ट्रेन चलाते वक़्त आराम से बैठ तक नहीं सकते!

ट्रेन हादसा

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हादसे के बाद पटना-इंदौर एक्सप्रेस के कोच

एक रेल ड्राइवर हादसे के बारे में क्या सोचता है? आख़िर उनकी समस्या क्या है? बीबीसी संवाददाता संदीप सोनी से एक रेल ड्राइवर ने बताई अपनी व्यथा.

हमारी कई सारी समस्याएं तो तकनीकी हैं. रात में तो कभी-कभी ऐसा होता है कि हमें 10 मीटर से आगे नहीं दिखता. इंजन में हेडलाइट से हमें कम से कम 240 मीटर दिखना चाहिए. अक्सर रोशनी कम रहती है. सर्दियों में तो और मुश्किलों का सामना करना पड़ता है. अचानक यदि कुछ सामने आ गया तो हम पूरी तरह से लाचार होते हैं. ऐसी स्थिति में हम गाड़ी को रोक नहीं सकते.

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भारत में ट्रेन हादसों के लिए कौन जिम्मेदार?

इमरजेंसी ब्रेक लगाने के सिवा कोई विकल्प नहीं है. हमें और भी कई तरह की तकनीकी समस्याओं का सामना करना होता है. हमें इंजन में जो फ्रेंडली कैब मिलने चाहिए वो नहीं हैं. हम आराम से बैठ नहीं सकते. ऐसे में हम आरामदायक तरीक़े से ड्राइव नहीं कर पाते. इसमें भी हमारा ध्यान बंटा रहता है. दरवाज़े टूटे रहते हैं, जिनसे सर्दियों में काफ़ी दिक्क़त होती है. ठंड लग रही होती है और आप गाड़ी चला रहे होते हैं. इस स्थिति में भी हमारा ध्यान बंटता है. इस वजह से गर्मियों में भी समस्या होती है.

हमारी दूसरी समस्या है आराम और छुट्टियों की. आप लगातार काम कर रहे हैं पर आराम करने का वक़्त नहीं मिलता. हम ड्यूटी करके आते हैं और फिर 12 से 16 घंटे में निकल जाना होता है. इन्हीं 12 से 16 घंटों में आपको रेस्ट भी करना है और परिवार को भी देखना है. इस स्थिति में कोई कितना रेस्ट कर पाएगा.

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कब सुधरेगी भारतीय रेल की छवि?

हमें घर में भी काम निपटाने होते हैं. इस स्थिति में हमें पूरी रात ड्यूटी करनी होती है. हमें स्टाफ़ की कमी से रेस्ट नहीं मिलता. छुट्टियों की भी समस्या रहती है. सामाजिक जीवन से हम बिल्कुल कट जाते हैं. सबसे बड़ी हमारी समस्या रेस्ट और छुट्टी की है. कभी-कभी तो हमें तीन से चार नाइट लगातार करनी पड़ती है.

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