदाय पूरे जोश से शामिल हुए और यह सिलसिला आज तक बरक़रार है.

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माता योगमाया भगवान श्री कृष्ण की बहन थी, जिसे कंस ने कृष्ण समझ कर वध कर दिया था. कहते हैं उनका शीश इस जगह गिरा था. तबसे इस मंदिर में योगमाया की पिंडी स्थापित है. यहां चढ़ाये जाने वाले पंखे साल भर मंदिर में लगे रहते हैं. यह पंखे भारत के अलग-अलग राज्यों से आते हैं.

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मुग़लकाल में जहाज महल के नजदीक झरना नाम की जगह पर फूलवाली मंडी लगती थी. यहीं पर फूलों के पंखें बनते थे. पर अब न वो फूल वाले रहे न फूलों की मंडी, पर इस जगह का इतिहास अब भी जिन्दा है. कहा जाता है उस वक़्त महल की झील का पानी झरने के रूप में यहाँ आता था इस लिए इस जगह का नाम 'झरना' पड़ गया.

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फूलवालों की सैर का उत्सव सात दिन तक मनाया जाता है जिसमें कई तरह के सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किये जाते हैं. इस दौरान मेहरौली में मेला भी सजता है.

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1942 में भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान अंग्रेजों ने फूट डालो राज़ करो की नीति के चलते फूलवालों की सैर पर रोक लगा दी. बाद में पंडित जवाहर लाल नेहरू ने 1962 में इसे फिर शुरू करवाया. आज भी हर साल देश के राष्ट्रपति द्वारा मंदिर और दरगाह पर पंखें भेंट किए जाते हैं.

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सैर के आख़िरी दिन अलग-अलग राज्यों से फूलों के पंखे भेंट करने के साथ जहाज महल में लोक नृत्य प्रस्तुति भी दी जाती है जिसके बाद क़व्वाली का कार्यक्रम शुरू होता है जो रात भर चलता है.

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कहते हैं मुमताज महल अपनी मन्नत पूरी करने के लिए नंगे पैर गई थीं तब शहर वालों ने सारे रास्ते को फूलों से सजा दिया था.

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फूलवालों की सैर हिन्दू-मुस्लिम प्रेम और भाईचारे की मिसाल है. जिसमें दोनों धर्म के लोग एक दूसरे के धर्म का सम्मान करते हैं.

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