जब पीलू ने कहा, 'I am a CIA Agent'

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पीलू मोदी

सत्तर के दशक में पीलू मोदी ने भारतीय संसद को जितना हंसाया है उतना शायद किसी ने नहीं. कांग्रेस के एक सांसद जे सी जैन की आदत थी कि वो अक्सर पीलू मोदी के भाषणों में व्यवधान पैदा किया करते थे. एक दिन पीलू को उन पर गुस्सा आ गया और उन्होंने जैन से कहा, "स्टॉप बार्किंग." यानि कि भौंकना बंद कीजिए.

उनका ये कहना था कि जैन ने आसमान सिर पर उठा लिया. वो चिल्लाए, "अध्यक्ष महोदय, ये मुझे कुत्ता कह रहे हैं. यह असंसदीय भाषा है." उस समय सदन की अध्यक्षता कर रहे हिदायतउल्लाह ने आदेश दिया, "पीलू मोदी ने जो कुछ भी कहा वो रिकॉर्ड में नहीं जाएगा."

मोदी कहाँ चुप रहने वाले थे. वह बोल पड़े, "ऑल राइट देन, स्टॉप ब्रेइंग (यानी रेंकना बंद करो)." जैन को ब्रेइंग शब्द का माने नहीं पता था, इसलिए वो चुप रहे. और वो शब्द राज्यसभा की कार्रवाई के रिकॉर्ड से आज तक नहीं हटाया गया.

सत्तर के दशक में भारत में जो कुछ भी गलत हो रहा था, उसका ठीकरा अमरीकी ख़ुफ़िया एजेंसी सीआईए के सिर फोड़ने का एक फ़ैशन सा बन चुका था. पीलू मोदी ने आव देखा न ताव. वो एक दिन राज्यसभा में अपने गले में एक प्लेकार्ड लटकाए पहुंच गए जिस पर लिखा था, "आई एम ए सीआईए एजेंट."

पीलू मोदी को नज़दीक से जानने वाले पूर्व मंत्री आरिफ़ मोहम्मद ख़ाँ बताते हैं, "पीलू की ख़ूबी ये थी कि वो अपना मज़ाक ख़ुद बनाते थे. असली हास्य वही होता है जब उसमें ख़ुद को भी न बख़्शा जाए. जब वो सीआईए एजेंट का प्लेकार्ड गले में डाल कर संसद के सेंट्रल हॉल में पहुंचे तो इसके पीछे उनकी मंशा यही थी."

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वरिष्ठ पत्रकार विजय सांघवी बीबीसी स्टूडियो में.

लेकिन पीलू मोदी की विनोदप्रियता का मतलब ये नहीं लगाया जाना चाहिए कि उनमें गांभीर्य नहीं था.

पीलू मोदी के नज़दीक रहे वरिष्ठ पत्रकार विजय सांघवी याद करते हैं, "मेरी नज़र में वो बहुत ज़िदादिल इंसान थे. उनके पास बेइंतहा ह्यूमर और विनोद था, लेकिन वो राजनीति को बहुत गंभीरता से देखते थे. जब उन्होंने अपनी पार्टी का लोक दल में विलय किया तो उन्होंने चौधरी चरण सिंह से कहा था, चौधरी साहब हमें सबसे पहले गांवों के अंदर सार्वजनिक शौचालय बनाने चाहिए. चौधरी साहब हंसने लगे और बोले पीलू आप ये क्या बात कर रहे हैं? पीलू ने कहा चौधरी साहब आप गाँवों में बड़े ज़रूर हुए हैं लेकिन आपने एक बात नहीं नोट की कि पब्लिक टायलेट्स के अभाव में भारत की गरीब महिलाओं के शारीरिक बनावट में जो अंतर आ रहा है, वो उनके लिए बहुत ख़तरनाक हो सकता है. तब चौधऱी चरण सिंह को लगा कि ये तो बहुत गंभीर किस्म का आदमी है. जब चौधरी चरण सिंह प्रधानमंत्री बने तो उन्होंने एक बार उनके मुंह पर ही कह दिया कि आपके लिए तो हिंदुस्तान झांसी तक है. इसके आगे तो आपको पता ही नहीं है."

राजनीतिक रूप से इंदिरा गांधी के विरोधी होते हुए भी व्यक्तिगत तौर पर दोनों एक दूसरे को पसंद करते थे. विजय सांघवी कहते हैं, "इंदिरा और पीलू बहुत अच्छे मित्र थे. इंदिरा गाँधी संसद में दिए गए पीलू मोदी के किसी भी भाषण को छोड़ती नहीं थीं. भाषण सुनने के बाद वो अकसर पीलू को अपने हाथ से चिट्ठी लिख कर कहती थीं, कि तुमने बहुत अच्छा बोला. पीलू मोदी उसका जवाब भी देते थे और चिट्ठी के अंत में लिखते थे, पीएम.

एक बार दोनों के बीच नोकझोंक चल रही थी. पीलू ने कहा, "आई एम ए परमानेंट पीएम, यू आर ओनली टेंपेरेरी पीएम. इस पर इंदिरा गाँधी हंसने लगीं. पीलू मोदी ने कहा पीएम का मतलब है पीलू मोदी."

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आरिफ मोहम्मद खान राजीव गांधी के मंत्रिमंडल के सदस्य थे.

आरिफ़ मोहम्मद ख़ाँ बताते हैं, "1969 के कांग्रेस विभाजन के दौरान इंदिरा गांधी अक्सर पीलू को अपने पास बुलाया करती थीं. पीलू ने मुझे खुद बताया कि इंदिरा गाँधी ने उन्हें एक हफ़्ते में तीन बार स्लिप भेज कर अपने संसद के दफ़्तर में बुलवाया. उस ज़माने में इंदिरा गांधी की सरकार अल्पमत में थी. ज़ाहिर है वो कांग्रेस में विभाजन की वजह से कुछ विपक्षी दलों का सहयोग लेना चाह रही थीं. वो अपने हाथ से चाय बना कर पीलू को सर्व करती थीं. पीलू ने कहा जब इंदिरा गांधी ने उन्हें तीसरी बार इस तरह से बुलाया तो उन्होंने जाने से मना कर दिया. जब इंदिरा उनसे मिलीं तो उन्होंने पूछा कि पीलू आप आए नहीं. पीलू ने कहा कि मैं जानबूझ कर नहीं गया, क्योंकि आपका व्यक्तित्व इतना आकर्षक है कि अगर तीसरी बार मैं आपसे मिलता तो आपको सपोर्ट करने लगता. ये जुमला सिर्फ़ पीलू मोदी ही कह सकते थे."

एक दिन पीलू मोदी को पता चल गया कि इंदिरा गांधी संसद में बहस के दौरान क्रॉसवर्ड पज़ल हल करती हैं.

विजय सांघवी बताते हैं, "इंदिरा गांधी जब चार बजे संसद में घुसती थीं तो उनके हाथ में ईवनिंग न्यूज़ की क्रॉसवर्ड पज़ल होती थी. मेरी सीट पत्रकार दीर्घा में इंदिरा गांधी के बिल्कुल अपोज़िट थी और मुझे ऊपर से साफ़ दिखाई देता था कि वो क्या कर रही हैं. मुझे उनसे बहुत जलन होती थी, क्योंकि मुझे भी क्रॉसवर्ड पज़ल हल करने का बहुत शौक था. लेकिन मैं पत्रकार दीर्घा में रहने के कारण चार बजे बाहर नहीं जा सकता था. मैंने पीलू मोदी को ये बात बताई. उन्होंने कहा अगली बार इंदिरा गांधी ऐसा करे तो तुम मुझे बता देना. अगली बार जब इंदिरा ने क्रॉसवर्ड पज़ल हल करना शुरू किया तो मैंने ऊपर से ही इशारे से पीलू को बता दिया. पीलू अचानक खड़े हो कर बोले, 'सर प्वाएंट ऑफ़ ऑर्डर. स्पीकर संजीव रेड्डी ने कहा, व्हाट प्वाएंट ऑफ़ ऑर्डर. देयर इज़ नो मैटर इन फ़्रंट ऑफ़ हाउस.'

पीलू बोले, क्या कोई सांसद संसद में क्रॉसवर्ड पज़ल हल कर सकता है? यह सुनते ही इंदिरा गांधी के हाथ रुक गए. बाद में उन्होंने पीलू को एक नोट लिख कर पूछा, तुम्हें कैसे पता चला? पीलू का जवाब था, मेरे जासूस हर जगह पर हैं."

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आपातकाल के दिनों में पीलू को इंदिरा सरकार ने जेल भेज दिया था.

1975 में आपातकाल के दौरान अन्य विपक्षी नेताओं की तरह पीलू मोदी को भी गिरफ़्तार कर रोहतक जेल भेज दिया गया. वहाँ तबसे बड़ी समस्या थी, पीलू मोदी की पसंद का शौचालय न होना.

पीलू को नज़दीक से जानने वाली सेमिनार पत्रिका की संपादक मालविका सिंह अपनी किताब परपेच्अल सिटी- ए शॉर्ट बायोग्राफ़ी ऑफ़ डेल्ही में लिखती हैं, "जब पीलू मोदी को 26 जून, 1975 को गिरफ़्तार कर रोहतक जेल भेजा गया तो उनके लिए सबसे बड़ी परेशानी का सबब था, वहाँ पश्चिमी स्टाइल के कमोड का न होना. उन्होंने इंदिरा गाँधी को संदेशा भेज अपनी परेशानी बताई. उसी शाम बैठ कर पॉटी करने वाली जगह के दोनों ओर सिमेंट का प्लेटफ़ार्म बनवाया गया, ताकि पीलू को शौच क्रिया में कोई तकलीफ़ न हो. इंदिरा गाँधी की शख्सियत की ये अजीब बात थी कि वो अपने राजनीतिक विरोधियों को जेल में भेजने के बावजूद, उनसे हमेशा संपर्क में रहती थीं."

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1975 में कनॉट प्लेस में जेपी और राजनारायण के साथ पीलू मोदी.

रोहतक जेल का ही एक रोचक किस्सा विजय सांघवी सुनाते हैं जब वो पीलू के उनके कुत्तों को मिलवाने ले जाया करते थे, "जब पीलू मोदी जेल के अंदर ले जाए गए, तो मैं उनके तीन कुत्तों को उनसे मिलवाने ले जाया करता था. सबसे छोटे कुत्ते का नाम था छोटू. तीनों कुत्ते देखने में बहुत ख़तरनाक थे. जैसे ही कुत्ते दिखाई देते थे, सारे संतरी भाग जाते थे. तब मैं और पीलू अकेले में बात किया करते थे. लेकिन मुझे ताज्जुब होता था कि पीलू और दूसरे कैदियों को सब पता होता था कि बाहर क्या हो रहा है. मैं अपने साथ उनके खाने पीने के सामान के साथ उनके लिए बहुत सारी किताबें भी ले कर जाया करता था."

पीलू मोदी बहुत ज़बरदस्त मेहमाननवाज़ थे. लोग उनकी दावतों में शामिल होना अपनी ख़ुशनसीबी समझते थे. मशहूर पत्रकार सुनील सेठी को कई बार उनके घर खाना खाने का सौभाग्य मिला था. सेठी याद करते हैं, "मैं आपातकाल की घोषणा होने से पहले संसद कवर करता था. कई बार मैंने उन्हें इंटरव्यू किया. एक दो बार उन्होंने मुझे अपने घर पर खाने पर भी बुलाया. वो हमेशा सफ़ेद बर्राक कलफ़ लगा हुआ कुर्ता पायजामा पहनते थे और उसके ऊपर शॉल ओढ़ते थे. उनकी मेहमाननवाज़ी कोई नहीं भूल सकता. क्या खाना खिलाते थे! चाहे पारसी खाना हो या यूरोपियन या हैदराबादी, उन्हें खाने का बहुत शौक था. कुल मिला कर वो शौकीन और रंगीन इंसान थे. उन्होंने दून स्कूल में शिक्षा प्राप्त की थी और फिर वो आर्किटेक्चर पढ़ने अमरीका चले गए थे."

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पीलू मोदी की 90वीं जयंती पर विवेचना

पीलू मोदी के सबसे नज़दीकी दोस्त थे पाकिस्तान के राष्ट्रपति ज़ुल्फ़िकार अली भुट्टो. दोनों न सिर्फ़ मुंबई में साथ साथ बड़े हुए थे, बल्कि अमरीका में साथ साथ पढ़े भी थे. जब भुट्टो जुलाई 1972 में शिमला समझौते पर दस्तख़त करने भारत आए तो उन्होंने पीलू से मिलने की इच्छा प्रकट की. पीलू शिमला पहुंचे और शिमला बातचीत के दिलचस्प पहलुओं का ज़िक्र उन्होंने अपनी किताब 'ज़ुल्फ़ी माई फ़्रेंड' में किया है.

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शिमला समझौते के वक्त इंदिरा गांधी और जुल्फिकार, साथ में बेनजीर.

पीलू लिखते हैं, "एक क्षण के लिए जब बिलियर्ड्स रूम का दरवाज़ा थोड़ा सा खुला, तो ये दृश्य कैमरे में कैद करने लायक था. लेकिन सैकड़ों फ़ोटोग्राफ़रों की मौजूदगी के बावजूद ऐसा हो नहीं पाया. मैंने देखा जगजीवन राम बिलियर्ड्स की मेज़ के ऊपर बैठे हुए थे और इंदिरा गाँधी मेज़ पर झुकी शिमला समझोते के मसौदे से माथापच्ची कर रही थीं. चव्हाण और फ़ख़रुद्दीन अली अहमद भी मेज़ पर झुके हुए थे और उन सब को नौकरशाहों के समूह ने घेर रखा था. दस बजकर पेंतालिस मिनट पर जब भुट्टो और इंदिरा गाँधी समझौते पर दस्तख़्त करने के लिए राज़ी हुए, तो पता चला कि हिमाचल भवन में कोई इलेक्ट्रॉनिक टाइप राइटर ही नहीं है. आनन फानन में ओबेरॉय क्लार्क्स होटल से टाइप राइटर मंगवाया गया. तभी पता चला कि पाकिस्तानी दल के पास उनकी सरकारी मोहर ही नहीं है, क्योंकि उसे पहले ही पाकिस्तान प्रतिनिधिमंडल के सामान के साथ वापस भेजा जा चुका था. अंतत: शिमला समझौते पर बिना मोहर के ही दस्तख़त हुए. समझौते से पहले मैंने देखा कि कुछ भारतीय अफ़सर, साइनिंग टेबिल पर मेज़पोश बिछाने की कोशिश कर रहे थे और हर कोई उसे अलग अलग दिशा में खींच रहा था. उन्होंने सारे इंतेज़ामों की बार-बार जाँच की, लेकिन जब समझौते पर दस्तख़त करने का वक्त आया तो भुट्टो की कलम चली ही नहीं. उन्हें किसी और का कलम ले कर दस्तख़त करने पड़े."

जब पीलू संसद में भाषण देते थे तो उनके विरोधी भी उनकी बात सुनते थे. चुहलबाज़ी और मज़ाक करने की उनकी अदा के भी लोग कायल थे. विजय सांघवी बताते हैं, "जब हम प्रेस गैलरी में ऊपर बैठते थे तो बेंच गिरा कर नीचे बैठे सांसदों का ध्यान खींचते थे. जब वो ऊपर देखते थे तो हम इशारे से उनसे बात भी कर लेते थे. एक बार डिप्लोमैटिक गैलरी में एक बहुत ही सुंदर कन्या आकर बैठी हुई थी. वो वेनेज़ुएला की एक डिप्लोमैट थी. पूर्व विदेश मंत्री श्यामनंदन मिश्रा लगातार उस लड़की की तरफ़ देखे जा रहे थे. पीलू, मोदी दिनेश सिंह से कुछ बात कर रहे थे. मैंने बेंच गिरा कर उनका ध्यान खींचा और पहले श्याम बाबू की तरफ़ इशारा किया और फिर डिप्लोमैटिक गैलरी की तरफ़. पीलू चिल्ला कर बोले, श्याम वॉट आर यू डुइंग ? श्याम बाबू झेंप गए. बाद में उन्होंने पीलू से पूछा, तुम्हें कैसे पता चला? पीलू ने कहा ये मैं तुम्हें नहीं बताउंगा."

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