सायरस मिस्त्री का सफ़र

टाटा समूह ने सायरस मिस्त्री को ग्रुप चेयरमैन के पद से सोमवार को हटा दिया.

रतन टाटा चार महीने के लिए अंतरिम चेयरमैन के रूप में काम करेंगे. कंपनी में 50 साल तक काम करने के बाद रतन टाटा 28 दिसंबर 2012 को रिटायर हो गए थे.

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जिसके बाद 28 दिसंबर 2012 को सायरस मिस्त्री को टाटा संस का चेयरमैन बनाया गया था, जिनका चयन एक समिति ने किया था.

नए चेयरमैन की तलाश के लिए टाटा संस के आर्टिकल्स ऑफ एसोसिएशन में मापदंड के मुताबिक़ रतन टाटा, वेणु श्रीनिवासन, अमित चंद्रा, रोहन सेन और लॉर्ड कुमार भट्टाचार्य की एक समिति बनाई गई है.

यह समिति चार महीने में नए चेयरमैन की तलाश और नियुक्ति का काम पूरा कर लेगी. सायरस मिस्त्री को जब टाटा का चेयरमैन बनाया गया था, तब भी लोगों को आश्चर्य हुआ था और जब उन्हें हटाया गया तब भी लोगों को एकबारगी विश्वास नहीं हुआ.

कौन हैं सायरस मिस्त्री?

आयरलैंड में पैदा हुए 48 साल के सायरस मिस्त्री ने लंदन बिज़नेस स्कूल से पढ़ाई की. वो पलोनजी शापूरजी के सबसे छोटे बेटे हैं. उनका परिवार आयरलैड के सबसे अमीर भारतीय परिवारों में से एक है.

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सायरस ने शापूरजी पालोनजी एंड कंपनी में 1991 में काम करना शुरू किया. उन्हें 1994 में शापूरजी पालोनजी समूह का निदेशक नियुक्त किया गया.

सायरस के नेतृत्व में शापूरजी पालोनजी एंड कंपनी ने जमकर मुनाफ़ा कमाया और उसका टर्नओवर दो करोड़ पाउंड से क़रीब डेढ़ अरब पाउंड हो गया. कंपनी ने मरीन, तेल-गैस और रेलवे के क्षेत्र में काम फैलाया. इस दौरान इस कंपनी के कंस्ट्रक्शन का काम दस से अधिक देशों में फ़ैला.

सायरस के नेतृत्व में उनकी कंपनी ने भारत में कई बड़े रिकॉर्ड बनाए, इनमें सबसे ऊंचे रिहायसी टॉवर का निर्माण, सबसे लंबे रेल पुल का निर्माण और सबसे बड़े बंदरगाह का निर्माण शामिल है.

टाटा संस के बोर्ड में सायरस 2006 में शामिल हुए. वरिष्ठ पत्रकार एमके वेणु के मुताबिक़ टाटा संस के सबसे अधिक शेयर साइरस मिस्त्री के परिवार के पास ही हैं.

क्यों हटाया गया सायरस मिस्त्री को?

मिस्त्री शुरू से रतन टाटा की देखरेख में काम कर रहे थे. लेकिन लगता है कि उन्होंने अब ख़ुद ही फ़ैसले लेने शुरू कर दिए थे.

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सायरस मिस्त्री के मित्र और सहकर्मी उन्हें मृदुभाषी और सामंजस्य बिठाने वाला व्यक्ति बताते हैं.

वेणु बताते हैं कि भारत और दुनिया की अर्थव्यवस्था में जब 2002 से 2008 के दौरान उछाल आया तो रतन टाटा ने तेजी ने वैश्विक कंपनियां बनानी शुरू कीं थी. इस दौरान उन्होंने बहुत सी कंपनियों का अधिग्रहण किया और नई कंपनियां बनाईं. कोरस का अधिग्रहण किया, टेटली और कई होटल खरीदे.

वो बताते हैं कि इनमें से बहुत से अधिग्रहण ठीक नहीं थे. मिस्त्री को विरासत में जो कंपनियां मिलीं, उनमें से मुनाफ़ा न कमाने वाली कंपनियों को उन्होंने बेचना शुरू कर दिया. कुछ हद तक यह रतन टाटा के फैसलों को पलटने जैसा था.

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शायद रतन टाटा और साइरस मिस्त्री के बीच कुछ असहमति रही हो जिसकी वजह से यह फ़ैसला लेना पड़ा.

ख़बरों के मुताबिक शापूरजी पालोनजी इस फैसले को चुनौती देगी. टाटा के अबतक के इतिहास में नेतृत्व को लेकर यह पहला विवाद हो सकता है.

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