'वहां बस एक ही चीज़ सीखी...भूखे रहना'

  • दिलनवाज़ पाशा
  • बीबीसी संवाददाता, नई दिल्ली
सऊदी अरब से लौटे भारतीय कामगर
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सऊदी अरब में कई महीनों से फंसे भारतीय कामगार वापस लौट रहे हैं

सज्जाद अंसारी 8 साल पहले सऊदी अरब गए थे, इस उम्मीद के साथ कि वहां से पैसा भेजेंगे तो भारत में उनका परिवार अच्छी ज़िंदगी बसर कर सकेगा.

वो सऊदी अरब में एक बड़ी कंपनी में काम करते थे. बीते साल नवंबर तक सब ठीक था. फिर अचानक कंपनी से सैलरी मिलनी बंद हो गई और उनकी मुश्किलें शुरू हो गईं.

उनका कहना है कि पहले सैलरी मिलनी बंद हुई, फिर मेडिकल सुविधाएं और उसके बाद भोजन-भत्ता.

ऐसे हालात में सज्जाद जैसे हज़ारों भारतीय कामगार अचानक खाने-पीने और अन्य मूलभूत सुविधाओं के लिए मजबूर हो गए.

उन्होंने भारतीय विदेश मंत्रालय से मदद की गुहार लगाई थी.

इन कामगारों की दिक्कतों के बारे में बीबीसी हिंदी पर पहले भी खबर प्रकाशित हो चुकी है.

भारत सरकार के प्रयासों के बाद सऊदी अरब सरकार अब इन भारतीय कामगारों को वापस भेज रही है.

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वापस लौटे कामगारों को कई घंटे एयरपोर्ट पर ही इंतज़ार करना पड़ा क्योंकि उन्हें लेने कोई नहीं पहुँचा था.

शनिवार शाम को 47 भारतीय श्रमिक सऊदी एयरलाइंस से भारत लौटे.

बिहार के गोपालगंज के रहने वाले सज्जाद कहते हैं कि उन्होंने कभी सोचा भी नहीं था कि उन्हें एक दिन खाली हाथ भारत लौटना पड़ेगा.

बीस साल से सऊदी में रहे थॉमस वर्गीज़ इसे क़िस्मत का खेल मानते हैं.

हैदराबाद के वर्गीज़ कहते हैं, "सब क़िस्मत की बात है, पहले तो सब अच्छा था, अब अचानक सब ख़राब हो गया. ये अच्छी बात है कि हम सुरक्षित वतन लौट आए हैं. अब फिर से ज़िंदगी शुरू करनी होगी."

इसी तरह गोपालगंज के राकेश कुमार सिंह तीन साल पहले जब सऊदी अरब गए थे तब उन्होंने सोचा था कि कुछ ही सालों की कमाई से वो परिवार की माली हालत ठीक कर देंगे.

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इन कामगारों को सऊदी अरब में कई महीनों से वेतन नहीं मिला था, ऐसे में जब ये भारत पहुँचे तो इनके हाथ बिलकुल खाली थे.

लेकिन उनकी कंपनी में हालात ख़राब होने से उनकी ज़िदगी बेहतर होने के बजाए और मुश्किल हो गई है.

राकेश कहते हैं, "जहां तीन साल पहले था, वहीं हूं. खाली हाथ....अब भारत में ही रोजगार के मौक़े देखने होंगे, जो हम जैसे कम पढ़े लिखे लोगों के लिए बहुत कम है."

हैदराबाद के भुम्वेश्वर स्कूल जाने वाले तीन बच्चों के पिता हैं. वो एक साल से घर पैसे नहीं भेज पाए हैं. उनके बच्चों की फ़ीस अभी उधार है. उनकी चिंताएं भी अन्य कामगारों जैसी हैं.

वे कहते हैं, "खाली हाथ घर जाकर बच्चों का सामना करना मुश्किल होगा."

इलाहाबाद के छोटेलाल यादव 23 साल से सऊदी अरब में एक ही कंपनी में काम कर रहे थे. लेकिन वेतन मिलना बंद हुआ तो, भारत में उनके बच्चों की पढ़ाई तक छूट गई.

वो कहते हैं, "खाली हाथ घर लौट रहे हैं, आगे की ज़िंदगी कैसे चलेगी कुछ नहीं पता."

डेढ़ साल बाद वतन लौट रहे अब्दुल सलाम को महसूस हो रहा है कि जैसे वो क़ैद से आज़ाद हुए हों.

उन्होंने कहा, "मेरे पास कोई पैसे नहीं थे तो घरवालों के लिए कुछ नहीं ला पाया. कुछ दोस्तों ने बच्चों के लिए तोहफ़े दिए हैं. क़र्ज़ लेकर सऊदी अरब गया था. लौट रहा हूँ तो ये क़र्ज़ और बढ़ गया है. भारत सरकार ने अगर सऊदी कंपनी से हमारी सैलरी का पैसा नहीं दिलाया तो ज़िंदगी बहुत मुश्किल हो जाएगी."

वो कहते हैं, "वहां मैंने एक ही चीज़ सीखी. भूखे रहना. कई दिनों तक 24 घंटों में से सिर्फ़ एक ही बार खाने को मिलता था. बीवी से बात करने की हिम्मत नहीं होती थी. घरवालों को झूठे दिलासे देता रहता था कि सब ठीक है."

सऊदी अरब में भारतीय दूतावास ने इन कामगारों को भरोसा दिलाया है कि उनका बकाया वेतन दिलवाया जाएगा.

इन कामगारों की बेहतर ज़िंदगी की उम्मीदें अब इस बकाया वेतन पर ही टिकी हैं.

25 साल के ख़ुर्शीद आलम 19 साल की उम्र में पैसा कमाने सऊदी अरब गए थे. वो कहते हैं, "पैसा तो नहीं, साथ में शुगर और हाई बीपी की बीमारी लेकर लौट रहा हूं."

लेकिन उन्हें उम्मीद है कि भारत सरकार उनका बकाया पैसा दिलवा देगी.

वो कहते हैं, "हमारा पैसा बहुत मेहनत का है, हमें भरोसा है कि हमारी सरकार हमें हमारा हक़ दिलवाएगी."

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