नोटबंदी- 'मोदी जी ने सबको भिखारी बना दिया है'

  • 6 दिसंबर 2016
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सामाजिक कार्यकर्ता मेधा पाटकर ने पटना में बीबीसी से बातचीत में कहा है कि नोटबंदी के फ़ैसले के बाद देश के अधिकतर श्रमिक और आदिवासी परेशान हैं.

उन्होंने दावा किया, "विमुद्रीकरण से देश के 93 प्रतिशत श्रमिक परेशान हैं, वो आदिवासी परेशान हैं जो कम से कम मुद्रा पर जीते हैं."

उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर निशाना साधते हुए कहा, "आपने उन्हें कतार में खड़ा कर भिखारी बना दिया नोटों के लिए. काले धन वालों को लाइन में खड़े होना पड़ता तो हम मान लेते कि मोदी जी की मंशा सही है. सरकार की ग़लत आर्थिक नीतियां से तो काला धन नहीं मिटेगा, बल्कि नए-नए तरीके से खड़ा होगा."

उनका कहना था कि लोग नोटों के तौर पर संपत्ति नहीं जमा करेंगे, वो अब खनिज, ज़मीन और कारखाने में डालेंगे.

1985 के नर्मदा बचाओ आंदोलन से जुड़ीं मेधा पाटकर ने राजनीतिक दलों और जन आंदोलनों के बीच कम होते संवाद पर चिंता जताई है.

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उन्होंने कहा, "कई दल अलग-अलग समय पर मुद्दे उठाते हैं जो बेहद महत्वपूर्ण होते हैं और इसमें हम उनका साथ लेते हैं. लेकिन दलों की राजनीति और जन आंदोलनों के बीच संवाद घट रहा है जो चिंताजनक है."

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मेधा पाटकर ने ये भी कहा कि कांग्रेस ने सत्ता में रहकर भी जन आंदोलन के लोगों से सबसे ज्यादा बातचीत की थी.

उन्होंने कहा, "हमने कांग्रेस सरकार के ख़िलाफ़ लड़ाइयां लड़ीं लेकिन उन्होंने बातचीत बंद नहीं की. शायद ये इसलिए भी क्योंकि वो आज़ादी के आंदोलन से निकली पार्टी थी. ये सत्ता में बैठे लोगों को सीखने की जरूरत है. मुझे नीतीश कुमार, लालू प्रसाद, ममता बनर्जी से उम्मीद है कि वो आंदोलन के लोगों से बातचीत करे. कांग्रेस ने जितना संवाद किया है सत्ता में रहते हुए उतना किसी ने नहीं किया."

मेधा पाटकर ने कहा कि जनांदोलनों के सामने चुनौती यही है कि हम अकेले-अकेले न चलें बल्कि साथ चलें.

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नोटबंदी के बाद मुश्किलों का हल खोजने वाले कुछ लोग

स्मार्ट सिटी के सिलसिले में उनका मानना है कि स्मार्ट सिटी का सपना ग़ैर बराबरी बढ़ाएगा.

उनके मुताबिक़, "मुंबई में 52 फ़ीसदी आबादी झुग्गी झोपड़ी में रहती है और उनके पास 9.24 फ़ीसदी ज़मीन है. मोदी जी कह रहे हैं कि 2022 तक सबको घर मिलेगा लेकिन उनके मुख्यमंत्रियों और कलेक्टर के पास योजनाओं का कोई खाका नहीं है. कायदे से तो ये होना चाहिए कि जहां बस्तियां हो, वहीं सरकार उनका विकास करे."

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मेधा पाटकर ने कहा कि जन आंदोलनों को एक साथ काम करना होगा. साथ ही अब सरकारें सब कुछ करेंगी, ऐसा संभव नहीं लगता. ऐसे में समाज को अपनी दिशा तय करने के लिए ख़ुद आगे आना होगा.

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