बिहार में अब तक के हुए बड़े नरसंहार

Image caption लक्ष्मणपुर-बाथे का दलित टोला (फाइल फोटो)

बिहार के चर्चित सेनारी नरसंहार मामले में मंगलवार को सज़ा सुनाई जाएगी.

जहानाबाद के न्यायालय में यह सुनवाई हो रही है. अदालत ने 27 अक्तूबर को मामले के 38 अभियुक्तों में से 15 को दोषी पाया था.

18 मार्च, 1999 की रात जहानाबाद जिले के सेनारी गांव में एक खास अगड़ी जाति के 34 लोगों की गला रेत कर हत्या कर दी गई थी.

उस समय इस नरसंहार में प्रतिबंधित संगठन माओवादी कम्युनिस्ट सेंटर (एमसीसी) को शामिल माना गया था.

घटना के बारे में बताया जाता है कि एमसीसी के सैकड़ों लोगों ने 18 मार्च 1999 की रात सेनारी गांव की घेराबंदी की थी.

फिर चुन-चुन कर एक जाति विशेष के पुरुषों को घरों से निकालकर गांव के ही ठाकुरबाड़ी मंदिर के पास लाया गया. इसके बाद रात साढ़े सात से दस बजे के बीच नरसंहार को अंजाम दिया गया.

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Image caption सेनारी नरसंहार में 34 की हत्या हुई थी. (फाइल फोटो)

सेनारी नरसंहार से ही जुड़े एक दूसरे मामले में जहानाबाद व्यवहार न्यायालय ने दुखन कहार को भी 10 नवंबर को दोषी करार दिया है. वे इस मामले के एकमात्र अभियुक्त हैं. अदालत इस मामले में शुक्रवार 18 नवंबर को सजा पर सुनवाई करेगी.

बिहार में जातीय हिंसा का इतिहास काफी पुराना है. सेनारी मामले के ताजा फैसले के बाद ये नरसंहार एक बार फिर लोगों के जहन में ताजा हो रहे हैं.

आइए जानते हैं ऐसे ही पांच दूसरे प्रमुख नरसंहारों के बारे में.

लक्ष्मणपुर बाथे

यह बिहार के नरसंहारों में सबसे बड़ा और नृशंस नरसंहार माना जाता है. इसमें बच्चों और गर्भवती महिलाओं को भी निशाना बनाया गया था.

30 नवंबर और 1 दिसंबर, 1997 की रात हुए इस नरसंहार में रणवीर सेना ने 58 लोगों की हत्या की थी.

Image caption बिहार में जातीय हिंसा का इतिहास काफी पुराना है. (फाइल फोटो)

लक्ष्मणपुर-बाथे नरसंहार ने कई परिवारों को अनाथ कर दिया था. कई परिवारों में घर का काम-काज संभालने के लिए एक महिला भी नहीं बची थी. कुछ परिवारों में तो सिर्फ बच्चे ही जीवित रह गए थे.

इस मामले में पटना की एक विशेष अदालत ने 7 अप्रैल, 2010 को 16 दोषियों को फांसी और 10 को उम्र कैद की सजा सुनाई थी. लेकिन पटना हाइकोर्ट के नौ अक्तूबर, 2013 के फैसले में सभी दोषियों को बरी कर दिया था.

शंकर बिगहा नरसंहार

25 जनवरी 1999 की रात बिहार के जहानाबाद जिले में हुए शंकर बिगहा नरसंहार में 22 दलितों की हत्या कर दी गई थी.

घटना के 16 वर्षों बाद साल 2015 में 13 जनवरी को इस मामले में फैसला सुनाया गया. जहानाबाद जिला अदालत ने सबूतों के अभाव में सभी 24 अभियुक्तों को बाइज्जत बरी कर दिया था.

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Image caption शंकर बिगहा गांव (फाइल फोटो)

जातीय नरसंहारों से जुड़ा यह शायद पहला मामला था जिसमें सभी अभियुक्त निचली अदालत से ही बरी कर दिए गए थे.

मामले के सरकारी वकील अरविंद कुमार दास के मुताबिक घटना के सूचक के साथ सभी गवाह अदालत में पुलिस को दिए अपने बयाने से मुकर गए. इसी को मुख्य आधार बनाते हुए अदालत ने सभी अभियुक्तों को बरी किया था.

इस हत्याकांड के ज्यादातर अभियुक्त शंकर बिगहा से पूरब में बमुश्किल एक किलोमीटर दूर धोबी बिगहा गांव के रहने वाले सवर्ण जाति के लोग थे.

बथानी टोला

साल 1996 में भोजपुर जिले के बथानी टोला गांव में दलित, मुस्लिम और पिछड़ी जाति के 22 लोगों की हत्या कर दी गई.

माना जाता है कि बारा गांव नरसंहार का बदला लेने के लिए ये हत्याएं की गई थी.

गया जिले के बारा गांव में माओवादियों ने 12 फरवरी 1992 को अगड़ी जाति के 35 लोगों की गला रेत कर हत्या कर दी थी.

Image caption बिहार का बथानी टोला (फाइल फोटो)

साल 2012 में उच्च न्यायालय ने इस मामले के 23 अभियुक्तों को भी बरी कर दिया था. इस मामले में निचली अदालत ने तीन अभियुक्तों को फांसी और 20 अभियुक्तों को आजीवन कारावास की सजा दी थी.

मियांपुर नरसंहार

औरंगाबाद जिले के मियांपुर में 16 जून 2000 को 35 दलित लोगों की हत्या कर दी गई थी.

इस मामले में जुलाई 2013 में उच्च न्यायलय ने साक्ष्य के अभाव में 10 अभियुक्तों में से नौ को बरी कर दिया था.

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Image caption सेनारी नरसंहार, अदालत में मामला (फाइल फोटो)

निचली अदालत ने इन सभी अभियुक्तों को आजीवन कारावास का सजा सुनाई थी.

बेल्छी नरसंहार

साल 1977 में पटना ज़िले के बेल्छी गाँव में एक खास पिछड़ी जाति के लोगों ने 14 दलितों की हत्या कर दी थी.

यह नरसंहार समकालीन इतिहास के पन्नों में एक खास घटना के कारण भी दर्ज है.

Image caption बेल्छी में दलितों की हत्या के बाद इंदिरा गांधी ने इस गांव का दौरा किया था.

उस वक्त सत्ता से बेदखल हो चुकीं पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने हाथी पर बैठ कर बाढ़ से घिरे इस गांव का दौरा किया था.

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