टॉयलेट के फ़्लश में कितना पानी बहा देते हैं?

  • प्रदीप कुमार
  • बीबीसी संवाददाता

पिछले दिनों चीन से एक दिलचस्प ख़बर मिली. चीनी प्रांत युन्नान के कुनमिंग वोकेशनल कॉलेज ने शौचालयों में ज़रूरत से ज़्यादा पानी का इस्तेमाल रोकने के लिए अनोखी तरकीब अपनाई.

कॉलेज ने अपने छात्रों को इलेक्ट्रॉनिक कार्ड देने का फ़ैसला किया है, जिसमें यह व्यवस्था है कि ज़्यादा पानी के उपयोग पर ज़्यादा शुल्क चुकाना होगा.

यह प्रयोग भले ही चीन में किया जा रहा हो, वह दिन दूर नहीं जब ऐसी तरकीबें दुनिया के दूसरे हिस्सों में भी अपनाई जाएं, क्योंकि पानी के बेजा इस्तेमाल से जुड़ी समस्याएं हर जगह मुंह बाए खड़ी हैं.

भारतीय परिप्रेक्ष्य में देखें तो आने वाले दिनों में यह समस्या कितनी विकराल होने वाली है, इसका केवल अंदाजा भर लगाया जा सकता है. पिछले कुछ सालों में हमारी सरकारों का उद्देश्य खुले में मल त्याग रोकने के लिए शौचालय बनाने की तरफ़ ज़्यादा दिखा है.

स्वच्छ भारत मिशन के तहत गांवों-कस्बों में लाखों की संख्या में टॉयलेट बनाए जा रहे हैं, इन टॉयलेटों के इस्तेमाल से साफ़ पानी के मैला पानी में बदलने और उसके चलते जल स्रोतों में होने वाले प्रदूषण की ओर किसी का ध्यान नहीं है.

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महानगरों के झुग्गी वाले इलाकों में ये रोजमर्रा की ज़िंदगी का हिस्सा है

इस समस्या को आम लोगों के जीवन से जोड़ते हुए विज्ञान पत्रकार सोपान जोशी ने हाल में एक शोध अध्ययन पूरा किया है. गांधी शांति प्रतिष्ठान ने करीब पांच साल तक चले उनके शोध और अध्ययन को किताब के रूप में 'जल, थल, मल' नाम से छापा है.

इस अध्ययन में सोपान ने बताया कि इस देश में जितने शौचालयों की जरूरत है, वो अगर बना दिए जाएं तो साफ़ पानी के लिए हाहाकार मच सकता है.

अध्ययन के मुताबिक़, भारत के तमाम बड़े महानगर, जो अंधाधुंध विकास का ढिंढोरा पीटने में मगन हैं, वे ख़ुद का गंदा किया पानी साफ़ नहीं कर सकते.

भारत के महानगरों में रहने वाले लोग मोटे तौर पर करीब 6,200 करोड़ लीटर मैला पानी रोजाना पैदा करते हैं, लेकिन हमारे सीवेज ट्रीटमेंट संयंत्रों की क्षमता 2,000 करोड़ लीटर पानी साफ़ करने की ही है.

इस शोध अध्ययन में ट्रीटमेंट प्लांटों की कुल क्षमता के आंकड़ों का जिक्र है, जबकि एक हक़ीकत यह भी है कि सभी सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट व्यवहारिक दिक्कतों की वजह से अपनी पूरी क्षमता के हिसाब से काम नहीं कर पाते हैं. कभी बिजली नहीं होती है, तो कभी सफ़ाई कर्मचारी उपलब्ध नहीं होते हैं.

सोपान ने बड़े ही सरल अंदाज़ में आधुनिक जीवनशैली में फ़्लश टॉयलेटों के बढ़ते इस्तेमाल का जिक्र करते हुए इस ओर भी ध्यान दिलाया है कि महानगरों के सीवर की नालियों में बहने वाला मैले पानी में क़रीब 99.9 प्रतिशत साफ़ पानी होता है.

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सीवर की नालियों की सफ़ाई करने के दौरान दम घुटने से सफ़ाईकर्मियों की मौत भी होती रहती हैं.

सरकारी योजनाओं और आम लोगों की आदतों की देखें तो यह अंदाज़ा लगाना मुश्किल नहीं है कि पानी की ठीक ठीक क़ीमत का अंदाज़ा अभी भी बहुसंख्य लोगों को नहीं हुआ है.

सोपान जोशी बताते हैं, "शासन के हर स्तर पर आप देखें, तो पाएंगे कि ज्यादातर पैसा और साधन पानी की आपूर्ति में खर्च होता है. मैले पानी को साफ़ करने पर नहीं. जितनी पानी की आपूर्ति बढ़ती है उतना ही मैला पानी बढ़ता है. लेकिन हमारा ध्यान इस पर तभी जाता है, जब मुश्किल बूते से बाहर हो जाती है."

यही वजह है कि बाज़ार में पानी को साफ़ करने वाली मशीनों और बोतलबंद पानी का कारोबार बेतहाशा बढ़ रहा है. बोतलबंद पानी का भारतीय बाज़ार भी दस हज़ार करोड़ रुपए से ज़्यादा तक पहुंच गया है.

लेकिन मैला पानी साफ़ करने के लिए बाज़ार में ऐसी कोई होड़ नहीं नज़र नहीं आती.

बहरहाल, केवल शौचालय का होना या ना होना सोपान के शोध का विषय नहीं था. वे बताते हैं, "शौचालय तो एक कड़ी भर है, शुचिता के तिकोने विचार में, जिसका एक कोण पानी है, दूसरा मिट्टी और तीसरा हमारा शरीर. जल, थल और मल."

बेहद सहज और सरल अंदाज़ में लिखे गए इस शोध अध्ययन में दस अध्याय हैं, और इन अध्यायों से गुजरने के दौरान ये महसूस किया जा सकता है कि हम ऐसे समाज में रह रहे हैं जो अपनी सुविधा के लिए किसी भी हद तक जा सकता है.

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शौचालयों के इस्तेमाल से निकले मैले पानी को खाद के तौर पर इस्तेमाल किया जा सकता है.

यह शिक्षित वर्ग का ऐसा समाज है, जो पानी का बिल कम करवाने के लिए संघर्ष और राजनीतिक आंदोलन कर सकता है, लेकिन दूर की नदियों का पानी छीन लेना अपना जन्मजात अधिकार मानता है. बहरहाल पुस्तक में इस्तेमाल किए गए रेखांकन भी आपका ध्यान खींचते हैं.

सोपान ने बारीकी से यह बताया कि ये समस्याएं जितनी आम लोगों की वजह से बढ़ रही है, उतनी सरकारी अंदाज़ में इसका हल तलाशने से भी. वे कहते हैं, "नदी साफ़ करने वालों का शौचालय से कोई नाता नहीं है. उर्वरक नालियों में बहाने वाली नगरपालिकाओं का कृषि और उर्वरक मंत्रालयों से लेना देना नहीं, जो बनावटी खाद की सब्सिडी में अटके हैं."

शोध अध्ययन पर आधारित 'जल, थल, मल' की ख़ास बात यह भी है कि इसमें उन पहलुओं को भी बताने की कोशिश की गई है, जिसके ज़रिए जल और ज़मीन से जुड़ी इन मुश्किलों को कम किया जा सकता है.

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