नज़रिया- तमिलनाडु की राजनीति पर भाजपा की पैनी नज़र

  • 8 दिसंबर 2016
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एआईएडीएमके नेता जयललिता के दो महीने पहले अस्पताल में भर्ती होने से लेकर उनके निधन तक पूरे घटनाक्रम के दौरान भारतीय जनता पार्टी ने जिस तरह की सक्रियता दिखाई है, वो किसी से छिपी नहीं है. तमिलनाडु में राजनीति की हालत इन दिनों नाज़ुक बनी हुई है.

ये सच है कि केंद्र की मोदी सरकार के साथ जयललिता के संबंध अच्छे थे लेकिन मोदी सरकार ने उनकी तबीयत को लेकर जो चिंता ज़ाहिर की, वो सिर्फ अच्छे संबंधों की वजह से नहीं थी.

इसके राजनीतिक कारण भी थे जो 'अच्छे संबंधों' से कहीं बड़े थे.

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यही वजह है कि इस साल सितम्बर में जयललिता के अस्पताल में भर्ती होने के बाद एक तरह का दबाव बनाया गया था कि एआईएडीएमके को अब अपना नया नेता चुन लेना चाहिए.

राजनीतिक गलियारों में आमतौर पर इस बात को स्वीकार किया जाता है कि केंद्र के दबाव की वजह से जयललिता के निधन से पहले ओ पनीरसेल्वम को अम्मा का उत्तराधिकारी बनाकर आधी रात को मुख्यमंत्री पद की शपथ दिलाई गई.

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इसकी एक साफ़ वजह ये नज़र आती है कि जयललिता के निधन के बाद एआईएडीएमके के 'भ्रमित' सांसदों को डीएमके की ओर देखने से रोका जाए. जयललिता के अंतिम संस्कार के दौरान भी कुछ दृश्य ऐसे नज़र आए जब लगा कि ये दोनों पार्टियां भविष्य में एक-दूसरे का हाथ थामने के लिए विवश हैं.

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चेन्नई के राजाजी हॉल में जहां दिवंगत जयललिता का पार्थिव शरीर दर्शनार्थ रखा गया था, वहां भावुक पनीरसेल्वम प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ओर देख रहे थे. प्रधानमंत्री मोदी ने शशिकला को जिस तरह से सांत्वना दी, उसने विश्लेषकों को सोचने पर विवश कर दिया.

विश्लेषक इस बात से इंकार नहीं कर रहे हैं कि जयललिता के निधन के बाद भारतीय जनता पार्टी अपनी जगह तलाशने की हर संभव कोशिश कर रही है.

कोयम्बटूर में रहने वाले राजनीतिक विश्लेषक जी सत्यमूर्ति ने बीबीसी हिंदी से कहा, ''इसमें किसी को कोई हैरानी नहीं होनी चाहिए यदि एआईएडीएमके को भारतीय जनता पार्टी की बी टीम बना दिया जाए. सवाल बस इतना है ऐसा कब होगा.''

सत्यमूर्ति एआईएडीएमके के एक नेता का बयान दोहराते हैं जिसमें उन्होंने कहा था कि जयललिता के संरक्षक 'एमजी रामचंद्रन के बाद सब शून्य थे और अब जयललिता के बाद भी यही स्थिति है. इसलिए तमिलनाडु में नई पारी की शुरुआत के लिए भारतीय जनता पार्टी के पास बेहतरीन अवसर है.''

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सत्यमूर्ति की इस बात से वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक मालन सहमति जताते हैं. मालन कहते हैं, ''एक ताकतवर नेता की ग़ैर-मौजूदगी में एआईएडीएमके को इस बात के लिए मजबूर किया जाएगा कि वो किसी पार्टी के साथ गठजोड़ करे. अपने झंडे को बुलंद रखने के लिए एआईएडीएमके चाहकर भी डीएमके के साथ नहीं जा सकती. केंद्र में भारतीय जनता पार्टी की सरकार है. ऐसे में कोई नौबत आई तो एआईएडीएमके गठबंधन के लिए भारतीय जनता पार्टी के साथ जाएगी. धार्मिक भावनाएं, मंदिर से जुड़ी आस्थाएं भी एआईएडीएमके को भाजपा के नज़दीक लाती हैं. लेकिन वो अपनी अलग पहचान बनाकर रखेंगे.''

तमिलनाडु की राजनीति को समझने वाले पंडितों को एक और पहलू नज़र आ रहा है और वो ये कि एआईएडीएमके काडर इस बात से ख़ुश नहीं है कि शशिकला, जयललिता की छाया बनकर उभर रही हैं. शशिकला ने जयललिता का अंतिम संस्कार किया, ये बात उन्हें पसंद नहीं आई.

मद्रास विकास अध्ययन संस्थान में प्रोफेसर एआर वेंकटचलपति कहते हैं, ''वो 30 साल तक सत्ता के करीब रही हैं, क्या आपको लगता है कि वो आसानी से सब कुछ छोड़ देंगी.''

वैसे तमिलनाडु में हर कोई ये बात जानता है कि जयललिता की करीबी होने के कारण शशिकला ख़ूब जानती हैं कि पार्टी को कैसे चलाया जाता है. जानकार मानते हैं कि शशिकला जनरल सेक्रेटरी बनकर पार्टी की मुखिया बनना पसंद करेंगी.

उधर कोई अच्छा ओहदा नहीं मिलने पर गौंदर समुदाय से इसके ख़िलाफ़ कुछ आवाज़ें उठ सकती हैं.

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गौंदर समुदाय का मानना है कि उनके समर्थन की वजह से अन्नाद्रमुक को सरकार बनाने लायक बहुमत मिला था. चूंकि थेवर समुदाय के पन्नीरसेल्वम को दो बार मौका मिल चुका है, इसलिए सरकार चलाने का अगला मौक़ा उन्हें ही मिलना चाहिए

प्रोफेसर वेंकटचलपति कहते हैं, ''ये तो साफ है कि गौंदर समुदाय की भुजाएं अपना दमखम दिखाना चाह रही हैं.''

वहीं राजनीतिक विश्लेषक मालन कहते हैं, ''हो सकता है कि शशिकला किसी और को जनरल सेक्रेटरी बनाने पर राज़ी हो जाएं और सत्ता अपने ही हाथ में रखें. इस संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता.''

इस सबके बीच भारतीय जनता पार्टी निश्चित तौर पर एआईएडीएमके की अंदरुनी उथल-पुथल पर नज़र बनाए रखेगी ताकि उसे अपने पांव पसारने का मौका मिल सके.

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