जयललिता की भतीजी के पीछे कौन!

  • राधिका रामाशेषण
  • वरिष्ठ पत्रकार
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जयललिता के पार्थिव शरीर के पास दीपा जयकुमार

जयललिता ने न तो कोई वसीयत छोड़ी और न ही किसी को अपना सियासी वारिस बनाया. इसलिए ज़ाहिर है कि उनकी विरासत का सवाल विवादों में फंस जाएगा. इसमें राजनीतिक विरासत से लेकर और जायदाद तक का सवाल शामिल है.

उन्होंने परिवार के किसी व्यक्ति का नाम भी नहीं लिया और न ही किसी ट्रस्ट की कभी बात की और न ही पार्टी के लिए उत्तराधिकार छोड़ने की कोई चर्चा की. इसलिए इस मामले का विवादों में पड़ना तो तय है.

लोगों को ये पता तो था कि जयललिता का एक परिवार है लेकिन इतने सालों में तो उनका कभी ज़िक्र नहीं हुआ.

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अन्नाद्रमुक ने शशिकला को पार्टी की कमान सौंप दी है.

लेकिन जयललिता की भतीजी दीपा जयकुमार जिस ढंग से मीडिया में लगातार इंटरव्यू दे रही हैं और शशिकला की भूमिका के बारे में सवाल उठा रही हैं, ऐसा लग रहा है कि उन्हें किसी की शह हासिल है. कोई है जो उनके पीछे है.

इस वक्त शशिकला जब अपनी स्थिति को मज़बूत करने में लगी हैं तो उन्हें दी जा रही चुनौती से ऐसा लगता है कि दीपा को कुछ ताक़ेतें पीछे से समर्थन दे रही हैं. इस लिहाज़ से तमिलनाडु की राजनीति एक दिलचस्प मोड़ पर खड़ी है.

जहां तक जयललिता की संपत्ति की बात है तो उस पर दावा उनके परिवार का बनता है. यह तो सभी जानते हैं कि दीपा के पिता जयकुमार जयललिता के सगे भाई थे. जयललिता की भाभी चेन्नई में रहती हैं.

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शशिकला

इस हिसाब से जयललिता की संपत्ति पर क़ानूनी तौर पर उनके परिवार का ही दावा बनता है. हालांकि जयललिता के घर पोएस गार्डन में फ़िलहाल शशिकला का डेरा है और पार्टी ने उन्हें अपना महासचिव भी घोषित कर दिया है.

सवाल उठता है कि शशिकला के लिए यह सियासी तौर पर कितना आसान है. इसमें शक़ नहीं है कि शशिकला की राह कई चुनौतियां हैं. अन्नाद्रमुक की पूरी राजनीति ही जातीय समीकरणों पर टिकी है. यहां तक कि तमिलनाडु की पूरी राजनीति पर ही जातिवाद हावी है.

अन्नाद्रमुक में थेवर और गाउंडर समुदाय हावी है. इनके अलावा पार्टी में दलितों का भी प्रभाव है. इस समय थेवर समुदाय के ही पनीरसेल्वम मुख्यमंत्री और शशिकला पार्टी की प्रमुख हैं. लेकिन यह कोई स्थाई समाधान नहीं है.

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भाई जयकुमार की शादी में जयललिता.

गाउंडर समुदाय के विधायक भी आने वाले समय में गुट बना सकते हैं. अन्नाद्रमुक नेता थम्बिदुरई गाउंडर समुदाय से ही आते हैं. जो लोग अभी चुप हैं, वे धीरे-धीरे मुखर होते जाएंगे. ये देखने वाली बात होगी कि अन्नाद्रमुक की अंदरूनी राजनीति आने वाले समय में किधर करवट लेती है.

फिलहाल नवमनोनीत महासचिव शशिकला अपनी स्थिति मज़बूत करने के लिए हर मुमकिन कोशिश करेंगी. थेवर समुदाय भले ही उन्हें अपना नेता मान ले लेकिन गाउंडर और दलित समुदाय क्या उन्हें स्वीकार कर पाएगा.

जयललिता जिस तरह से हर समुदाय को साथ लेकर चलती थीं क्या शशिकला उन्हीं के नक्शे कदम पर चल पाएंगी. यह भी देखने वाली बात होगी. इसमें कोई दो राय नहीं है कि आने वाले समय में शशिकला को दीपा जयकुमार की चुनौती मिलने वाली है.

(बीबीसी संवाददाता निखिल रंजन से बातचीत पर आधारित.)

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