'भाई को मलबे के नीचे दबा हुआ देखा'

  • 22 नवंबर 2016

रविवार को तड़के हुई कानपुर रेल दुर्घटना के दो दिन बाद अब केवल तकलीफदेह यादें ही बची हैं.

कानपुर से 60 किलोमीटर दूर हुए इस हादसे में समाचार एजेंसी पीटीआई के अनुसार मृतकों की संख्या 146 हो गई है जबकि डेढ़ सौ से अधिक घायल हैं.

इस हादसे में अपने परिजनों-दोस्तों को खो देने वालों ने बीबीसी से या सांझा की अपनी आपबीती.

रवीश कुमार- छात्र, पटना

"रेल हादसे में रवीश ने परिवार के पांच सदस्य खोए. इनमें उनकी माँ भी शामिल थीं. उन्हें उन लोगों के मारे जाने का बारे में हादसे के अगले दिन पता चला.

मेरी किस्मत अच्छी थी कि मैं बच गया. मैं पूरे परिवार के साथ सफर कर रहा था. एक पहचान वाली महिला ने सीटों की अदला-बदली की थी. मैं दूसरे डिब्बे में जाकर बैठ गया था.

मुझे क्या मालूम था कि उस महिला की ये मेहरबानी कुछ घंटों बाद मेरी जान बचाने वाली है.

जिस डिब्बे में मैं जाकर बैठा था वहां अधिक नुकसान नहीं हुआ. लेकिन माँ और भाई जिस डिब्बे में बैठे थे वो मलबे के ढेर में बदल गया था.

मैंने तेज़ आवाज़ दी. माँ, बहन, लेकिन कोई जवाब नहीं आया. मुझे शक हुआ कि कहीं वो मलबे में दब न गए हों. "

मोनू विश्वकर्मा (22 साल)- कारखाना मजदूर, अम्बेडकरनगर

"मोनू अपने परिवार के छह सदस्यों के साथ सफर कर रहे थे. हादसे में तीन की मौत हो गई और अन्य तीन घायल हो गए. मरने वालों में उनकी माँ भी थीं.

एक बहुत ही तेज़ आवाज़ गूंजी. तीन बजे का समय था. मेरी नींद खुल गई. मुझे नहीं मालूम कि मैं डिब्बे से बाहर कैसे आया. मैंने अपनी माँ और भाई की तलाश करनी शुरू की.

मैंने अपने भाई को मलबे के नीचे दबा हुआ देखा. पुलिस से मदद मांगी लेकिन पुलिस वाले दूसरी लाशों को निकालने में मसरुफ थे. फिर किसी तरह से उसे निकाला गया."

कमला देवी- पटना

"घायल कमला देवी का कानपुर के सबसे बड़े सरकारी अस्पताल में इलाज चल रहा है. उन्हें काफी चोटें आई हैं. उनके एक पैर की हड्डी टूटी है.

कमला देवी अपने 20 साथियों के साथ एक तीर्थ यात्रा से वापस अपने घर पटना लौट रही थीं. उनके बेटे और बहू की हादसे में मौत हो चुकी है.

20 साथियों में से केवल चार बचे हैं. उन्हें बेटे और बहू की मौत के बारे में कोई खबर नहीं दी गई है. रिश्तेदार कहते हैं कि अगर उन्हें ये बताया गया तो उन्हें एक बड़ा झटका लगेगा."

दो अंजान बच्चे

घटनास्थल के नज़दीक एक अस्पताल में दो बच्चे भर्ती हैं. एक चार साल का लड़का और दूसरी 18 महीने की बच्ची. उनके परिवार वालों का कोई पता नहीं है.

एक औरत अस्पताल आई और कहने लगी कि वो छोटे बच्चे की मौसी है. अस्पताल में मौजूद नर्स और डॉक्टर उनके इलाज का खास ख्याल रख रहे हैं और उनके परिजनों का पता लगाने की कोशिश भी हो रही है.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)

बीबीसी न्यूज़ मेकर्स

चर्चा में रहे लोगों से बातचीत पर आधारित साप्ताहिक कार्यक्रम

सुनिए