लड़की का पीछा, जबरन दोस्ती की कोशिश प्यार है?

  • 14 दिसंबर 2016
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बॉलीवुड के गानों में अकसर हीरो हिरोइन का पीछा करता है, उसे परेशान करता है, ज़बरदस्ती उससे दोस्ती करने की कोशिश करता है और हिरोइन बार-बार मना करती है लेकिन आख़िरकार मान जाती है.

देखने में काफ़ी 'हैप्पी' लगने वाली इस 'स्टोरी' में कई लोगों को कुछ ग़लत भी नहीं लगता. लड़की इसे छेड़छाड़ या बद्तमीज़ी नहीं बल्कि इज़हार-ए-मोहब्बत मानती है.

हाल ही में इस चलन पर सवाल उठाने वाला एक वीडियो जारी हुआ.

इसमें कहा गया कि दशकों से फ़िल्मों में हिरोइन की 'ना' को 'हां' बताने की वजह से आम ज़िंदगी में भी लोग समझने लगे हैं कि लड़कियों को पसंद है कि उन्हें छेड़ा जाए या ज़बरदस्ती प्यार जताया जाए.

ऑडियो: लड़कियों के साथ छेड़छाड़ करने वाले गानों का चलन कितना सही?

बाहुबलीः ये रिझाना है या बलात्कार?

लड़की का 'नहीं', मतलब 'नहीं'

मिसाल के तौर पर अब से 26 साल पहले आई फ़िल्म 'दिल' के गाने "ख़म्बे जैसे खड़ी है..." को ही लीजिए.

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1990 में रिलीज़ हुई इस फ़िल्म में आमिर ख़ान, कॉलेज में माधुरी दीक्षित के बारे में गाना गाते हैं और उनको बहुत परेशान करते हैं.

आख़िर में ज़बरदस्ती से उस 'ना' को 'हां' में बदल दिया जाता है. फ़िल्म के निर्देशक इंद्र कुमार याद दिलाते हैं कि यही आम जनता की पसंद है, और जब वो फ़िल्म आई थी, तब लोगों को बहुत पसंद आई थी.

साथ ही वो मानते हैं, "हो सकता है 'कमर्शियल' फ़िल्मों को बनाने के चक्कर में हम कुछ ग़लत दिखाते हों, लेकिन मैं तो 'कमर्शियल' फ़िल्में बनाता हूं, मैं 'ग्रैंड मस्ती' बनाता हूं जिसे देखने वाला एक बड़ा वर्ग है."

गीतकार क़ौसर मुनीर के मुताबिक ये बिल्कुल ग़लत चित्रण था क्योंकि ये हिरोइन की रज़ामंदी के बिना की जा रही छेड़छाड़ को 'ग्लोरिफ़ाई' कर सही ठहरा रहा था.

वो कहती हैं, "उस गाने में छेड़छाड़ तो आगे जाकर लगभग बलात्कार का रूप ले लेती है, 1980-90 के दशकों की फ़िल्मों में ऐसा बहुत ज़्यादा देखा गया था."

पर हाल की फ़िल्म 'मैं तेरा हीरो' का गाना "पलट…" के बोल लिखते व़क्त कौसर मुनीर के सामने भी ऐसी ही चुनौती थी.

कॉलेज में हीरो-हिरोइन को अपनी ओर आकर्शित करने के लिए गाना गाता है और वो भी हिरोइन को नापसंद ही है.

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तो क्या दशकों से बॉलीवुड में औरतों की रज़ामंदी के चित्रण में कोई बदलाव नहीं आया है?

कौसर मुनीर के मुताबिक 'क्रिएटिविटी' यानी मौलिकता के नाम पर बहुत ग़लत चित्रण को सही ठहराया जा रहा है.

वो कहती हैं, "ख़तरा ये है कि छोटे शहरों के गली-नुक्कड़ पर बैठे लड़के जब लड़कियों को देखते हैं, तो उनके दिमाग में इन्हीं गानों की ग़लत छवि रहती है."

तो हमने बीबीसी हिंदी के फ़ेसबुक पन्ने पर पाठकों से ही पूछ डाला कि इसी साल रिलीज़ हुई फ़िल्म 'सुल्तान' में "बेबी को बेस पसंद है...", जैसा गाना बद्तमीज़ी है या इज़हार-ए-मोहब्बत?

सलमान खान ये गाना अनुष्का शर्मा के लिए गा रहे हैं, जबकि अनुष्का को ये पसंद नहीं आ रहा.

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पर जैसा अमूमन हिन्दी फ़िल्मों में होता है, हिरोइन की 'ना' में 'हां' समझी जाती है और आख़िर में अनुष्का को हीरो से प्यार हो ही जाता है.

इस पर एक पाठक अमित चौहान ने कहा, "ये फिल्मों में इज़हार-ए-मोहब्बत होगा पर असल जीवन में 'ईव-टीज़िंग' और 'हैरेसमेंट' यानी उत्पीड़न है."

एक और पाठक अभिशेक पांडे लिखते हैं, "फ़िल्में समाज का आइना होती हैं लेकिन ये भी सच है कि फ़िल्मों का भी समाज पर असर होता है."

रवि शंकर लिखते हैं, "क़ानूनन जुर्म है, दण्डनीय अपराध; फिर भी अभिव्यक्ति की आज़ादी की आड़ में दिखाते रहते हैं, स्थिति तो वाकई विरोधाभास वाली है."

फ़िल्म आलोचक ऐना वेटिकाड के मुताबिक बॉलीवुड की नज़र में लड़कियों के साथ की जाने वाली ऐसी हिंसा क्यूट और मज़ेदार है, और इसी ग़लत धारणा को बार-बार चुनौती देने की ज़रूरत है.

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कुछ हलकों में ये समझ होने के बावजूद ऐसा चित्रण करनेवाली फ़िल्में पसंद की जाती हैं.

'किक' फ़िल्म के गाने "जुम्मे की रात है..." को ही लीजिए जिसमें हीरो हिरोइन को मना रहा है और उस दौरान दर्जनों आदमियों के सामने उसके 'अंडरवेयर' को 'किस' करने की कोशिश करता है.

इस गाने को लिखनेवाले गीतकार सब्बीर के मुताबिक वो अपने हर गाने में औरतों की इज़्ज़त करते हैं, और इस गाने में भी लोगों को आहत करने की कोई मंशा नहीं है.

उनके मुताबिक, "हम तो गाना लिख देते हैं, उसका चित्रण और फ़िल्म में उसे कहां-कैसे इस्तेमाल किया जाए ये डायरेक्टर और कोरियोग्राफ़र के हाथ में होता है."

कौसर मुनीर भी मानती हैं कि फ़िल्मों में उनके लिखे गाने कैसे इस्तेमाल होते हैं, ये किसी एक व्यक्ति के हाथ में नहीं है बल्कि इसमें कई लोगों की भूमिका होती है.

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हालांकि निर्देशक इंद्र कुमार के मुताबिक मोबाइल पर आसानी से इंटरनेट उपलब्ध होने के इस दौर में फ़िल्मों में लड़के-लड़की के बीच के इस चित्रण को समाज पर असर के लिए इतना ज़िम्मेदार ठहराना सही नहीं है.

वो कहते हैं, "आज लोग मोबाइल के ज़रिए पोर्न देख रहे हैं अगर ऐसे में मैं एक फ़िल्म बना रहा हूं तो आप मुझे कटघरे में डाल रहे हैं, तो क्या आप फ़िल्मों के अलावा इंटरनेट और मोबाईल पर रोक लगाएंगे जो 12 साल के बच्चों को बिगाड़ रहा है?"

बॉलीवुड चाहे जो सफ़ाई दे, ये समझना ज़रूरी है कि उसकी लोकप्रियता की वजह से अगर फ़िल्मों में ऐसे उत्पीड़न को मोहब्बत या हिरोइन को पाने का कारगर रास्ता बताया जाए या हिरोइन की ना को हां बताया जाए तो ये समाज में ऐसी सोच को बढ़ावा ज़रूर देता है.

ऐना वेटिकाड के मुताबिक इसमें अगर कोई बदलाव लाना है तो बॉलीवुड को उसकी भागीदारी और ज़िम्मेदारी के बारे में बार-बार याद दिलाना बहुत ज़रूरी है.

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