'आरक्षण की बड़ी चैंपियन साबित हुईं जयललिता'

  • दिलीप मंडल
  • वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिंदी के लिए

जयललिता को याद करने के कई कारण हैं. मेरे सामने भी एक आसान रास्ता है कि मैं उनके फिल्म अभिनेत्री से राजनेता बनने के शानदार सफर को समेटते हुए उनसे जुड़े भ्रष्टाचार के मामलों, उनके तानाशाही तौर-तरीकों और उनके समर्थकों की चरणवंदना तक को समेटते हुए एक कोलाज तैयार करूं, लेकिन जयललिता एक जटिल व्यक्तित्व हैं.

उन्हें चाहने के दर्जनों के कारण हैं. मैं उन तीन कारणों का जिक्र कर रहा हूं, जिसके ज़रिए आपको इस बात का अंदाज़ा लगाने में आसानी होगी कि जयललिता एक एनिग्मा क्यों हैं, एक तीखी मिर्ची, एक कांटा, जो समाज के एक हिस्से और पूरे मेनस्ट्रीम मीडिया के दिल में कहीं गहरे धंसा हुआ है.

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68 साल की जयललिता 22 सितंबर से अपोलो अस्पताल में भर्ती थीं.

इस वजह से मीडिया और आगे चलकर इतिहास जयललिता के मूल्यांकन में उदार नहीं रहेगा. जयललिता इन तीन वजहों से और शायद कई और वजहों से 'चोखेर बाली' यानी आँख की किरकिरी बनी रहेंगी.

1. जयललिता का महिला होना अपने आप में एक समस्या, बल्कि एक आफत है. अकेली महिला, जिसने जाति की परवाह किए बगैर शादीशुदा पुरुषों से प्यार किया. पतिव्रता औरतों को जयललिता नाम से डर लगना चाहिए.

उन्होंने जिंदगी भर शादी नहीं की. परिवार नाम की तथाकथित पवित्र संस्था को ठेंगे पर रखा. पुरुषों को या तो अपने दिल में जगह दी या चरणों में. महिला होना किसी के लिए एक लिमिटिंग फैक्टर हो सकता है लेकिन जयललिता उन अर्थों में परंपरागत बेचारी औरत कभी नहीं रही.

एमजी रामचंद्रन की मौत के बाद उनकी पत्नी और परिवार से एआईएडीएमके की राजनीतिक विरासत छीन लेना कोई मामूली बात नहीं है. जयललिता के स्वभाव का अक्खड़पन और रुखापन देखकर मुझे कई बार लगा कि वे ऐसा रणनीति के तौर पर करती हैं. समकालीन पुरुष नेताओं को राजनीतिक, ब्यूरोक्रेटिक धरातल पर मर्दानगी दिखाने का कोई भी मौका देने के लिए वे तैयार नहीं थीं. ऐसी जयललिता आंखों में तो खटकेंगी ही.

2. जयललिता उस समय तमिलनाडु की मुख्यमंत्री थीं, जब देश में मंडल कमीशन लागू करने का विवाद चल रहा था. मंडल कमीशन 1980 में आया. लेकिन कांग्रेस उसे दबाए बैठी रही. वीपी सिंह ने 13 अगस्त 1990 में उसके एक हिस्से को लागू करके ओबीसी को 27% आरक्षण दे दिया.

मामला कोर्ट में गया और सात जजों की संविधान पीठ ने इंदिरा साहनी केस में आरक्षण को तो स्वीकृति दे दी, लेकिन बालाजी केस में सुप्रीम कोर्ट के एक पुराने फैसले के कारण उस पर पहले से चली आ रही 50% की अधिकतम सीमा को बनाए रखा.

तमिलनाडु सरकार के लिए यह विकट स्थिति थी. क्योंकि वहां एससी, एसटी और ओबीसी को मिलाकर 69% आरक्षण पहले से चल रहा था.

जयललिता के सामने एक ऐतिहासिक क्षण था. वे यह कह सकती थीं कि सुप्रीम कोर्ट का फैसला है. मैं क्या कर सकती हूं. वे मामले को केंद्र की नरसिंह राव सरकार पर भी टाल सकतीं थीं.

लेकिन इस मौके पर उन्होंने वह किया, जिसके बारे में कोई सोच भी नहीं रहा था. उन्होंने 69% आरक्षण का विधेयक तमिलनाडु विधानसभा से पारित कराया और केंद्र सरकार को मजबूर कर दिया कि संविधान संशोधन कर इस विधेयक को 9वीं अनुसूची में डाले, ताकि यह न्यायिक समीक्षा के दायरे से बाहर हो जाए. इस वजह से संविधान में 76वां संशोधन हुआ.

क्या इस वजह से जयललिता को सामाजिक न्याय का चैंपियन माना जाना चाहिए?

इस सवाल का जवाब कठिन है. सामाजिक न्याय तमिलनाडु के समाज और राजनीति के मिजाज का हिस्सा है. अगर कोई और सरकार होती तो भी मुमकिन है कि वह जयललिता की तरह ही एक्ट करती लेकिन सत्य यही है कि देश में सबसे ज्यादा आरक्षण अगर आज तमिलनाडु में है, तो इसे बनाए रखने का श्रेय जयललिता को है, जिनका जन्म ब्राह्मण परिवार में हुआ था.

ऐसी जयललिता अगर कुछ लोगों के लिए चोखेर बाली है, तो उसमें आश्चर्य कैसा?

3. तीसरा मामला और भी तीखा है. 2004 में जब जयललिता मुख्यमंत्री थीं, तब कांचीपुरम के एक मंदिर के मैनेजर की हत्या का मामला सामने आया.

पुलिस के जांच में संदेह की सुई कांची पीठ के शंकराचार्य जयेंद्र सरस्वती की ओर घूमी तो यह सवाल आया कि क्या शंकराचार्य को गिरफ्तार किया जा सकता है?

कोई यह पूछ नहीं रहा था, लेकिन यह सबके दिमाग में था. आखिरकार इस केस में शंकराचार्य की गिरफ्तारी हुई और उन्हें जेल में न्यायिक हिरासत में रहना पड़ा. हालांकि बाद में वे इस केस में बरी हो गए.

भारतीय इतिहास में किसी शंकराचार्य के साथ ऐसे सख्त व्यवहार की कोई और मिसाल मेरी जानकारी में नहीं है. तुर्क, अफगान, मुगल या ब्रिटिश शासन में भी नहीं, अगर हो तो मुझे करेक्ट करें. ऐसी जयललिता अगर चोखेर बाली नहीं होंगी, तो और कौन होगा?

यह आलेख जयललिता के महान बताने के लिए नहीं है. उन्हें क्रांतिकारी बताने के लिए भी नहीं. निजी जीवन में उनका बागी होना भी इससे सिद्ध नहीं होता. उनका समग्र मूल्यांकन और लोग करेंगे.

मेरी नजर में वे एक ऐसी शख्सियत हैं, जिन्होंने औरों की ज्यादा परवाह नहीं है. जो किया, जमकर किया. संविधान की मर्यादाओं को महत्व दिया और सामाजिक न्याय के पक्ष में खड़े होने के ऐतिहासिक मौके को थाम लिया.

बेशक यह उनकी मजबूरी रही हो या राजनीतिक चतुराई. लेकिन इतिहास कई बार घटनाओं को दर्ज करता है. नीयत का क्या है?

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