'पांच सौ का नोट कोई लेता नहीं, खुदरा है नहीं'

  • 13 नवंबर 2016
इमेज कॉपीरइट Manish Shandilya

केंद्र सरकार ने पांच सौ और एक हजार के नोट बंद कर दिया. इसके बाद चार दिन बीत चुके हैं.

लेकिन सरकार के इस फ़ैसले के कारण ग्रामीण इलाकों में भी कई तरह की परेशानियों का सामना लोग कर रहे हैं.

गांवों में छोटी-बड़ी खरीदारी आज भी लगभग नगद में ही होती है. लेकिन अभी गांवों में भी नगदी की बहुत कमी देखी जा रही है.

ऐसे में यहां के दुकानदार से लेकर खरीददार यानी कि गांव वालों के सामने अलग-अलग दिक्कतें पेश आ रही हैं.

पटना के संपतचक ब्लॉक के मित्तनचक के बटेश्वर मांझी बताते हैं, ''हाट-बाजार में दुकानदार खुदरा खोजते हैं. पांच सौवा नोट उ सब लेबे नहीं करते हैं और खुदरा हमनी के पास है नहीं.''

इमेज कॉपीरइट Manish Shandilya
Image caption फ़ैजाबाद गांव

बटेश्वर के मुताबिक खुदरा नहीं होने के कारण वे बीते दो दिनों में घर के लिए किरासन तेल से लेकर अपने लिए बुखार की दवा तक नहीं खरीद सके.

साथ ही उन्हें यह भी अच्छे से नहीं मालूम कि उनके पास जो कुछ पांच सौ के नोट हैं, वे बदले कैसे जाएंगे.

वहीं सदानी चक गांव में दवा की दुकान चलाने वाले गौतम कुमार की परेशानी कुछ दूसरे तरह की है.

गौतम बताते हैं, ''मेरे पास आमतौर पर जान-पहचान वाले ही दवा खरीदने आते हैं. ऐसे में न तो उनसे पांच सौ और हजार के नोट लेते बना रहा है और न ही उन्हें उधार देने से मना कर पा रहा हूं.''

इमेज कॉपीरइट Manish Shandilya
Image caption सदानी चक गांव में दवा की दुकान चलाने वाले गौतम कुमार

गौतम का कहना है कि बीते तीन दिनों से वे पहले के मुकाबले दोगुना दवा उधार में बेच रहे हैं. साथ ही उनकी परेशानी यह भी है कि दवा कंपनी वाले न तो अब उधार देने को तैयार हैं और न ही बंद हुए नोट लेकर दवा देने को.

गांव में सबसे ज्यादा चहल-पहल रोजमर्रा की जरूरतें पूरा करने वाली किराना दुकानों पर देखी जाती है.

भोगीपुर गांव में किराना दुकान चलाने वाले शिव प्रकाश गुप्ता ने बताया, ''ज्यादातर कस्टमर पांच सौ का नोट लेकर आ रहे हैं जिन्हें हम ले नहीं रहे हैं. ऐसे में बीते तीन दिनों से लोग बहुत कम खरीददारी कर रहे हैं. मेरी रोज की बिक्री करीब आधी रह गई है.''

इमेज कॉपीरइट Manish Shandilya
Image caption शिव प्रसाद गुप्ता भोगीपुर गांव में किराना दुकान चलाते हैं.

साथ ही शिव प्रकाश को भी दवा दुकानदार गौतम की तरह अब उधार में कारोबार ज्यादा करना पड़ रहा है. महाजन उन्हें भी अब उधार में सामन देने से हाथ खड़े करने लगे हैं.

वहीं चकपुर गांव के अनिल पासवान की परेशानी पांच सौ के बंद किए नोट बदले जाने के बावजूद दूर नहीं हुई.

उन्हें पहले पांच सौ के बंद हुए नोट से जरूरी सामान खरीदने में दिक्कतें हो ही रही थीं. लेकिन आज जब उन्होंने बैंक जाकर नोट बदलवाया तो उन्हें दो-दो हजार के दो नोट थमा दिए गए.

अनिल ने बताया, ''मांगने पर भी मुझे सौ-सौ का नोट नहीं मिला. पांच सौ के नोट के चलते होने वाली परेशानी अब दो हजार के नोट के कारण और बढ़ जाएगी.

साथ ही अनिल की एक परेशानी यह भी है कि काम करने के बावजूद अभी उन्हें मजदूरी भी नहीं मिल पा रही है.

इमेज कॉपीरइट Manish Shandilya
Image caption भेलवाड़ा गांव के मनीष कुमार

भेलवाड़ा गांव के मनीष कुमार के दादा की मौत बीते महीने के अंत में हो गई थी. अभी उनके यहां श्राद्ध-कर्म से जुड़े आयोजन होने बाकी ही थे कि 'नोटबंदी' लागू हो गई.

मनीष के बताया, ''अचानक बड़े नोट बंद किए जाने के कारण सब्जी खरीदने से लकर गैस सिलिंडर तक का दंतजाम करने में भारी परेशानी का सामना करना पड़ा.''

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)

बीबीसी न्यूज़ मेकर्स

चर्चा में रहे लोगों से बातचीत पर आधारित साप्ताहिक कार्यक्रम

सुनिए