सोनपुर मेला में पसरा हुआ है सन्नाटा

  • मनीष शांडिल्य
  • बीबीसी हिंदीडॉटकॉम के लिए
सोनपुर मेला

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नोटबंदी का असर सोनपुर मेले में भी

500 और 1000 के नोटों को रद्द किए जाने के कारण इस बार का सोनपुर मेला बिना दुल्हन की बारात की तरह लग रहा है. विश्व प्रसिद्ध यह मेला पूरी तरह सज-धज कर तैयार है पर साथ में मायूसी भी पसरी है.

मेला का औपचारिक उद्घाटन दो दिन पहले 12 नवंबर को ही हो चुका है लेकिन कार्तिक पूर्णिमा के दिन से ही यहां मेला देखने वालों का रेला उमड़ता है.

कहा जाता है कि इस मेले में सूई से लेकर हाथी तक मिलता है. इसकी मुख्य पहचान एक बड़े पशु मेले के रूप में रही है.

प्रधानमंत्री मोदी ने जब 8 नवंबर की रात दो बड़े नोटों पर पाबंदी की बात कही तो यह मेले के लिए मातम से कम नहीं रहा. मेले में लोग खरीदारी एटीएम और क्रेडिट कार्ड से नहीं करते हैं.

ऐसे में इन नोटों का रद्द किया जाना मेला प्रेमियों और आयोजकों के लिए बेहद निराशाजनक रहा.

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पशु मेले भी नोटबंदी की असर

इस घोषणा का असर मेले साफ-साफ दिखाई दे रहा है.

सोनपुर के ओम प्रकाश सिंह के बागान में भी घोड़ा बाजार सजता है.

जब उनसे मुलाकात हुई तो वे मायूस दिख रहे थे.

उन्होंने बताया, ''बीते सालों में पूर्णिमा के दिन दोपहर तक 30 से 40 घोड़े के बच्चे बिक जाते थे. इस बार अब तक एक भी नहीं बिका है.'' छपरा जिले में आमी के भोला राय ओम प्रकाश सिंह के बागान में चार घोड़े लेकर पहुंचे हैं. भोला के मुताबिक़ खरीददारों की कम दिलचस्पी के कारण उन्हें अपने घोड़ों की कीमत कम रखनी पड़ी है.

घोड़ा बाजार से थोड़ी दूरी पर लगने वाला गाय बाजार लगभग वीरान पड़ा है.

लोगों के मुताबिक़ बीत सालों में यहां पूर्णिमा वाले दिन करीब 200 गाएं आराम से देखी जा सकती थीं. लेकिन सोमवार दोपहर यहां पर बमुश्किल दर्जन भर गाएं ही मौजूद थीं.

वैशाली जिले के लालगंज से आए पशु व्यापारी सुजीत कुमार बताते हैं, ''हमलोग बहुत परेशान हैं. हज़रिया-पांच सौ वाला नोट कोई ले नहीं रहा है. गाय खरीदने जा रहे हैं तो लोग नयका नोट मांग रहे हैं. इस कारण से यहां गाय बहुत कम हैं.''

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सज-धज कर तैयार है सोनपुर मेला

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पशु बाजार के साथ-साथ नोटबंदी का असर मेले में लगने वाले दूसरे दुकानों पर भी दिख रहा है.

पटना के विजय कुमार हर साल मेले में चूड़ियों की दुकान लगाते हैं.

उन्होंने बताया, ''नोट बंद हो जाने से बहुत ज्यादा असर पड़ा. सुबह से अब तक करीब 500 का ही सामान बिका है जबकि पूर्णिमा के बाजार के हिसाब से अब तक चार-पांच हज़ार की बिक्र हो जानी चाहिए थी.''

मेला घूमने आने वालों में से भी कई लोग इस बार कम पैसे लेकर मेला पहुंच रहे हैं.

मेला देखने पहुंचे अर्जुन पासवान ने बताया कि उन्होंने मेला का अपना बजट लगभग आधा कर दिया है.

अर्जुन के मुताबिक लोग इस बार लोग खरीद बहुत कम रहे हैं.

हालांकि मेला में बेतिया से आए चंदर शर्मा जैसे लोग भी मिले. चंदर को न तो अब तक नोटबंदी के कारण कोई परेशानी ही हुई है और न ही उन्होंने अपना बजट ही कम किया.

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