मायावती क्यों बार-बार आ रही प्रेस के सामने?

  • संजीव माथुर
  • दिल्ली से बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मुरादाबाद रैली ख़त्म ही हुई थी कि उसके महज़ दो घंटे बाद बहुजन समाज पार्टी प्रमुख मायावती ने लखनऊ में प्रेस कांफ्रेंस बुला ली.

ये इत्तेफ़ाक़ नहीं था कि मायावती की प्रेस कांफ्रेंस मोदी की किसी सभा के फ़ौरन बाद हुई हो. इससे पहले वो पिछले महीने भर में तीन ऐसी बड़ी प्रेस कांफ्रेंस कर चुकी हैं.

इसके अलावा नोटबंदी पर वो संसद परिसर से लेकर सड़क तक प्रेस से कम से कम पांच बार सीधे मुख़ातिब हुई हैं.

आख़िर ऐसा क्या हो गया है कि प्रेस से एक सोची समझी दूरी बनाकर रखनेवाली 'बहनजी' अचानक प्रेस के क़रीब दिख रहीं हैं?

वरिष्ठ पत्रकार दिलीप मंडल इसे मायावती की 'कम्युनिकेशन गैप' भरने की रणनीति के तौर पर देखते हैं.

तो वरिष्ठ पत्रकार अनिल चमड़िया और दलित नेता अशोक भारती 'प्रेस प्रेम' को उन पर बढ़ते दबाव के तौर पर देखते हैं.

दिलीप मंडल का कहना है कि मायावती किसी भी नेता की तरह जनता तक पहुंचने के लिए मीडिया का सहारा लेती हैं.

वो कहते हैं, "लेकिन उनके संवाद के कई और आयाम भी हैं. जैसे बहनजी जिस समाज की नेता हैं वह देश का सबसे वंचित तबक़ा है. जिसकी उपस्थिति तथाकथित मुख्यधारा व सोशल मीडिया में देर से दर्ज हुई है. इस लिहाज़ से वो प्रेस वार्ताओं के ज़रिए फेसबुक, व्हाट्सअप जैसे वैकल्पिक मीडिया से दूर अपने समाज के साथ 'कम्युनिकेशन गैप' को भरती हैं."

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मंडल एक बात को ख़ास तौर पर इंगित करते हैं कि,'मायावती मीडिया के पूर्वाग्रहों को चुनौती देती हैं.'

मंडल कहते हैं कि बहनजी की प्रेस कांफ्रेंस को पार्टी कार्यकर्ता और समर्थक न केवल ध्यान से सुनते हैं बल्कि उसका प्रचार भी करते हैं.

उनका दावा है कि ऐसा किसी दूसरे राजनेता के मामले में नहीं होता है.

अनिल चमड़िया मायावती के प्रेस प्रेम को मायावती पर बढ़ते दबाव के तौर पर देखते हैं जो उनके शब्दों में उन्हें संसद और दूसरे जगहों पर भी ज्यादा सक्रिय रख रहा है.

इसे चमिड़या वोट बैंक का दबाव कहते हैं.

चमड़िया कहते हैं कि कांशीराम मानते थे कि हमें मीडिया की परवाह नहीं करनी है. न ही उसके प्रति कोई हमारी जवाबदेही है. लेकिन बदलते ज़माने में मीडिया की अनदेखी मुश्किल है. मायावती के लिए भी. उन्हें अपने मूक श्रोताओं व दर्शकों के सामने रहना ही पड़ेगा.

दलित नेता अशोक भारती के मुताबिक़ वर्तमान में सारे दलित नेता नए बहुजन उभार से घबराए हुए हैं.

अशोक भारती मानते हैं, "उनका पुराना समर्थक आधार खिसक रहा है. सो सब पर जनता के सामने रहने का भारी दबाव है. निसंदेह बहनजी दलितों की सबसे बड़ी नेता है लेकिन चूंकि वो नेता बड़ी हैं तो दबाव भी उतना ही ज़्यादा है."

साथ ही वो ये भी कहते हैं कि बहुजनों के बीच में भी एक नया वर्ग उभर रहा है. और वो 'सर्वजन' का हिस्सा नहीं बनना चाहता है.

लेकिन बहनजी अपने वोट बेस को बड़ा करने के लिए पहले ही बहुजन की जगह सर्वजन की बात कर चुकी हैं. तो उनपर दबाव है कि वो रुठे हुए वर्ग को साथ रखें उनसे संवाद करें.

जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी में समाजशास्त्र के प्रोफेसर विवेक कुमार कहते हैं, "मायावती को ​हाशिए पर खड़े अपने समाज को दिशा देनी है. उनके वोटरों पर नोटबंदी की जो गाज गिरी है वह उसे सारे देश को बता रही हैं, चेता रही हैं.'

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ विचारक राकेश सिन्हा हालांकि इसका दूसरा पहलू देखते हैं और कहते हैं, "देश जब 'आर्थिक सत्याग्रह' के दौर से गुज़र रहा है तो मीडिया को ब्राह्मणवादी कहकर ख़ारिज करने वाले मायावती जैसे नेताओं को इसी मीडिया की सहायता लेनी पड़ रही है, अपनी बात, अपनी जनता तक पहुंचाने के लिए."

वो कहते हैं कि मायावती के नोटबंदी काल में उभरे इस प्रेस प्रेम की एक विशेषता यह भी है कि वह उसी दिन प्रेस से अपने तीखे तेवरों के साथ मुख़ातिब होती हैं जिस दिन मोदी कोई चुनावी रैली कर रहे होते हैं या सरकार कोई नीतिगत फ़ैसला ले रही होती है.

मायावती की इन प्रेस कांफ्रेंसों में नई बातें कम पुरानी का दोहराव ज्यादा दिखाई देता है लेकिन कुछ जानकारों के मुताबिक़ दलितों का बड़ा तबक़ा उसे दिल लगाकर सुनता है.

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