जजो की नियुक्ति में देरी, न्याय व्यवस्था पर असर: लोढ़ा

  • 30 अक्तूबर 2016
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सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को फटकार लगाते हुए कहा है कि वो पूरी न्याय व्यवस्था को रोक नहीं सकती. अदालत की सरकार से नाराज़गी कॉलेजियम की सिफ़ारिशों के बावजूद हाईकोर्ट में न्यायाधीशों की नियुक्ति नहीं करने से थी.

सुप्रीम कोर्ट चीफ़ जस्टिस टीएस ठाकुर ने कहा, "अगर सरकार को किसी नाम से समस्या है तो आप हमें नाम वापस भेजिए और उस पर पुनर्विचार करेंगे लेकिन आप न्यायपालिका को रोक नहीं सकते."

पढ़िए इस पूरे मामले पर भारत के पूर्व चीफ़ जस्टिस राजेंद्र मल लोढ़ा की राय:-

आप कॉलेजियम के अनुशंसाओं पर महीनों तक बैठे रहेंगे तो ये ठीक बात नहीं है. हाईकोर्ट में 400 पद ख़ाली हैं. सुप्रीम कोर्ट में तीन-चार पद ख़ाली है.

इसलिए अनुशंसाओं को लंबित रखना किसी के भी हित में नहीं है. न्यायपालिका पर काम का बोझ बढ़ता जा रहा है.

इससे न्याय पर असर पड़ता है क्योंकि एक केस जितने समय की मांग करता है, उतना समय हाईकोर्ट के जज पर नहीं दे पाते हैं.

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Image caption राजेंद्र मल लोढ़ा

उनके पास हर दिन मामलों का अंबार लगा रहता है जिससे मिलने वाले न्याय पर थोड़ा असर तो पड़ता है.

सोमवार से शुक्रवार के बीच सुप्रीम कोर्ट की हर बेंच सत्तर से अस्सी मामले देखती हैं इसलिए ज़ाहिर है कि मिलने वाले कम समय का न्याय पर असर तो पड़ता है.

सरकार और न्यायपालिका, दोनों को ही निष्पक्ष भाव से अपने न्यायिक व्यवस्था के बारे में सोचना होगा.

कार्यपालिका और न्यायपालिका को इस दिशा में एक सामूहिक प्रयास करना चाहिए. न्यायपालिका लोकतंत्र का एक अहम हिस्सा है.

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Image caption टीएस ठाकुर

और जहां तक न्यायपालिका का सवाल है तो यह ध्यान रखना होगा कि अब वो न्यायपालिका में अच्छी नियुक्तियों के बारे में सोचे जो पूरी तरह से निष्पक्ष हो और विविधता का ख्याल रखकर किए गए हो. तो इसके लिए न्यायपालिका को भी पारदर्शिता अपनानी चाहिए.

अभी जो व्यवस्था है उसके आधार पर हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट की नियुक्तियों का हक़ कॉलेजियम को है और वो कार्यपालिका पर बाध्य है.

जब तक कि कार्यपालिका कोई बहुत मजबूत कारण किसी की नियुक्ति पर आपत्ति के संदर्भ में पेश नहीं करती.

न्यायपालिका की स्वायत्ता को लेकर कोई समझौता नहीं होना चाहिए. कार्यपालिका को न्यायपालिका के अनुशंसाओं पर आदर के साथ विचार करके जल्द से जल्द फ़ैसला करना चाहिए.

(सुप्रीम कोर्ट के पूर्व चीफ़ जस्टिस राजेंद्र मल लोढ़ा से बीबीसी संवाददाता विनित खरे की बातचीत पर आधारित)

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