खिलाड़ियों को बीएमडब्ल्यू देने वाले चामुंडी

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हैदराबाद के 57 साल के वानिका चामुंडेश्वरनाथ बीते दो दशक के दौरान 17 महंगी कारें अलग-अलग खिलाड़ियों को गिफ़्ट कर चुके हैं.

इनमें पी. गोपीचंद से लेकर पीवी सिंधु, सायना नेहवाल से लेकर मिताली राज जैसे अलग-अलग खेलों के खिलाड़ी शामिल हैं.

वानिका चामुंडेश्वरनाथ जिन्हें प्यार से उनके दोस्त चामुंडी भी कहते हैं, इसे अपनी ओर से खिलाड़ियों की मुश्किलों को कम करने की कोशिश मानते हैं.

बीबीसी से बात करते हुए उन्होंने बताया, "मैं ख़ुद एक क्रिकेटर रहा हूं. मुझे मालूम है कि एक अच्छे स्पोर्ट्स किट की कमी से खिलाड़ी को कितना नुकसान हो सकता है. मेरी कोशिश यही है कि मैं खिलाड़ियों को आगे बढ़ने में उनकी मदद कर सकूं."

2001 में भारत के पुलेला गोपीचंद ने जब ऑल इंग्लैंड बैडमिंटन चैंपियनशिप का ख़िताब जीता था, तब चामुंडी ने उन्हें हुंडई एक्सेंट कार भेंट की थी. तब से वे शायद ही कोई साल ऐसा गुजरा है जब चामुंडी ने किसी खेल प्रतिभा को प्रमोट नहीं किया हो.

वे कैसे खिलाड़ियों की मदद कर पाते हैं, पूछे जाने पर चामुंडी ने कहा, "देखिए अपनी ओर से मैं कुछ पैसे जोड़ता हूं, कुछ दोस्तों से बात करता हूं. सोच विचारकर हम लोग कुछ ना कुछ कर ही लेते हैं."

अब ये कुछ ना कुछ क्या हो सकता है, इसका अंदाज़ा रियो ओलंपिक में पदक जीतने वाले खिलाड़ियों को मिले बीएमडब्ल्यू देने से लगाया जा सकता है. चामुंडी ने पहले पहल पीवी सिंधु और उनके कोच पुलेला गोपीचंद को ही बीएमडब्ल्यू देने का मन बनाया था.

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इसके बाद कैसे चार खिलाड़ियों को बीएमडब्ल्यू दिया गया, इसके बारे में चामुंडी बताते हैं, "खिलाड़ियों को बीएमडब्ल्यू देने की बात जब सचिन तेंदुलकर से शेयर किया. तो उन्होंने कहा कि साक्षी मलिक और दीपा कर्मकार की उपलब्धि भी बड़ी है. उन्हें भी कार देना चाहिए. सचिन का साथ मिला तो कोई मुश्किल ही नहीं रही."

हालांकि दीपा कर्मकार ने जब अगरतला में बीएमडब्ल्यू कार को रखने में असमर्थता जताई तो चामुंडी ने दीपा के बैंक खाते में 25 लाख रुपये जमा कराए ताकि दीपा कर्मकार इन पैसों से अपनी पसंद की गाड़ी ले सकें और बेहतर ट्रेनिंग हासिल कर पाएं.

ये ही है चामुंडी की ख़ासियत. उनके दोस्तों में सचिन तेंदुलकर से लेकर मोहम्मद अज़हरुद्दीन जैसे क्रिकेटर तो हैं, आंध्र प्रदेश की राजनीति और कारोबार से जुड़ी शख्सियतें भी हैं. जिसके चलते वे प्रतिभाशाली खिलाड़ियों की अपनी हैसियत से भी अधिक मदद करते रहे हैं.

इसका एक उदाहरण तब देखने को मिला था, जब पुलेला गोपीचंद 2001 में ऑल इंग्लैंड बैडमिंटन चैंपियन बनने के बाद हैदराबाद में एक अकादमी खोलना चाह रहे थे. अकादमी खोलने के तमाम हिसाब किताब के बाद करोड़ों रुपये की जरूरत पड़ रही थी.

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चामुंडी उस वाकये के बारे में बताते हैं, "गोपीचंद ने जब मुझे बताया तो मुझे लगा कि कुछ करना चाहिए, हैदराबाद के बिजनेसमैन निमागडा प्रसाद से बात की, वे पांच करोड़ रुपये की मदद के साथ तैयार हो गए और अकादमी बन गया."

अगर ये अकादमी नहीं बनती तो भारत को सायना नेहवाल, पी.वी. सिंधु, के. श्रीकांत, पी. कश्यप जैसे सितारे नहीं मिलते. गोपीचंद अकादमी बनवाने के अगले ही साल सायना नेहवाल महज 12 साल की थीं, उन्हें एक टूर्नामेंट में जर्मनी जाने के लिए पैसों की सख़्त जरूरत थी.

जब चामुंडी को ये पता चला तो उन्होंने 25 हज़ार रुपये का चेक सायना को दिया तब जाकर वे टूर्नामेंट में हिस्सा लेने जा पाईं.

2002 में भारत को टेनिस की दुनिया सानिया मिर्ज़ा जैसी सनसनी मिली. सानिया ने विबंलडन में गर्ल्स डबल्स का ख़िताब जीता. तब चामुंडी ने सचिन की मदद से ही सानिया मिर्जा को फिएट पैलियो कार गिफ़्ट किया था.

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चामुंडी बताते हैं कि क्रिकेट को छोड़कर दूसरे खेलों में खिलाड़ियों की मदद करने वाले लोग कम हैं, ऐसे में उनका इरादा दूसरे खेलों के खिलाड़ियों की मदद की ज़्यादा रही है.

चामुंडी बताती हैं, "विजयवाड़ा का 15 साल का एक लड़का मदद के लिए आया था, शतरंज खेलता था. मुझे लगा मदद करनी चाहिए. उसे प्रायोजित करना शुरू किया. वो ललित बाबू अब ग्रैंड मास्टर बन चुका है."

चामुंडी की इस मदद से खिलाड़ियों पर गहरा असर होता है. दीपा कर्मकार ने कार लौटाने की बाद बीबीसी से बात करते हुए कहा था कि चामुंडी सर की भेंट को वो लौटाना नहीं चाहती थीं लेकिन उनके सामने दूसरा चारा ही नहीं बचा था.

चामुंडी किस खिलाड़ी को किस तरह की मदद की जरूरत है, इसे भी भांप जाते हैं. मसलन, पीवी सिंधू सिकंदराबाद से गोपीचंद अकादमी तक आती थीं, दूरी ज़्यादा नहीं थी लेकिन आने जाने की मुश्किल थी, तो पहले चामुंडी ने उन्हें स्विफ्ट कार भेंट की ताकि वे आसानी से प्रैक्टिस करने के लिए घर से आ जा सकें.

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द्युति चंद जब लिंग पहचान के विवाद से उबरने के बाद ट्रैक पर लौटने की कोशिशों में जुटी थीं, तब चामुंडी मदद करने के लिए आगे आए. उन्होंने ना केवल उन्हें प्रायोजित किया बल्कि रियो ओलंपिक में क्वालिफ़ाई करने पर पांच लाख रुपये की मदद भी की.

महिला क्रिकेटर मिताली राज, जब भारतीय टीम की कप्तान भी नहीं बनी थीं, तब चामुंडी ने उन्हें शेवर्ले कार भेंट की थी. मिताली के अलावा चामुंडी ने पुरुष बैडमिंटन के भारतीय सितारे के. श्रीकांत और पी कश्यप को भी कारें भेंट कर चुके हैं. पी वी संधु और पुलेला गोपीचंद तो तीन-तीन कारें हासिल कर चुके हैं.

चामुंडी ने 2014 में चाइना सुपर बैडमिंटन सीरिज़ का ख़िताब जीतने पर के. श्रीकांत और 2014 कॉमनवेल्थ खेलों में गोल्ड मेडल जीतने पर पी कश्यप को फ़ोर्ड इको स्पोर्ट्स कार गिफ़्ट दी थी.

हाल ही में सचिन तेंदुलकर के साथ मिलकर चामुंडी ने पैरालंपिक खिलाड़ियों की मदद की है. चामुंडी ने बताया, "सचिन ने 50 लाख रुपये मिलाए और मैंने भी 50 लाख रुपये मिला कर एक करोड़ रुपये से पैरालंपिक एथलीटों की मदद करने का फ़ैसला लिया."

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Image caption भारतीय महिला क्रिकेटर मिताली राज की भी मदद कर चुके हैं चामुंडी

ऐसा भी नहीं चामुंडी को लेकर विवाद नहीं हुए हैं. उन पर 2009 में आंध्र प्रदेश क्रिकेट की कुछ महिला क्रिकेटरों ने यौन शोषण के आरोप भी लगाए थे. इन आरोपों पर चामुंडी कहते हैं, "आरोप तो क्रिकेट एसोसिएशन में मेरे विरोधियों ने लगाए थे, जो बेबुनियाद थे, ख़त्म हो चुके हैं."

दरअसल चामुंडी आंध्र प्रदेश के क्रिकेटर रहे हैं. वे आंध्र प्रदेश की ओर से पहले अंडर-19 टीम के कप्तान रहे हैं. 1988-89 से लेकर 1990-91 तक आंध्र प्रदेश रणजी क्रिकेट टीम की कप्तानी भी उन्होंने की है.

क्रिकेट के इस अनुभव की बदौलत भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड की जूनियर टीम की चयन समिति के अध्यक्ष भी रह चुके हैं. 2009 में इंग्लैंड में खेले गए वर्ल्ड टी20 के दौरान वे टीम इंडिया के मैनेजर भी रह चुके हैं.

उसके बाद में वे बैडमिंटन से जुड़ गए. वे हैदराबाद बैडमिंटन संघ के अध्यक्ष हैं, साथ ही तेलंगाना बैडमिंटन एसोसिएशन के उपाध्यक्ष भी.

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Image caption इस तस्वीर में वानिका चामुंडी लॉर्ड्स के पवेलियन में एम. एस. धोनी के साथ नज़र आ रहे हैं.

लेकिन उनके पास आमदनी का स्रोत क्या है, ये सवाल पूछे जाने पर चामुंडी कहते हैं, "देखिए क्रिकेटर के तौर पर जो थोड़े बहुत पैसे कमाए थे, बैनिफिट मैच से जो पैसा मिला था, उन सबको मैंने रियल एस्टेट के कारोबार में लगाया था. रियल एस्टेट का कारोबार बढ़ा तो फ़ायदा हुआ. फिलहाल आंध्र प्रदेश में एक निजी पोर्ट का प्रमोटर भी हूं और कुछ अस्पतालों में शेयर भी है."

लेकिन खिलाड़ियों की मदद करने के चामुंडी के स्वभाव पर परिवार वालों का रवैया क्या होता है, ये पूछे जाने पर चामुंडी बताते हैं, "परिवार वालों को कोई शिकायत नहीं होती. एक बेटा और एक बेटी है, दोनों सेट हो चुके हैं. बेटा अमरीका में एमबीए कर रहा है. लगभग सेट होने वाला है. बेटी ने आईएसबी हैदराबाद से एमबीए किया हुआ है. परिवार वालों और दोस्तों की मदद से ही तो मैं ये सब कर पाता हूं."

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