कई गंभीर कारण हैं मराठा आंदोलन के पीछे

  • 26 अक्तूबर 2016
Image caption मराठा आंदोलन में सभी वर्ग के लोग शामिल

"शिवाजी महाराज के बाद आज पहली बार मराठा समाज एकीकृत हुआ है". ये थे शब्द संभाजी राजे के हैं जो न केवल राज्य सभा सदस्य हैं बल्कि मराठा राजा शिवाजी की 13वीं पीढ़ी भी हैं और पूर्व कोल्हापुर रियासत के शाहू महाराज की चौथी पीढ़ी के सदस्य हैं.

उनका दफ्तर कोल्हापुर में 17वीं शताब्दी में बने पुराने महल में है और रिहाइश नए महल में है जो 125 साल पुराना है.

"ये जाति कभी एक साथ इकट्ठा नहीं होती है. ये पहली बार हुआ है", संभाजी राजे का इशारा महाराष्ट्र में जारी मराठा जन आंदोलन की तरफ है जिसमें लाखों मराठा शामिल हो रहे हैं. उनके सड़कों पर उतर आने का मुख्य कारण है आरक्षण. वो नौकरियों और शिक्षा में अपने समाज के लिए आरक्षण चाहते हैं.

Image caption कोल्हापुर में एक विशाल मराठा आंदोलन

इतने बड़े महल में बैठ कर आरक्षण की बात सही लगती है? संभाजी राजे, जो इस आंदोलन का एक परिचित चेहरा हैं, कहते हैं, "मराठा समाज के केवल 20 से 25 प्रतिशत लोग ही खुशहाल हैं. बाक़ी सभी ग़रीब और पिछड़े हैं."

संभाजी राजे के अनुसार मराठा समाज और संसगठनों को एक प्लटफॉर्म पर लाने में उनकी एक बड़ी भूमिका है. "शिवाजी की 13वीं पीढ़ी होने के नाते मेरी बात लोगों ने सुनीं."

मराठा मोर्चों में आज राजा भी शामिल हैं और रंक भी. पूर्व न्यायाधीश पी. बी. सावंत कहते हैं, "मराठा समाज पहली बार इकट्ठा हुआ है और सड़कों पर उतर आया है. सभी वर्ग के लोग, यानी तरक्की करने वालों से लेकर जमीनी स्तर से आए लोग, वे सब एक साथ आ गए हैं. इस देश के इतिहास में पहली बार ऐसा हुआ है."

Image caption मराठा आंदोलन सोशल मीडिया पर भी

इस आंदोलन में शामिल युवा मराठा इस आंदोलन को क्रांति कहते हैं. कोल्हापुर में मोर्चे का आयोजन करने वालों में समाज सेवक इंद्रजीत सावंत शामिल थे. उनका कहना था, "ये मराठों की क्रांति है."

अब तक 25 से अधिक मोर्चे अलग-अलग शहरों में निकाले जा चुके हैं. इन मोर्चों में लाखों लोग शरीक होते हैं. कहा जाता है कि इस आंदोलन का कोई नेतृत्व नहीं कर रहा है. मोर्चे और जलूस खामोश होते हैं. दिलचस्प बात ये है कि लाखों लोगों के शामिल होने के बावजूद मोर्चे संगठित और अनुशासित होते हैं.

महाराष्ट्र के बाहर ये सवाल किया जा रहा है कि मराठा समाज अचानक सड़कों पर क्यों आ गए हैं. मराठा आंदोलन में पहले दिन से शामिल अहमदनगर के संजीव भोर पाटिल कहते हैं ये आंदोलन अचानक नहीं शुरू हुआ है. मराठा आंदोलन खड़ा करने का काम पहले से चल रहा है. आरक्षण की मांग 10 सालों चली आ रही है.

वो बताते हैं, "पिछले साल आरक्षण की मांग को लेकर कई मराठा संगठनों ने 12 ज़िलों में बैठक की थी उसमे मराठा बुद्धिजीवी भी शामिल थे."

Image caption सांसद संभाजी राजे शिवाजी की 13वीं पीढ़ी भी हैं और पूर्व कोल्हापुर रियासत के शाहू महाराज की चौथी पीढ़ी

माहौल तैयार था. मराठों में गुस्सा बहुत था. ऐसे में 13 जुलाई को कोपरडी गाँव में एक मराठा लड़की के बलात्कार और हत्या ने चिंगारी का काम किया. इस काण्ड ने ट्रिगर का काम किया.

पुणे में सामाजिक कार्यकर्ता विलास सोनावणे कहते हैं कि मराठा आंदोलन को अलग-थलग करके नहीं देखा जा सकता. वो कहते हैं कि मराठा आंदोलन कृषि क्षेत्र में संकट के कारण शुरू हुआ है, "मराठा आंदोलन कृषि संकट का एक प्रतिबिंब है."

वो आगे कहते हैं, "1980 के बाद उत्तर, दक्षिण और पश्चिम में किसान संगठित होने लगे. उत्तर में महिंदर सिंह टिकैत आ गए, महाराष्ट्र में शरद जोशी आ गए. कर्नाटक में मंजूदा स्वामी आ गए. लेकिन इनका प्रभाव 1995 में ख़त्म हो गया."

इसका मुख्य कारण था अर्थव्यवस्था का उदारीकरण जिसकी शुरुआत 1991 में हुई. वरिष्ठ पत्रकार श्रीराम पवार कहते हैं कि उदारीकरण से सेवा सेक्टर को बढ़ावा मिला लेकिन किसान होने के कारण मराठा इस प्रगति में पीछे रह गए.

उन्होंने बताया, "सर्विसेज सेक्टर में जिस तरह से मराठा समाज को शामिल होना चाहिए था वो नहीं हुआ. सभी सेक्टर का मूल्य बढ़ता चला गया लेकिन कृषि का मूल्य घटता गया. पिछले कुछ सालों में राज्य में जितने किसानों ने आत्म हत्या की है उन में 70 से 80 प्रतिशत मराठा हैं."

Image caption मराठा आंदोलन में लोग परिवार के साथ शामिल हो रहे हैं

उन्होंने इस बात पर भी ज़ोर दिया कि चीनी मिलों के मालिक या सत्ता पर सालों से राज करने वाले मराठा मुट्ठी भर हैं. अधिकतर मराठा आर्थिक संकट में हैं.

दलित समाज के एक वर्ग महार समुदाय में इस इलज़ाम पर बेचैनी पैदा हुई कि मराठा आंदोलन असल में दलित विरोधी है क्योंकि ये जाति के आधार पर संगठित है और उनकी मांगों में अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निरोधक) अधिनियम में संशोधन शामिल है.

रिपब्लिकन पार्टी ऑफ़ इंडिया से जुड़े महार समुदाय के दलितों ने मराठा आंदोलन के खिलाफ कई जवाबी मोर्चे निकाले.

Image caption मराठा आंदोलन में छात्र भी शामिल

दामोदर गायकवाड़ अन्ना पुणे में एक दलित सामाजिक कार्यकर्ता हैं. वो कहते हैं, "कोपरडी गाँव में 13 जुलाई को एक मराठी लड़की का तीन दलित युवाओं ने कथित तौर पर बलात्कार किया और इसकी हत्या कर दी जिसके कारण दलितों के ख़िलाफ़ एक वातावरण तैयार हुआ. और इसने मराठा समाज को संगठित कर दिया."

वो आगे कहते हैं, "इससे पहले दलित महिलाओं के खिलाफ कई बार अत्याचार हुआ. खैरलांजी गाँव में बलात्कार और हत्याएं हुईं. शरद यादव या कोई और मराठा नेता पीड़ितों के परिवार से मिलने क्यों नहीं गया? तब आंदोलन क्यों नहीं छेड़ा "

उनके अनुसार इस मौक़े से फायदा सभी पार्टियों ने उठाने की कोशिश की और समाज का ध्रुवीकरण करना शुरू कर दिया. वो कहते हैं जाति के आधार पर मोर्चे निकाले जा रहे हैं. उनके अनुसार, "स्लोगन सुनो, मराठा आंदोलन का नारा है, एक मराठा, लाख मराठा. दलितों के महार समाज का नारा है एक महार लाख बराबर."

Image caption दलित एक्टिविस्ट दामोदर गायकवाड़ अन्ना:आंदोलन जातिवाद पर आधारित

कई लोगों के विचार में गुजरात में पटेलों का आंदोलन हो या हरियाणा के जाटों का आंदोलन या फिर मराठा आंदोलन ये सभी बीजेपी के प्रशासन वाले राज्य हैं. इस पर पुणे में दलित पैंथर्स दल के नेता बप्पूसाहेब भोसले कहते हैं ये मनुवाद की एक साज़िश है. "गुजरात में पाटीदार आंदोलन हो रहा है. हरियाणा में गुजर्रों का आंदोलन है, राजस्थान में मेघवाल का आंदोलन है. और यहाँ मराठों का. परोक्ष रूप से ये सब दलितों के ख़िलाफ़ ही जा रहा है."

इन आंदोलनों का उद्देश्य बताते हुए बप्पूसाहेब भोसले कहते हैं, "दलितों को दबा कर रखो, उनको आवाज़ उठाने मत दो."

लेकिन मराठा समाज के जिस व्यक्ति से बातें करें वो कहता है कि उनका आंदोलन दलितों के ख़िलाफ़ नहीं है. सामाजिक कार्यकर्ता इंदरजीत सावंत कहते हैं कि , "ये इल्ज़ाम सरासर ग़लत है. हम किसी के ख़िलाफ़ नहीं हैं."

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