नज़रिया : भक्तों को रोकने वाला कोई दिखाई नहीं देता

  • 23 नवंबर 2016
इमेज कॉपीरइट PTI

भक्त भारतीय राजनीति की सबसे नयी आक्रामक प्रजाति है जिसका इस्तेमाल विरोधियों को चुप कराने के लिए सफलतापूर्वक किया जा रहा है.

बुद्धिजीवी उनकी तुलना एडॉल्फ हिटलर के 'ब्राउनशर्ट दस्तों' से करते हुए उनके क़दमों की आवाज़ को तानाशाही की आहट बता रहे हैं. उनके भय की ओट में इस सच्चाई को झुठलाया जा रहा है कि सभी पार्टियों में भक्त हैं जिन्हें बड़ी सावधानी से विचारधारा की समझ रखने वाले, तर्कशील, जमीनी कार्यकर्ताओं को खत्म करने के बाद पाला जा रहा है.

यह कहना ज़्यादा सही है कि देश की लगभग सभी राजनीतिक पार्टियां बिना अपवाद के भक्त निर्माण की फैक्ट्रियों में बदल गई हैं.

इमेज कॉपीरइट Ashok Adepal

यह कोई दैवीय अभिशाप नहीं है कि राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ (आरएसएस) की उग्र मुसलमान विरोधी विचारधारा और प्रधानमंत्री मोदी की व्यक्तिपूजा की केमिस्ट्री से पैदा हुए इन दबंग भक्तों को जवाब देने वाला कोई नहीं है लिहाजा उनकी मनमानी के लिए मैदान खाली है.

'मैं मोदी-मोदी चिल्लाऊँगा सीना फाड़ के'

भक्तों का तार्किक जवाब दूसरी पार्टियों के भक्त नहीं दे सकते. वे अफवाह फैला सकते हैं, मारपीट कर सकते हैं. अगर इस तरह के दंगों की नौबत आती है तो इसे आसानी से धार्मिक ध्रुवीकरण में बदल दिया जाएगा जो यूपी समेत कई राज्यों के चुनावों में भाजपा के पक्ष में जाएगा, इसलिए विपक्ष की पार्टियां चुप हैं.

राहुल गांधी के राजनीति में आने के साथ ही, बहुत पहले वंशवादी हो चुकी देश की सबसे पुरानी कांग्रेस पार्टी में यूथ कांग्रेस खत्म कर दी गई क्योंकि उनके रहते और कोई युवा नेता नहीं हो सकता था. खुद राहुल गांधी ने पार्टी में नया खून लाने के लिए वैसे इंटरव्यू आयोजित किए जैसे कारपोरेट कंपनियां मुलाजिम रखने के लिए करती हैं.

केजरीवाल का बीबीसी पर भड़कना हुआ वायरल

इन मुलाजिमों में से एक नहीं बचा क्योंकि इनमें से अधिकांश सिफारिशी थे जो ऐसे समय राजनीति में कारपोरेट कंपनियों जैसा वेतन-भत्ता और मौका लगे तो सत्ता की मलाई काटने के लिए आए थे जब कांग्रेस के सत्ता से विदाई के दिन आ चुके थे. अब कांग्रेस चुनावी रणनीति, एजेंडे और कार्यकर्ताओं की सप्लाई के लिए प्रशांत किशोर (पीके) जैसे मैनेजर के भरोसे है.

इमेज कॉपीरइट PTI

राजनीति में अपने बेटे बेटियों को स्थापित करने और भ्रष्टाचार के कमाई अकूत संपत्तियों की रक्षा के लिए बाकी पार्टियों के नेताओं ने भी यही कांग्रेस मॉडल अपनाया. उन्होंने सचेत तरीके से पार्टी में आंतरिक लोकतंत्र खत्म किया जिससे विचारधारा में प्रशिक्षित कार्यकर्ता खत्म हो गए जो विरोधियों के साथ उनकी भी करनी पर सवाल उठा सकते थे.

उनकी जगह व्यक्तिपूजक भक्तों की फौज खड़ी की गई जिसका काम जय-जयकार करना, विरोधियों से मारपीट करना था, सत्ता में आने पर इनमें से कुछ को पद भी मिल जाते थे.

दक्षिण में ऐसे भक्त बनाए गए जो नेता के भ्रष्टाचार के मामलों में जेल जाने की नौबत आने पर आत्मदाह कर सकते थे, मंदिर बनाकर पूजा कर सकते थे, तमिलनाडु की मुख्यमंत्री जयाललिता के विश्वासपात्र पनीर सेल्वम की तरह सिंहासन पर खड़ाऊं रखकर सरकार भी चला सकते थे.

इमेज कॉपीरइट Tanmay Tyagi

यूपी में अखिलेश यादव की सरकार बनने के साथ चुनाव जिताने वाले कार्यकर्ताओं के लिए पार्टी दफ़्तर के दरवाजे बंद कर दिए गए थे तब पुराने समाजवादियों ने एक नारा दिया था- कार्यकर्ता रहे अनुशासन में परिवार रहे शासन में. अब वहां भक्तों का जमावड़ा है जो मोदी के भक्तों से बहस नहीं कर सकते लेकिन परिवार की कलह में अखिलेश और शिवपाल यादव की ओर से एक दूसरे पर कुर्सियां चला रहे हैं.

भक्त सिर्फ़ मोदी के नहीं, लालू के भी हैं

बसपा में मायावती ने संस्थापक कांशीराम की मौत के बाद किसी दूसरे नेता तक को नहीं पनपने दिया, वहां मायावती के भक्तों को राजनीतिक मुद्दों पर धरना प्रदर्शन तक करने की इजाजत नहीं है, उनकी ख़बर तब मिलती है जब वे रैली की भगदड़ में कुचल कर मरते हैं या मायावती के अपमान का बदला लेने के लिए सड़क पर उतरते हैं.

लालू प्रसाद यादव, ममता बनर्जी, प्रकाश सिंह बादल समेत सभी प्रमुख पार्टियों के नेता या तो व्यक्तिपूजा या वंशवाद के शिकार हुए हैं जिसके कारण उनकी पार्टियां भक्तों की नर्सरी में बदल गई हैं और प्रमुख काम चुनाव जिताने के शार्टकट तरीकों का अनुसंधान करना रह गया है.

सभी पुरानी पार्टियों में कार्यकर्ताओं के राजनीतिक प्रशिक्षण की परंपरा थी जो जानबूझकर खत्म की जा चुकी है. यही कारण है कि मोदी के भक्तों को रोकने वाला कोई नहीं दिखाई दे रहा है.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)

बीबीसी न्यूज़ मेकर्स

चर्चा में रहे लोगों से बातचीत पर आधारित साप्ताहिक कार्यक्रम

सुनिए