उम्मीद और नाउम्मीदी के बीच झूलते लोग

  • 20 नवंबर 2016
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Image caption घायलों को बाहर निकालने में कई घंटे लग गए.

"हमारे 28 लोग एस-1 बोगी में सवार थे. उनमे से कुछ का रिज़र्वेशन एस-2 में भी था. सब एक साथ यात्रा करना चाहते थे, इसलिए सब एस-1 में आ गए. अब किसी का कुछ अता-पता नहीं. सुबह से ही पटना जंक्शन पर बैठे हैं. कोई कुछ नहीं बता रहा."

पटना सिटी के चौक शिकारपुर के धर्मवीर ये बातें बता रहे थे. उनकी आवाज़ उम्मीद और नाउम्मीदी के बीच कहीं अटकी हुई लग रही थी.

धर्मवीर के 50 वर्षीय चाचा मनोज कुमार साव और 45 वर्षीय चाची प्रेमलता देवी की एस-1 बोगी में सीट नंबर 40 और 64 आरक्षित थी. उनके साथ चौक शिकारपुर मोहल्ला से 26 लोग इस ट्रेन में तीर्थ यात्रा के बाद सवार हुए थे.

धर्मवीर के साथ उनके मोहल्ले के और भी लोग बैठे हैं. धर्मवीर बताते हैं कि सुबह 11 बजे तक चाचा चाची के मोबाइल में घंटी बज रही थी लेकिन उस वक़्त किसी ने उठाया नहीं और बाद में मोबाइल में घंटी नहीं बज रही.

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जहां धर्मवीर के पास उम्मीद का सहारा है वहीं सीवान के एक परिवार के पास कोई उम्मीद नहीं बची है. गौतमबुद्ध नगर की रत्निका सिंह की हादसे में मौत हो चुकी है. उनके परिजन वीरेंद्र कुमार ने फ़ोन पर बातचीत में बीबीसी से इसकी पुष्टि की.

हालाँकि उन्होंने इससे आगे बात करने से इनकार कर दिया. ऐसे में मृतक रत्निका के पति सुबोध सिंह और उनकी दो बेटियों के बारे में पुख़्ता तरीक़े से कुछ कहना मुश्किल है.

इस बीच कानपुर से पटना के लिए स्पेशल ट्रेन और पटना से कानपुर के पोकरचा स्टेशन के लिये ट्रेन चलाई गई है.

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