'बजई' की ज़िंदगी रोशन करती बाती

  • रोशन जायसवाल
  • वाराणसी से,बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए
बाती बनाती काशी की महिलाएं

इमेज स्रोत, Roshan Jaiswal

घर-परिवार, रिश्तेदार और समाज से दूर, मुक्ति की आस में जीवन के बचे हुए दिन वाराणसी में काटने वाली महिलाएं बनाती है बाती.

ये बातियां दीपक में जल कर रोशनी तो फैलाती हैं, इन बेसहारा औरतों की ज़िंदगी में भी रोशनी भर देती हैं.

इन विधवा बुज़ुर्ग औरतों को स्थानीय लोग 'बजई' कहकर पुकारते हैं. इस शब्द का नेपाली में अर्थ बुज़ुर्ग होता है. मुख्य रूप से नेपाल और देश के पूर्वोत्तर राज्यों से आने वाली ये 'बजई' वाराणसी में गंगा किनारे मठ-आश्रमों में शरण लेती हैं.

इमेज स्रोत, Roshan Jaiswal

यहां सबके रहने और खाने का इंतजाम हो जाता है. लेकिन रोज़मर्रा की बाकी ज़रूरते, मसलन, पूजा के सामान और कपड़े-लत्तों का खर्च ये पूरे दिन दीपों की बाती बनाकर निकालती हैं.

दिन भर की कड़ी मेहनत के बाद एक हज़ार बातियों की डोर ही तैयार हो पाती है, जिसकी क़ीमत महज़ 40 रुपए होती है.

बाती बनाने के अलावा इनकी दिनचर्या का हिस्सा गंगा स्नान, पूजा-पाठ, भजन-कीर्तन और अपने हाथों बनाई गई बाती से आरती करना होता है.

वाराणसी के ललिता घाट पर नेपाली मंदिर के पास ही श्री पशुपतिनाथ वृद्धाश्रम है जहां दर्ज़न से भी ज़्यादा 'बजई' रहती हैं.

इमेज स्रोत, Roshan Jaiswal

इमेज कैप्शन,

आरती

सफ़ेद साड़ी, सिर पर छोटे केश, माथे पर चंदन का तिलक और गले में मामूली सी दिखने वाली माला. डबडबाती आँखों पर चश्मा, कम दिखने की दिक्क़त, आंखों की सफेद पड़ चुकी पुतलियां और शरीर पर पड़ी झुर्रियां....

यही हुलिया सभी 'बजई' का है.

इन्ही में से एक हैं 72 बसंत देख चुकी आरती. ख़ुद को नेपाल के इटहरी की बताने वाली आरती ने बीबीसी से कहा, "लगभग 5-6 साल पहले पति जयबहादुर का निधन हो गया. "

वे पहले भी नेपाल से बनारस आया करती थीं. बच्चे बड़े हुए तो उनकी पढाई के लिए काशी में ही 35 सालों से रह रही है.

उन्होंने कहा, "बेटे बुलाते तो हैं, लेकिन घर में शांति नहीं मिलती. अब काशी में ही मन रम गया है. यहां पर दर्शन, पूजा-पाठ और गंगा स्नान का मौका मिलता है."

उन्होंने कहा कि उनके हाथों बनी बाती घरों और मंदिरों में जलती हैं तो उन्हें भी पुण्य मिलता है. वे बाती ख़रीदने वालों को अपनी ओर से कुछ बातियां मुफ़्त दे देती हैं ताकि उन्हें इसका पुण्य मिले. आरती पूरे दिन में 500-1,000 बातियां बना लेती हैं.

एक और 'बजई' पवित्रा ने बीबीसी को बताया कि वे असम के बोंगाई गांव की हैं. उनके पति पुजारी थे, तेज़ बुखार से उनकी मौत हो गई.

इमेज स्रोत, Roshan Jaiswal

इमेज कैप्शन,

पवित्रा

वो कहती हैं कि उनकी तीन बेटियां हैं, पर वे कभी याद नहीं करतीं, सभी ने उन्हें छोड़ दिया. वे 20 साल से काशी वास कर रहीं हैं. बुढ़ापे की वजह से अब शरीर उनका साथ नहीं देता.

लिहाज़ा, वे दिन भर में 200-300 बातियां ही बना पाती हैं. उन्हें इसकी एवज में महज़ 10 रुपए मिलते हैं.

नेपाल में मोतियाबिंद का ऑपरेशन कराते वक़्त 78 साल की हरि प्रिया की एक आंख डाक्टरों की लापरवाही से ख़राब हो गई थी. हरि प्रिया ने बीबीसी को बताया कि वे 35 सालों से मुक्ति के लिए काशीवास कर रही हैं.

इमेज स्रोत, Roshan Jaiswal

इमेज कैप्शन,

हरिप्रिया

परिवार में किसी के बुलाने के सवाल पर नजर बचाती हुई हरि प्रिया कहती हैं, "रिश्तेदार बुलाते तो हैं, लेकिन जाने का मन नहीं करता."

ख़राब आँख की वजह से बुज़ुर्ग हरिप्रया दिन भर में 500 बातियों से ज़्यादा नहीं बना पाती हैं.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)