किसी फिल्म के सेट जैसी दिल्ली की 168 साल पुरानी हवेली

  • 5 नवंबर 2016
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Image caption अनिल प्रसाद, चुनामल हवेली का एक कमरा दिखाते हुए.

भारत में सैनिक विद्रोह से क़रीब एक दशक पहले, साल 1848 में दिल्ली की इस हवेली का निर्माण किया गया.

यह वह दौर था जब भारत में मुग़लिया सल्तनत अपनी आख़िरी सांसे ले रही थी. और बहादुर शाह ज़फर द्वितीय दिल्ली की अपनी गद्दी बचाने में जुटे थे.

यह हवेली पुरानी दिल्ली में सत्रहवीं सदी में बनी मस्जिद से कुछ गज़ की दूरी पर मौजूद है. लाला चुनामल की हवेली के नाम से मशहूर है.

मुग़लों के दौर में ऐसे कई महल और हवेलियां पुरानी दिल्ली में बनीं. उस वक़्त ये इमारतें सत्ता का केंद्र हुआ करती थीं. लेकिन इनमें से कुछ ही अब बची रह गई हैं. चुनामल की हवेली भी उन्हीं कुछ इमारतों में से एक है जो अब तक बची हुई है.

दिल्ली सरकार ने इस इलाक़े में 554 ऐसी ही पुरानी हवेलियों की मरम्मत की योजना बनाई थी, जो कि अभी तक शुरू भी नहीं हुई है.

लेकिन चुनामल हवेली के मालिक इस बात पर फ़ख्र महसूस करते हैं कि बिना किसी सरकारी मदद के उनकी हवेली बेहतर हालत में है.

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हवेली के मालिकों में से एक अनिल प्रसाद बताते हैं कि क्यों उनकी हवेली शानदार है.

वो बताते हैं, "यह हवेली एक एकड़ ज़मीन पर बनी हुई है. हवेली में 128 कमरे हैं. कुल तीस परिवार इस हवेली में रहते हैं. साथ ही कुछ कमरे नौकरों को दिए गए हैं. लेकिन ज्यादातर परिवार अब हवेली में अपना हिस्सा छोड़कर दूसरी जगहों पर चले गए हैं."

हवेली में दिखती है दूसरी दुनिया

हवेली के आगे के हिस्से में अब कपड़े, हार्डवेयर और मसाले की दुकानें खुल गई हैं. यहां दिनभर काफ़ी भीड़ रहती है, लेकिन जैसे ही आप हवेली के अंदर कदम रखते हैं, आपको एक दूसरी ही दुनिया नज़र आती है.

अंदर घुसते ही आपको किसी पीरियड फ़िल्म के सेट जैसा नज़ारा देखने को मिलेगा.

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Image caption चुनामल हवेली की रेप्लिका.

इसका ड्राइंग रूम सात सौ स्कवयार फ़ीट में फैला हुआ है. दीवारें 18 फ़ीट ऊंची हैं. कमरे में तीन लकड़ी की चिमनियां मौजूद हैं. साथ ही छतें हाथ से बनीं झालड़ों से सजी हैं.

बेल्जियम से मंगवाए गए विशाल शीशे दीवारों पर इस तरह से लगाए गए हैं कि उसमें झालड़ों की खूबसूरती दिखाई पड़ें. पुराने ज़माने के पंखे छत से लटके हुए हैं और यूरोप से मंगवाए गए कांच के खूबसूरत लैंप भी ड्राइंग रूम की शोभा बढ़ा रहे हैं.

लाला चुनामल की दसवीं पीढ़ी और हवेली

अनिल प्रसाद का कहना है कि उनका परिवार लाला चुनामल के ख़ानदान की दसवीं पीढ़ी है. चुनामल एक अच्छे-खासे अमीर शख़्स थे. वो अक्सर मुग़ल बादशाह शाह ज़फर द्वितीय को पैसे उधार दिया करते थे. वो बताते हैं कि चुनामल शाही परिवार को शॉल, सिल्क और जड़ी के कपड़े पहुंचाया करते थे.

अंग्रेज शासकों के साथ भी उनके व्यापारिक रिश्ते रहे.

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अनिल प्रसाद का कहना है, "सच तो यह है कि आधी पुरानी दिल्ली हमारी थी, लेकिन अब पुश्तैनी जायदाद के नाम पर सिर्फ़ यही एक हवेली हमारे पास बची रह गई है."

वो बताते हैं कि इस हवेली में कई नामी-गिरामी हस्तियां आती रही हैं.

उन्होंने बताया, "भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरु और उनकी बेटी इंदिरा गांधी अक्सर हवेली में रात के खाने पर आते थे. हॉलीवुड की मशहूर अभिनेत्री केट विंसलेट भी एक बार हवेली में आ चुकी हैं. बॉलीवुड के कलाकार और निर्देशक भी शूटिंग के लिहाज़ से आते रहे हैं."

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इस हवेली को इंडियन नेशनल ट्रस्ट फॉर आर्ट एंड कल्चर हेरीटेज ने राष्ट्रीय विरासत की सूची में जगह दी है.

अनिल प्रसाद दावा करते हैं कि हवेली के देखरेख के लिए उन्हें किसी से कभी भी कोई मदद नहीं मिली.

इस हवेली की देखरेख करना एक मुश्किल काम है लेकिन अनिल प्रसाद का कहना है कि इसे छोड़ने का उनका कोई इरादा नहीं.

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वो कहते हैं, "मैं यहां से जाने के बारे में सोच भी नहीं सकता. मेरे पूर्वज जिस घर में रहे हैं, मैं भी उसी घर में हर सुबह अपनी आखें खोलता हूं. अब तो मेरे पोते-पोतियों ने भी यहां से कहीं और जाने से मना कर दिया है."

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