#100Women: आधी रात को सड़कों पर निकलती हैं ये औरतें

  • दिव्या आर्य
  • बीबीसी संवाददाता
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100 वुमेन: औरतों की तफ़री

हर महीने नेहा सिंह आधी रात को तफ़री करने का एक मेसेज अपने व्हाट्सऐप ग्रुप की 100 औरतों को भेजती हैं.

फिर तारीख़ और रास्ते पर बहस होती है. कुछ औरतें तैयार होती हैं और मुंबई की सड़कों पर आधी रात से तीन बजे तक घूमने-फिरने की योजना पक्की हो जाती है.

ये ऐसा व़क्त होता है जब आम तौर पर औरतें बिना मर्दों को साथ लिए घर से बाहर नहीं निकलतीं.

मुंबई क्या देश के किसी भी इलाके में, रौशन सड़कों पर भी औरतें असुरक्षित महसूस करती हैं.

लेकिन ऐसा लगता है कि इन औरतों ने डर से किनारा कर लिया है.

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सेलीना जॉन, देवीना कपूर, अर्चना पटेल नंदी और नेहा सिंह

जिस रात मैं इनकी तफ़री में शामिल होने का फ़ैसला करती हूं, उस दिन चार औरतें इकट्ठा हुई हैं. इनमें से एक, सेलीना जॉन ने शॉर्ट्स और स्लीवलेस टॉप पहने हुए हैं.

वो कहती हैं, "रात के लिए मैं अलग तरह के कपड़े क्यों पहनूं?"

सेलीना के मुताबिक, "हम अपने कपड़े जितनी आज़ादी से चुनेंगे हमें वैसे ही देखने कि लोगों को भी आदत हो जाएगी और हम औरतों की ओर उनके रवैये को कुछ बदल पाएंगे."

निर्भया कांड के बाद कड़े हुए क़ानून

भारत में इन रवैयों को बदलने पर बहस साल 2012 में दिल्ली में 'निर्भया' के बलात्कार के बाद शुरु हुई.

निर्भया की मौत से दुनियाभर में आक्रोश दिखा और भारत ने औरतों के ख़िलाफ़ हिंसा की रोकथाम के लिए बने क़ानून और कड़े किए.

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नेहा सिंह (दाएं) ने 'वाय लौएटर' की शुरुआत की.

सड़कों पर उतरे हज़ारों प्रदर्शनकारियों में से एक नेहा सिंह भी थीं. उसी दौरान उन्होंने 'वाय लौएटर' नाम की किताब पढ़ी.

इसमें सार्वजनिक जगहों पर आज़ादी से घूमने-फिरने के हक़ के बारे में लिखा गया था जिससे प्रेरित हो नेहा ने उसी नाम का औरतों का ग्रुप बनाया.

नेहा की पहल एक हिंसक घटना पर उबले गुस्से से शुरू हुई. पर उनके मुताबिक वो इसे इतने सालों तक इसलिए बरक़रार रख पाई हैं क्योंकि ये कोशिश ख़ुद को ख़ुशी और आज़ादी देने से जुड़ी है.

पेंट उतारे आदमी का वीडियो

नेहा मानती हैं कि अपना हक़ जताने के इस तरीके में ख़तरे हैं, जैसे एक बार जब एक आदमी कार से उतरा और उनके सामने पेंट उतार कर खुद को सहलाने लगा.

वो बताती हैं, "पर तफ़री की कई रातों के बाद हमने समझ लिया था कि ये हमारी ग़लती नहीं है, इसके लिए हम शर्मिंदा ना महसूस करें, तो मैं अपना फ़ोन निकाल उसका वीडियो बनाने लगी, बोली कि ये तो यूट्यूब पर ख़ूब फैल जाएगा और डर कर वो आदमी भाग खड़ा हुआ."

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साल 2015 में भारत में हर चार मिनट में, किसी न किसी औरत के ख़िलाफ़ यौन हिंसा का मामला सामने आया और पुलिस में केस दर्ज भी हुआ.

जानकारों के मुताबिक महिलाओं के ख़िलाफ़ हिंसा से जुड़े संशोधित क़ानून में यौन हिंसा की बदली परिभाषा और सख़्त सज़ा के प्रावधानों की वजह से ज़्यादा मामले पुलिस को रिपोर्ट होने लगे हैं.

कुछ औरतें इतना सशक्त महसूस कर रही हैं कि प्रभुत्व रखनेवाले मर्दों के ख़िलाफ़ बलात्कार और यौन उत्पीड़न की शिकायतें दर्ज करवा रही हैं.

रसूखदारों की भी होने लगी हैं शिकायतें

इनमें संयुक्त राष्ट्र के अंतर्राष्ट्रीय जलवायु परिर्वतन पैनल (आईपीसीसी) के पूर्व अध्यक्ष राजेंद्र पचौरी के ख़िलाफ़ काम की जगह पर यौन उत्पीड़न और तहलका मैगज़ीन के पूर्व संपादक तरुण तेजपाल के खिलाफ़ बलात्कार की शिकायत शामिल है.

हालांकि इन दोनों ने ही इन आरोपों को सिरे से ख़ारिज किया है और मामला कोर्ट में चल रहा है.

इनमें सबसे प्रमुख है भारत में शोध करने आई एक अमरीकी औरत की शिकायत पर बलात्कार के दोषी पाए गए फ़िल्मकार महमूद फ़ारुकी का.

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समीरा ख़ान चाहती हैं कि भारत की औरतों को पीड़ित ना समझा जाए.

'वाय लौएटर' किताब की सह-लेखक और पत्रकार समीरा खान के मुताबिक, भारत में औरतें अब अलग-अलग तरीकों से पुरानी सोच और रवैये को चुनौती दे रही हैं.

मुंबई में 'वाय लौएटर', दिल्ली में 'पिंजरा तोड़' और बेंगलूरू में 'ब्लैंक नॉएज़' जैसे समूहों की अगुवाई तो औरतें कर ही रही हैं, इन्हें मर्दों का समर्थन भी हासिल है.

समीरा के मुताबिक, "भारत की औरतें पश्चिमी देशों को संदेश देना चाहती है कि हमें सिर्फ़ हिंसा से पीड़ित के तौर पर ना देखा जाए."

वो कहती हैं, "हम अपनी जिंदगियों में आगे बढ़कर अधिकार मांग रही हैं, सवाल उठा रही हैं, ये समझ रही हैं कि अब समय आ गया है कि हिंसा का सामना कर उसे छिपाने की कोई ज़रूरत नहीं है."

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पांच बार विश्व बॉक्सिंग चैम्पियन रहीं मेरी कॉम

हाल ही में भारत की चोटी की खिलाड़ियों में से एक मेरी कॉम ने बताया कि अपने करीयर की शुरुआत में उन्हें भी यौन हिंसा का सामना करना पड़ा.

भारत में औरतें अपने साथ हुई यौन प्रताड़ना के बारे में कम बात करती हैं क्योंकि अक़्सर उन्हें ही उसका ज़िम्मेदार बताया जाता है.

बॉक्सिंग में पांच बार विश्व चैम्पियन रहीं, ओलंपिक में कांस्य पदक विजेता मेरी कॉम को भी अपनी आपबीति बताने का साहस जुटाने में एक दशक से ज़्यादा का व़क्त लगा.

जब मैं उन्हें मणिपुर के इम्फ़ाल में उनकी बॉक्सिंग अकादमी में मिली उन्होंने बताया कि तब वो एक आम खिलाड़ी थीं और उन्हें विश्वास नहीं था कि आवाज़ उठाने पर उन्हें समर्थन मिलेगा या नहीं.

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मेरी कॉम अपने तीनों बेटों के मन में औरतों के लिए बराबरी का भाव लाना चाहती हैं.

अब अपने प्रदेश को दुनिया के नक्शे पर ला देने के बाद और देश में हो रहे बदलाव को देखते हुए मेरी कॉम को लगा कि यहीं व़क्त है कि उन जैसी औरतें अपनी आवाज़ उठाएं.

मेरी कहती हैं, "भारत में हम इज़्ज़त का बोझ औरतों पर ही डालते हैं, पर मुझे लगता है कि औरतों को उनके ख़िलाफ़ हो रही हिंसा के लिए शर्मिंदा किया जाना ग़लत है."

कब बदलेगा समाज?

उनके मुताबिक जब औरतें अपनी आवाज़ उठाएंगी तभी समाज में बदलाव आएगा.

यहां तक कि बॉलीवुड भी औरतों की ओर समाज के रुख़ को सकारात्मक तरीके से दर्शाने लगा है.

लोकप्रिय सिनेमा में अक़्सर पीछा करने या बलात्कार की धमकी देने को प्यार जताने के तरीके के तौर पर दिखाया गया है.

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पर इसी साल रिलीज़ हुई फ़िल्म, 'पिंक' में इससे उलट एक औरत के 'ना' कहने के हक़ की बात कही गई है.

फ़िल्म के केंद्र में आज़ाद ख़्याल औरते हैं जो अपनी शर्तों पर ज़िंदगी जीना चाहती हैं और उसके लिए शर्मिंदगी नहीं महसूस करना चाहती.

सड़कों और घरों में बदलाव की सुगबुगाहट महसूस की जा सकती है.

नेहा सिंह की शादी होनेवाली है और वो बताती हैं कि उनके साथी उनकी मुहिम को पूरा समर्थन देते हैं.

नेहा का मानना है, "मैं उतनी ही आज़ाद होना चाहती हूं जितने इस देश के आदमी हैं, इससे कम में मैं क्यों मान जाऊं."

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