'मेरा जवाब था राम का पूरा नाम बताओ, या...'

  • 10 दिसंबर 2016
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हमारा समाज वाल्मिकी समाज के नाम से जाना जाता था. पंजाब, हरियाणा और दिल्ली में इस समाज को चुराह भी कहते हैं.

मुझे आज भी याद है वो दिन, जब मैं स्कूल के लिए निकला तो बच्चे चिल्ला रहे थे चुराह-चुराह आ गया. मैंने घर आकर अपनी मां से पूछा कि चुराह क्या होता है, तो उन्होंने मुझसे कहा कि उन बातों पर ध्यान मत दे, अपना काम कर.

लेकिन मुझे समझ में आ गया था कि ये मुझे चिढ़ाने के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है, ख़राब शब्द है और ग़ैर क़ानूनी भी है.

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धीरे धीरे मुझे स्कूल में इसे झेलना भी पड़ा. बच्चे मेरे साथ खेलते नहीं थे. उसी स्कूल में मेरी मां सफ़ाई कर्मी थीं. वहां पानी वाले टॉयलेट नहीं थे.

ड्राई टॉयलेट का इस्तेमाल होता था, जिसमे राख डाला जाता था. मेरे मां उसे साफ़ किया करती थी. तो मेरे स्कूल में हर छोटा बच्चा मुझे चिढ़ाता था. टीचर में मुझे स्वीपर का बेटा कह कर बुलाते थे.

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एक सफ़ाईकर्मी परिवार में जन्मे विमल के पीएचडी करने की कहानी.

दूसरे बच्चे मुझे पिटाई करते थे, मैं उनके साथ बैठ ही नहीं पाता था. मुझे बहुत बुरा लगता था, मैं स्कूल नहीं जाना चाहता था, लेकिन मेरी मां पढ़ाई के लिए कहती थी, किसी तरह से मुझे स्कूल भेजती थीं. वो वहीं काम करती थीं, तो मैं जाता रहा.

मैं अपने समुदाय का इकलौता छात्र था, अपने स्कूल. मैं अपनी कक्षा में सबसे पिछले बेंच पर बैठा करता था.

मैं स्कूल के दूसरे बच्चों के साथ नहीं खेल पाता था, मैं क्रिकेट खेलना चाहता था. इसके लिए मैंने अपनी बस्ती के लड़कों की ही टीम बनाई. हमारे पास सुविधा नहीं थी, जूते नहीं थे. बैट नहीं थे.

हम पहला मैच उच्च जाति के बच्चों से हार गए. लेकिन हमने बाद में अभ्यास करके ना केवल जीत हासिल की बल्कि लगातार तीन टूर्नामेंट जीत लिए. इस कामयाबी के बाद उच्च जाति के लड़कों ने हमें अपनी टीम में शामिल किया, क्योंकि वे बेस्ट इलेवन खिलाड़ियों की टीम बनाना चाहते थे.

धीरे धीर मैं अपनी क्लास का मॉनिटर भी बना. दबाव के पलों में मैंने बेहतर करना सीखा. मुझे लगा कि संघर्ष नहीं किया तो कुछ नहीं कर पाऊंगा.

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मुझे नहीं मालूम था कि मुझे क्यों पढ़ना चाहिए, क्या करना चाहिए? जब मैंने बाबा साहेब अंबेडकर के बारे में पढ़ा कि कितनी सारी मुसीबतें झेलने के बाद भी उन्होंने अपनी ज़िंदगी में कितना काम किया, भारत का संविधान लिखने में अहम भूमिका निभाई.

तब मुझे काफ़ी प्रेरणा मिली, मुझे एक रास्ता मिला. मुझे लगा कि इसी रास्ते पर बढ़कर, पढ़ लिखकर आगे बढ़ सकते हैं, दूसरों को भी आगे ला सकते हैं. धीरे धीरे पढ़ाई होती गई है.

अभी मैं टाटा इंस्टीच्यूट ऑफ़ साइंसेज़, मुंबई से पीएचडी कर रहा हूं, मेरे पीएचडी का विषय हरियाणा में जातीय हिंसा है.

इसकी भी एक कहानी है, एक बार मैं ट्रेन में सफ़र कर रहा था तो मुझसे किसी ने पानी मांगा. मैंने दे दिया, अगली सुबह उस शख़्स ने पूछा कि तुम्हारा पूरा नाम क्या है, मैंने कहा विमल.

उसने कहा पूरा नाम, मैंने कहा कि विमल ही है पूरा नाम. तो उसने कहा कि इस दुनिया में हर किसी का सरनेम होता है. मैंने उससे कहा कि तुम किस भगवान को मानते हो, उसने कहा कृष्ण. मैंने कहा कि उनका पूरा नाम बताओ, या फिर राम का बताओ, या फिर विष्णु का ही.

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तो उसने मुझसे कहा कि ये सब भगवान हैं, मैंने कहा कि मेरा नाम भी उसी लिस्ट में लिख लो. लेकिन मुझे उसी दिन लगा कि मेरे नाम में डॉक्टर विमल होना चाहिए.

अब पीएचडी पूरी होने वाली हैं, मैं डॉक्टर विमल कहलाने लगूंगा.

वैसे मैंने 2009 में सफाईकर्मियों के लिए एक आंदोलन शुरू किया है. मैंने इसके लिए 15 राज्यों का दौरा किया और अपने समुदाय के लोगों से मुलाक़ात करके उन्हें बताने की कोशिश की है हम कैसे आगे बढ़ सकते हैं, अपनी जगह बना सकते हैं.

अपने इस आंदोलन की शुरुआत में हमारा ध्यान छोटे बच्चों पर ज्यादा है. अपने इलाक़े में सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों को दो घंटे की अतिरिक्त कोचिंग देते हैं, मुफ़्त में. उनकी मुश्किलों का हल निकालते हैं.

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हमने इस आंदोलन को भुवनेश्वर, ओडिशा में भी शुरू करने की कोशिश की थी, 2015 में शुरू किया था, लेकिन वो चल नहीं पाया है अब तक.

हम कोशिश कर रहे हैं कि ऐसे सेंटर भारत के विभिन्न इलाक़ों में खोलें ताकि अपने समुदाय के बच्चों की ज़्यादा से ज़्यादा मदद कर सकें.

(विमल कुमार की रोहित जोशी से बातचीत पर आधारित)

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