ये सफ़ेद पैसा 'गुलाबी' क्यों है?

  • 18 नवंबर 2016
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Image caption बैंक एटीएम के बाहर कतारें कम होने का नाम नहीं ले रहीं.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी राजनीतिक पार्टी भाजपा की शायद दो तमन्नाएं थीं. भारत एक कैशलेस सोसायटी बन जाए और देश में रामराज्य आ जाए, यानी ऐसा आदर्श शासन जो कथित तौर पर हिंदुओं के भगवान राम के समय में प्रचलित था. न कोई बेईमानी करता था, न धोखाधड़ी होती थी. और इसांफ सभी के साथ होता था.

सोशल मीडिया पर सक्रिय लोगों की मानें तो ये दोनों ही इच्छाएं पूरी हो गई हैं. प्रधानमंत्री ने एक तीर से दो शिकार कर साबित कर दिया है कि वह मल्टिटास्किंग में माहिर हैं.

आठ नवंबर को नरेंद्र मोदी ने 500 और 1000 के नोट तुरंत समाप्त करने की घोषणा की और पलक झपकते ही देश 'कैशलेस' सोसायटी में तब्दील हो गया.

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Image caption ज्यादातर बैंक और एटीएम लोगों की नकदी की जरूरत को पूरा नहीं कर पा रहे हैं.

अब इस घोषणा के एक सप्ताह बीत जाने के बाद भी नकदी के दर्शन बस नसीब वालों को ही हो रहे हैं.

बैंकों के सामने भीड़ बढ़ती जा रही है, लेकिन नकदी ग़ायब है. पुराने जमाने में लोग सामान से सामान (वस्तु-विनिमय प्रणाली) बदलते थे और देश के दूरदराज इलाकों से अब इस तरह की खबरें आनी शुरू हो गई हैं कि लोग धान के बदले मछली खरीद रहे हैं.

ये कैशलेस सुसज्जित समाज का सबसे अच्छा उदाहरण है, न फ़र्ज़ी मुद्रा का ख़तरा और न आतंकवाद की रोकथाम के लिए अधिक भागदौड़ करने की ज़रूरत.

सरकार का रुख़ है कि देश में आतंकवाद की जड़ें फ़र्ज़ी मुद्रा की मदद से मज़बूत हो रही थीं और जब से बड़े नोटों पर पाबंदी लगी है, कश्मीर में पत्थरबाजी की घटनाएं भी बंद हो रही हैं.

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Image caption लोगों के सब्र का बांध टूटता हुआ दिख रहा है.

आतंकवादियों के पास नकदी नहीं होगी तो वे हथियार कैसे खरीदेंगे? अलगाववादियों के पास नकदी नहीं होगी, तो वे पत्थरबाजों की सेवाएं कैसे प्राप्त करेंगे? ज़रा सोचिए कि हिजबुल मुजाहिदीन का कोई कमांडर एक हज़ार मछलियों के साथ पकड़ा जाए या किसी बड़े हवाला डीलर के घर से 20 कट्टे धान बरामद हो और वह यह बता न सके कि माल कहां से आया या उन्हें इस आरोप का सामना करना पड़े कि ये मछलियां पाकिस्तानी हैं.

व्हॉट्सऐप पर अफ़वाहों का बाजार गर्म है और हास्य का भी. लोग परेशान भी हैं, लेकिन परेशानी में हंसने पर पाबंदी कहां है?

कई लोग कह रहे हैं कि अगर नकदी नहीं होगी तो बैंकों की क्या जरूरत है. और अगर बैंक नहीं होंगे, उनके सामने कतारें कैसे लगेंगी? समस्या समाप्त.

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कुछ लोगों का कहना है कि जब से बड़े नोट ख़त्म हुए हैं, रामराज्य जैसा महसूस हो रहा है. घरों के दरवाजे खुले पड़े हैं, लेकिन न कोई लूट रहा है और न भाग रहा है, जो पैसे मांग रहे थे, वह घर आकर दे रहे हैं. जिसका बकाया है, वह ले नहीं रहा, ऐसा लग रहा है कि जैसे 'पैसे से प्यार' बिल्कुल ख़त्म हो गया हो.

रामराज्य का इससे बेहतर उदाहरण क्या होगा. लेकिन इस पूरे मामले में गंभीर राजनीति भी है. बैंकों में अब तक चार लाख करोड़ रुपये जमा कराए जा चुके हैं, लेकिन कुल मुद्रा का यह तकरीबन चौथाई हिस्सा है.

बाज़ारों में जितनी भी नकदी है वह काला धन नहीं है, उसका एक बड़ा हिस्सा लोगों की वैध आय भी है.

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इसलिए बैंकों में जो राशि जमा कराई जा रही है, उसके बारे में लोगों को भरोसा है कि वे यह साबित कर सकेंगे कि ये पैसा कहां से आया और अगर इस पर टैक्स वाजिब था, तो वह भुगतान किया जा चुका है. अब लोग बैंकिंग प्रणाली से बाहर ही काले धन को सफ़ेद करने की कोशिश में लगे हुए हैं.

यह आरोप कई लोगों की ज़ुबान पर है कि धनी लोग काले धन को सफ़ेद करने के लिए गरीबों की मदद ले रहे हैं, उन्हें ऐसे दिन भी देखने थे. सरकार के इस फ़ैसले की वजह से न कोई बंदा रहा, न कोई बंदानवाज़.

नोट बदलने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मां भी बैंक पहुंचीं. उनकी उम्र 90 साल से ज्यादा है.

शायद कोशिश यह दिखाने की थी कि परेशानी सबको हो रही है. देखो प्रधानमंत्री की मां भी लाइन में लगकर पैसे बदलवा रही हैं.

दूसरा नज़रिया यह भी है कि भाई मां की देखभाल बच्चों की जिम्मेदारी है, या तो नरेंद्र मोदी खुद जाते या किसी को भेज सकते थे, रिज़र्व बैंक द्वारा जारी निर्देशों में इसकी इजाजत दी गई है.

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Image caption बैंक में पैसा लेने के लिए प्रधानमंत्री मोदी की मां भी गई थीं.

ऐसी ही एक लाइन में राहुल गांधी भी नज़र आए थे. लेकिन उन्हें सोशल मीडिया पर आसानी से बख्शा नहीं गया.

भाजपा का आरोप था कि राहुल गांधी के चार हज़ार रुपये बदलवाने के लिए लाइन में खड़ा होना, तस्वीर खिंचाने का एक मौका भर था.

राहुल गांधी का कहना है कि वह आम आदमी के साथ एकजुटता दिखाने के लिए वहां गए थे.

लेकिन सोशल मीडिया पर कहा गया कि कांग्रेस उपाध्यक्ष सिर्फ यह देखना चाहते थे कि 'व्हाइट मनी' कैसी होती है और अब तक यह सोच रहे हैं कि इसका रंग ग़ुलाबी क्यों है?

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