गंगा कैसे बहती रही भारत से बांग्लादेश तक

  • 12 दिसंबर 2016
Image caption गंगा की एक धारा बांग्लादेश जाती है, जहां उसे पद्मा कहते हैं

साल 1971 में बांग्लादेश बनने के कुछ समय बाद ही गंगा के पानी को लेकर भारत से मनमुटाव होने लगा था.

फ़रक्का परियोजना से इसमें और तल्ख़ी आई.

लेकिन यह स्थिति 1986 में बदली जब दोनों देशों में नई सरकारें सत्ता में आईं. बांग्लादेश में 21 साल बाद शेख हसीना सत्ता में लौटीं और भारत में एचडी देवगौड़ा तीसरे मोर्चे के प्रधानमंत्री बने.

बांग्लादेश मरती नदियाँ

नाउम्मीदी का स्मारक बना फरक्का बैराज!

क्यों ख़त्म हो रही हैं बांग्लादेश की नदियां?

गंगा में डुबकी लगाते थे, अब चलकर पार करते हैं!

दोनें देशों के प्रधानमंत्रियों ने गंगा समझौते पर दस्तख़त किए. यह बीते 25 साल में कोई सोच भी नहीं सकता था.

Image caption ज्योति बसु का मानना था कि गंगा में पानी का बहाव दोनों देशों में समान रूप से रहे

तत्कालीन विदेश सचिव सलमान हैदर ने बीबीसी से कहा, "इस तरह का समझौता तभी हो सकता है जब दोनों देशों की सरकारों में राजनीतिक इच्छा शक्ति और दृढ़ संकल्प हो."

बहुमत वाली कांग्रेस की सरकारें जो काम नहीं कर सकीं, वह छोटे क्षेत्रीय दलों के गठजोड़ से बनी सरकार ने कर दिखाया.

भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) के सांसद मोहम्मद सलीम ने बीबीसी से कहा, "पानी को लेकर झगड़े तो दो राज्यों या देशों के बीच होते ही रहते हैं. भारत में कृष्णा और कावेरी नदियों के पानी को लेकर तमिलनाडु, केरल और कर्नाटक और आंध्र प्रदेश की लड़ाई सबके सामने है. सिंधु के पानी को लेकर भारत-पाकिस्तान में दिक्क़ते हैं. इसी तरह गंगा के पानी को लेकर भारत और बांग्लादेश में मतभेद थे."

तीसरे मोर्चे की सरकार के गठन में वामपंथियों की महत्वपूर्ण भूमिका थी. माकपा उस सरकार में शामिल नहीं थी. पर सरकार के गठन में तत्कालीन पार्टी महासचिव हरकिशन सिंह सुरजीत और पोलित ब्यूरो सदस्य ज्योति बसु की भूमिका महत्वपूर्ण थी. इससे पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री बसु को अपनी बात ज़्यादा ज़ोरदार तरीक़े से रखने का मौक़ा मिला.

ज्योति बसु ने गंगा के पानी को लेकर जो सूझबूझ दिखाई, उससे उनकी बातें दोनों ही देशों को मंजूर थीं. उनका कहना था कि पद्मा की धारा बरक़रार रहे ताकि बांग्लादेश के खेतों को पानी मिलता रहे, साथ ही गंगा में पर्याप्त पानी रहे ताकि कोलकाता बंदरगाह ठीक ढंग से काम करते रहें.

एच डी देवगौड़ा ने इस मु्द्दे पर बीबीसी से कहा, "गंगा समझौता ज्योति बसु के सहयोग और सूझबूझ से ही हो सका. उनकी कोशिशों की वजह से ही मैं वर्षों पुरानी समस्या का हल निकाल सका. इस समझौते पर बीते 20 साल में कोई समस्या नहीं हुई है. सब कुछ शांति से चल रहा है."

लेकिन जब समझौते का मसौदा तब तैयार किया जा रहा था, तमाम तरह की तकनीकी समस्याएं थीं.

सलमान हैदर ने कहा, "निश्चित तौर पर शुरू में काफ़ी दिक्क़तें थीं. गंगा के पानी के बंटवारे की बात सबसे पहले ब्रिटिश सरकार ने 1930 के दशक में कही थी. हुगली में पानी के प्रवाह को बढ़ा कर कलकत्ता बंदरगाह को बचाने की योजना उन्हीं की थी."

आज़ादी के बाद भी लोगों को लगता था कि कश्मीर के बाद सबसे बड़ी समस्या गंगा पानी के बंटवारे को लेकर ही थी.

माकपा के उस समय के युवा नेता मोहम्मद सलीम कहते हैं , "ज्योति बसु का मानना था कि गंगा का पानी बांग्लादेश को मिलता रहे तो वहां के किसान अच्छी फसल उगा लेंगे. इसके पीछे ग़रीबों के प्रति उनकी साम्यवादी सोच भी थी. इसके अलावा उनका मानना था कि बांग्लादेश को अनाज को लेकर आत्मनिर्भर होना ही चाहिए. बसु दूसरे नेताओं को यह समझाने में कामयाब हुए कि गंगा के साथ पद्मा में भी पानी बहता रहना चाहिए."

मो. सलीम आगे कहते हैं, "ज्योति बसु इस मुद्दे पर निस्वार्थ होकर सोचते थे. वे अपने क्षेत्र, राजनीतिक लाभ, पार्टी, मतदाता वगैरह की सोच से ऊपर थे, वे सभी बांग्लाभाषियों के नेता थे. आज जो पश्चिम बंगाल में सत्ता में हैं, उन्होंने उस समय बसु के ख़िलाफ़ मुहिम चलाया था और इस क़रार का जबरदस्त विरोध किया था. यहां तक कहा गया था कि बसु रिटायर होने के बाद बांग्लादेश जा कर बस जाएंगे."

देवगौड़ा ने कहा, "मैं राज्य का सिंचाई मंत्री रह चुका था, मुझे कावेरी मुद्दे पर कर्नाटक के साथ हुए विवाद की वजह से इस विषय की संवेदनशीलता की जानकारी थी. इसलिए मुझे कोई अजूबा नहीं लगा न ही कोई दिक्क़त हुई. मैं गंगा के मुद्दे को समझ सकता था."

Image caption फरक्का बराज से बांग्लादेश-भारत के रिश्तों में खटास आ गई

सलमान हैदर ने क़रार के पीछे की बात के बारे में कहा, "बसु मूल रूप से पूर्व बंगाल के रहने वाले थे. वे कुछ दिन पहले ही अपने गांव गए थे. वहां से लौटने के बाद उन्होंने बहुत ही भावुक हो कर मुझसे कहा था कि यदि कलकत्ता बंदरगाह पर समझौता किए बग़ैर बांग्लादेश के लिए कुछ किया जा सकता है, तो हमें इस पर सोचना चाहिए."

हैदर को इससे यह समझने में सुविधा हुई कि उस समय का राजनीतिक नेतृत्व क्या चाहता है. कुछ हफ़्तों में ही सारा काम पूरा हो गया. दिसंबर के ठंड भरी सुबह में एक दिन दिल्ली में इस पर दस्तख़त भी हो गए.

हैदर इस मामले में इंद्र कुमार गुजराल की भी चर्चा करते हैं. उन्होंने कहा, "इंद्र कुमार गुजराल को दक्षिण एशिया की समझ थी. उनका मानना था कि भारत पूरे इलाक़े का सबसे बड़ा देश है. इसलिए इसे थोड़ा आगे बढ़ कर पहल करनी चहिए और उदारता दिखानी चाहिए. यह गुजराल डॉक्ट्रीन का हिस्सा था. इससे हमें क़रार तैयार करने में सहूलियत हुई."

सिंधु नदी के पानी के बंटवारे पर विश्व बैंक की मध्यस्थता से भारत और पाकिस्तान के बीच समझौता हुआ था. इस पर आज भी दोनों देशों की कड़वाहट सामने आ जाती है. पर गंगा के पानी के बंटवारे पर ऐसी कड़वाहट भारत और बांग्लादेश के बीच नहीं है. समझौते के कुछ बिंदुओ पर दोनों देशों के बीच असहमित हो सकती है, पर क़रार बरक़रार है.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)

बीबीसी न्यूज़ मेकर्स

चर्चा में रहे लोगों से बातचीत पर आधारित साप्ताहिक कार्यक्रम

सुनिए

मिलते-जुलते मुद्दे