बिना 'पैन कार्ड' कैसे खुलेंगे बैंक के खाते?

  • 5 दिसंबर 2016
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भारत में नोटबंदी के बाद से आम लोगों को काफ़ी मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है.

वर्ष 1936 में बने 'पेमेंट ऑफ़ वेजेज़ एक्ट' के अनुसार 'मेहनताने का भुगतान करंट करेंसी या कॉइन्स या दोनों से की जानी चाहिए.

भारत में मज़दूर संगठनों का कहना है कि असंगठित क्षेत्र में काम कर रहे मज़दूरों को उनका मेहनताना नक़दी में भुगतान किया जाना चाहिए क्योंकि इसका प्रावधान 'पेमेंट ऑफ़ वेजेज़ एक्ट 1936' में किया गया है.

नोटबंदी के बाद यह सरकारी प्रयास किये जा रहे हैं कि मज़दूरों को, ख़ासतौर पर दैनिक वेतन भोगी मज़दूरों को, उनके मेहनताने का भुगतान सीधे बैंक में किया जाए.

मज़दूर संगठन 'न्यू ट्रेड यूनियन इनिशिएटिव' (एनटीयूआई) के असीम रॉय कहते हैं कि दैनिक वेतन भोगी अमूमन वैसे प्रवासी मज़दूर होते हैं जो देश के विभिन्न इलाक़ों में जाकर मज़दूरी करते हैं. इस तरह के मज़दूर एक जगह से दूसरी जगह प्रवास करते रहते हैं.

असीम रॉय कहते हैं, "इस क्षेत्र के ज़्यादातर मज़दूर ऐसे हैं जिनके पास न तो कोई बैंक खाता और ना ही कोई पहचान पत्र होता है. ऐसे मज़दूरों के लिए तब मुश्किल हो जाती है जब उनसे काम लेने वाले लोग कहें कि उनका मेहनताना बैंक खाते में जमा करा दिया जाएगा."

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वाम दलों से सम्बद्ध 'कंस्ट्रक्शन वर्कर्स फ़ेडरेशन ऑफ़ इंडिया' के महासचिव देब्जान चक्रवर्ती का कहना है कि 'पेमेंट ऑफ़ वेजेज़ एक्ट' के अस्तित्व में आने के बाद से ही दैनिक वेतन भोगियों को रोज़ नक़दी के ज़रिये भुगतान करने का चलन रहा है. अभी नोटबंदी के बाद इन मज़दूरों से काम लेने वाले उन्हें नक़दी नहीं देकर उनके खातों में रक़म जमा करने के लिए दबाव दे रहे हैं. वो कहते हैं कि ऐसा करना ग़लत है.

मज़दूरों के मामले देखने वाले वकील मोनू कुमार कहते हैं कि वर्ष 1936 में बने 'पेमेंट ऑफ़ वेजेज़ एक्ट' के अनुच्छेद 6 में प्रावधान किया गया है कि 'मेहनताने का भुगतान करंट 'करेंसी' और 'कॉइन्स' या फिर दोनों में की जानी चाहिए.

इसके अलावा क़ानून में यह प्रावधान किया गया है कि कामगार की लिखित स्वीकृति के बाद उसे चेक या फिर उसका मेहनताना उसके बैंक खाते में जमा कराया जाना चाहिए.'

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नवंबर में लागू की गई नोटबंदी के बाद भारत सरकार के श्रम मंत्रालय ने एक अधिसूचना जारी की है जिसमे कामगारों का वेतन उनके बैंक खातों में जमा कराने का निर्देश कंपनियों और ठेकेदारों को जारी किया है.

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यह अधिसूचना मुख्य श्रम आयुक्त एके नायक द्वारा 25 नवंबर को जारी की गई है. अधिसूचना में ख़ासतौर पर ठेकेदारी प्रथा के तहत काम कर रहे मज़दूरों के बैंक खाते खुलवाने और उनके तहत मेहनताने का भुगतान करने का निर्देश दिया गया है.

श्रम मंत्रालय का दावा है कि अधिसूचना के सिर्फ़ 6 दिनों के अंदर मज़दूरों के 915431 नए बैंक खाते खोले गए. मंत्रालय का यह भी दावा है कि अब तक 25. 68 करोड़ जन धन के भी खाते अब तक खोले जा चुके हैं.

.....हड़ताल जारी है

मगर 'आल इण्डिया बैंक एम्प्लोयीज़ एसोसिएशन' के महासचिव सी एच वेंकटाचलम ने बीबीसी से बात करते हुए कहा कि ठेकेदारी प्रथा के तहत काम कर रहे मज़दूरों के खाते उनसे काम लेने वाले ठेकेदार अपनी 'गारंटी' पर खुलवा सकते हैं मगर दैनिक वेतन भोगी प्रवासी मज़दूरों के लिए खाते खुलवाना आसान नहीं होगा.

वेंकटाचलम के अनुसार आयकर नियम के अनुच्छेद के 114 बी के अनुसार अब नए बैंक खाते खोलने के लिए 'पैन कार्ड' को अनिवार्य कर दिया गया है.

'जन धन' के खातों के अलावा यदि कोई किसी भी तरह का दूसरा खाता खुलवाना चाहता है - जैसे बचत खाता - तो उसे अपना 'पैन कार्ड' का नंबर देना अनिवार्य होगा.

वेंकटचलम कहते हैं, "अब प्रवासी दैनिक मज़दूरों के पास ना 'पैन कार्ड' है और ना ही कोई बैंक का खाता. ऐसे में इनके लिए बैंक के खातों के ज़रिए भुगतान लेना संभव नहीं हो पायेगा. मगर, सबसे बड़ी बात है अपना मेहनताना नक़दी में लेना इनका अधिकार है."

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हालांकि कुछ मज़दूर संगठन दैनिक वेतनभोगियों को नक़दी भुगतान को लेकर अदालत का दरवाज़ा खटखटाने का मन बना रहे हैं.

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