नोटबंदी: संकट गांवों में भी कम नहीं है

  • 17 नवंबर 2016
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Image caption गांवों में सब्र का बांध टूट रहा है.

500 और 1000 रुपये के नोटों को अचानक चलन से हटाए जाने के बाद भारत में कई बैंक और एटीएम मशीनें लोगों की नकदी की जरूरत को पूरा कर पाने में नाकाम हो रही हैं. यह देखने के लिए कि ग्रामीण भारत में लोग किस तरह से इस स्थिति से निपट रहे हैं, बीबीसी टीम ने राजस्थान का दौरा किया.

राजधानी दिल्ली से 250 मील दूर राजस्थान के किरडोला गांव में सुबह के पांच बजे का वक्त है. सर्दी की आहट महसूस की जा सकती है और हवा की तासीर भी ठंडी है. लेकिन गांव के चौक पर या स्थानीय चाय की दुकान पर बहुत कम लोग दिखाई दे रहे हैं. खेती के इस मौसम में जब किसान और मजदूर खेतों में होते हैं, वहां कोई नहीं दिखाई दे रहा है.

गांव के ज्यादातर लोग बैंक ऑफ बड़ौदा के स्थानीय शाखा की तरफ जा चुके हैं. वहां तकरीबन 50 लोग पहले से ही कतार में खड़े हैं. औरतों और मर्दों की अलग-अलग कतारे हैं. वहां कुछ लोग बैठ हैं, गर्मी का एहसास लेने के लिए अलाव भी जला रखा है. मैं उन लोगों से बातचीत शुरू करता हूं.

निजाम खान कहते हैं, "पिछले कुछ दिनों से इसी तरह से चल रहा है. बैंक खुलता है और पैसा जल्द ही खत्म हो जाता है. हममें से कुछ लोग यहां पिछले तीन-चार दिनों से लगातार आ रहे हैं." खेतिहर मजदूर जोवारा राम की बेचैनी साफ तौर पर जाहिर हो रही है.

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Image caption नोटों को बंद करने के फैसले ने ग्रामीण भारत में कई लोगों के लिए मुश्किल खड़ी कर दी है.

हाथ में अपनी बेटी की शादी का कार्ड लिए खड़े जोवारा राम ने अपनी परेशानी का इज़हार करते हुए कहा, "कल मेरी बेटी की शादी है और मेरे हाथ में पैसा नहीं. बैंक वालों ने मेरे पुराने सभी नोट ले लिए हैं और मेरे पूरे परिवार के पास कुल मिलाकर एक लाख रुपये बचे हैं".

बीते कई दिनों से जोवारा राम लगातार बैंक आते हैं. लेकिन कतार इतनी लंबी होती है कि नंबर आते-आते बैंक का कैश ख़त्म हो जाता है.

सुबह 5 बजे से लाइन में लगे जोवारा राम बताते हैं, "आज मैं अपनी बहन, बेटी और पत्नी को भी साथ लेकर आया हूं. ताकि किसी न किसी एक का नंबर आ जाए और हमें कुछ पैसा मिल सके".

करीब 10 बजे स्कूटर पर सवार होकर बैंक के मैनेजर वहां आते हैं और बैंक का ताला खोलने के बाद ऐलान करते हैं, "आज सिर्फ पैसा जमा किया जाएगा. खुले पैसे देने के लिए बैंक के पास आज कैश नहीं है".

Image caption बैंकों में कतारों में खड़े लोग.

वो जल्दबाज़ी में बैंक में दाखिल होते हैं. मैं उसके पीछे जाता हूं. बैंक के मैनेजर जेपी शर्मा कहते हैं, "मैं क्या कर सकता हूं. हमें पैसा देने का वादा किया गया था लेकिन नहीं मिला. मेरा बैंक पांच गांवों को सर्विस देता है. उन सभी को पैसे की जरूरत है लेकिन मेरे हाथ बंधे हुए हैं."

जोवारा राम की घबराहट बढ़ जाती है. उन्होंने जो कुछ सुना, उस पर यकीन नहीं कर पा रहे हैं. जमीन पर माथा पकड़कर बैठ जाते हैं. कहते हैं, "मैं अब क्या करूंगा. शादी में आने वाले मेहमानों के लिए मुझे खाने की चीजें खरीदनी है और समारोह के लिए भी पैसा देना है. वे उधार नहीं देंगे."

नकदी का संकट

हर कोई परेशान है. एक महिला ने बताया कि उसकी रसोई में कुछ नहीं है, "हमारे पास खाने के लिए कुछ नहीं बचा है. मैं चाय, चीनी और आटा खरीदने की उम्मीद कर रही थी. लेकिन अब क्या करूंगी?"

सरकार के इस फैसले के बाद लोगों में बहुत गुस्सा है. किसान गजेंद्र सिंह पूछते हैं, "क्या आपको लगता है कि हमारे पास काला धन है. किसान किसी भी सूरत में इनकम टैक्स नहीं भरता. इसलिए हमारी नकदी कानूनी है. हम बस अपना पैसा घर में रखते हैं."

यहां दूसरे लोग भी हैं जिनके व्यावहारिक मुद्दे हैं. महेश कुमार 40 किलोमीटर की दूरी तय करके चार लाख रुपये जमा करने आए हैं. वह कहते हैं, "मेरे परिवार में 32 लोग हैं. यह हम सभी का पैसा है." यहां एक ऐसे व्यक्ति भी हैं जिनका बैंक में खाता नहीं है और फिलहाल बैंक के पास इसके लिए समय भी नहीं है.

Image caption सरकार के फैसले को लेकर लोगों में नाराजगी है.

वह कहते हैं, "मैं अब क्या करूं?" उनके हाथ में पैसों का एक बैग है. वह पूछते हैं, "लोग कहते हैं कि मेरा पैसा अब किसी काम का नहीं. क्या इसका मतलब यह हुआ कि हमारी बचत पर पानी फिर गया?"

करेंसी संकट का असर केवल छोटे-छोटे परिवारों पर ही नहीं पड़ रहा है बल्कि इसका असर पूरी ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर भी दिख रहा है. मुठ्ठी भर मजदूरों को खेतों में काम मिल पा रहा है. किसी के पास मजदूरों को देने के लिए पैसा नहीं है. एक आदमी कहता है, "यह सब कुछ जल्द खत्म हो जाना चाहिए था. नहीं तो विरोध की सुगबुगाहट हिंसक हो सकती है."

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