नज़रिया: 'मर्द बनाने का सांचा बदलना होगा'

  • 17 दिसंबर 2016
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उस नौजवान लड़की के साथ हुई यौन हिंसा को चार साल हो गए हैं. आज उसे अलग-अलग तरीके से याद किया जा रहा है. उसे कुछ लोग निर्भया, तो कुछ दामिनी का नाम देते हैं. याद है, उस वक्‍त मुल्‍क भर में ग़म और गुस्‍सा था.

सर्द रातों में भी लोग सड़कों पर थे. इसका असर हुआ. क़ानून में कुछ बदलाव आए.

हालांकि, इतना सब होने के बाद बाद भी महिलाओं के साथ होने वाले अपराध में कमी नहीं आई है.

हर रोज देश के लगभग हर राज्‍य से महिलाओं के साथ होने वाले अपराध की ख़बर सुनी और पढ़ी जा सकती है. जुर्म की नई-नई शक्‍ल हमारे सामने आने लगी है.

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मगर वैसी बेचैनी की बात तो छोड़ दें, समाज में थोड़ी सुगबुगाहट भी नहीं दिखाई देती है. जो कुछ दिखता है, वह ज्‍यादातर ख़बरों में ही नज़र आता है.

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ऐसा क्‍यों है?

क्‍या जब तक वैसी हिंसा नहीं होगी, जैसी निर्भया के साथ हुई थी, हम नहीं हिलेंगे? क्‍या हम अपने सामने दामिनियों/निर्भयाओं के होने का इंतज़ार करेंगे? क्‍या हम बलात्‍कार और हत्‍या के इंतज़ार में बैठे रहेंगे? क्‍या हमें हर बार जागने के लिए ग़ैर-इंसानी सुलूक, हिंसा, खून और मौत चाहिए?

लगता तो ऐसा ही है.

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लड़कियों/महिलाओं के साथ इसलिए जुर्म नहीं होता है कि वे 'इंसान' हैं. उनके साथ इसलिए हिंसा होती है कि वे 'स्‍त्री' हैं. स्‍त्री होने के नाते लड़कियों/महिलाओं के ख़िलाफ़ जुर्म की फेहरिस्‍त काफी लंबी है. ये जुर्म हमारे समाज में लड़कियों/महिलाओं की असली हक़ीक़त बताते और दिखाते हैं.

राष्‍ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्‍यूरो (एनसीआरबी) अपराधों का पुलिसिया रिकॉर्ड इकट्ठा करता है. इस रिकॉर्ड के मुताबिक़, 2015 में तीन लाख 30 हज़ार 187 लड़कियों/महिलाओं को महज 'स्‍त्री' होने के नाते कई जुर्म का शिकार होना पड़ा.

इस जुर्म में हर तरह की यौन हिंसा, घरेलू हिंसा, एसिड अटैक, घर के अंदर हिंसा, अपहरण, अनजाना और अनचाहा स्‍पर्श, भद्दे कमेंट, गालियां, जोर-जबरदस्‍ती, बलात्‍कार, बलात्‍कार की कोशिश, दहेज के लिए हत्‍या, पति या ससुरालियों के अत्‍याचार जैसी सब चीजें हैं.

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यह साफ है कि सभी लड़कियों के साथ दामिनी जैसी हिंसा नहीं होती है लेकिन वे दामिनी जैसी दिमाग़ी हालत से हर रोज गुजरती हैं. इसलिए पुलिस के पास दर्ज संख्‍या सिर्फ महिलाओं के प्रति होने वाली हिंसा के बारे में संकेत भर ही देती है. किसी लड़की का दिल ही इस संख्‍या के बारे में सही-सही बता सकता है.

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इसलिए अहम सवाल यह है कि यह हिंसा कौन कर रहा है? यह होती क्‍यों है? हालांकि यह लंबे शास्‍त्रीय विमर्श का विषय है. इसके अनेक कारण गिनाए जा सकते हैं.

एक अहम कारण है- हम मर्दों की स्‍त्री के बारे में सोच. यह सोच क्‍या है? यह सोच है- मर्द, स्‍त्री से श्रेष्‍ठ होता है. बेटा-बेटी बराबर नहीं होते हैं. पुत्र की शक्‍ल में मर्द ही घर का चिराग है. वंश जैसी लत्‍तड़ वही आगे बढ़ाएगा. वह ताकतवर होता है. वही घर-परिवार समाज चलाने वाला होता है. सब चीजों पर उसका ही काबू होता है. मर्द काम कर पैसा लाता है, इसलिए स्‍त्री को उसकी सेवा करनी चाहिए. मर्द को हर स्‍त्री को अपने काबू में रखना चाहिए. स्त्रियों को ज्‍यादा छूट नहीं देनी चाहिए.

स्त्रियों को इस दुनिया में मर्दों की सेवा के लिए बनाया गया है. स्‍त्री, मर्द की मनोरंजन का सामान है. स्‍त्री का अपना कोई वजूद नहीं होता है. जो लड़कियां बाहर दिखती हैं, उनके साथ कुछ भी किया जा सकता है. जो लड़कियां, लड़कों के साथ हंसती-बोलती-घूमती हैं, वे अच्‍छे चरित्र की नहीं होती हैं. वगैरह... वगैरह... ऐसी ढेर सारी चीजें यहां गिनाई जा सकती हैं.

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यह लड़कों और लड़कियों के प्रति समाज का नजरिया है.

यह नजरिया कोई मां के पेट में नहीं बनता है. इस नजरिए को धर्म-परम्‍परा, रीति-रिवाजों से सींचा जाता है.

आंख खोलने के बाद होशमंद होते लड़कों को हमारा समाज 'मर्द' बनाता है. पग-पग पर उसे मर्द होने का अहसास दिलाता है. उसे मर्द के सांचे में ढालने का दौर शुरू होता है. उसे दुनिया को देखने का इंसानी नजरिया नहीं सिखाया जाता है. उसे ख़ास तरह की 'मर्दानगी' वाली आंख दी जाती है. वह उसी की रोशनी से मर्द बन दुनिया देखता है. घर और आस पास भी उसे जो पुरुष दिखते हैं, वे 'ख़ास तरह के मर्द' ही नज़र आते हैं.

इस मर्दानगी में स्‍त्री के साथ किसी तरह की बराबरी की कोई जगह नहीं होती है. इसीलिए उनके प्रति किसी तरह का दोस्‍ताना और इज़्ज़त वाला सुलूक भी नहीं होता है. जहां बराबरी, दोस्‍ताना, प्रेम, सम्‍मान की जगह 'मर्द' होने का गर्व, ख़ुद के श्रेष्‍ठ होने का अहसास, ताकत पर यक़ीन, सब कुछ काबू में कर लेने का भरोसा हो... वहां हिंसा ही होगी.

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चाहे वह हिंसा किसी पर फब्‍ती कसने, किसी का पीछा करने, ताक झांक करने, दुपट्टा खींचने, सीटी बजाने, गंदा गाना गाने के रूप में ही क्‍यों न हो. यह निर्भया जैसी हिंसा की पहली सीढ़ी है.

सभ्‍य समाज में कुछ चीजें नाकाबिले बर्दाश्‍त होनी चाहिए. इनमें ग़ैर-बराबरी सबसे अहम है. ग़ैर-बराबरी का रिश्‍ता हिंसा से है.

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ग़ैर-बराबरी सामाजिक न्‍याय के उसूल के भी ख़िलाफ़ है. इसमें हमारी ओर से समाज में बनाई गई स्‍त्री-पुरुष ग़ैर-बराबरी भी है. इस ग़ैर-बराबरी में पुरुष का दर्जा ऊपर है. वह विचारों से शक्तिशाली बनाया और बताया जाता है.

उसे ही हर चीज को काबू में रखने वाला बनाया जाता है. इसलिए वह न सिर्फ़ अपनी बल्कि दूसरों की ज़िंदगी को काबू में रखता है. काबू में रखना चाहता है. उसके लिए वह हर तरीके अपनाता है. इसमें बड़ा हिस्‍सा हिंसक तरीके का होता है. यह हिंसा सिर्फ़ देह पर होने वाले लाल-नीले निशान नहीं हैं. वे अनेक रूपों में बिना निशान बनाए अपनी शक्ति की करामात दिखाते हैं.

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इसलिए महिलाओं या लड़कियों के सा‍थ होने वाली हिंसा में बड़ी तादाद ऐसी हिंसा की है जिसके निशान सिर्फ़ उनके दिल और दिमाग में असर करते हैं. उसकी तकलीफ और मारक असर का अंदाज़ा भी वही लगा सकती हैं.

इसलिए हम आमतौर पर इस हिंसा को अपने आसपास होते देखते हैं और सहज व सामान्‍य मानकर नज़अंदाज़ करते रहते हैं. ऐसी ही हिंसा, कभी निर्भया के रूप में हमारे सामने खड़ी हो जाती है. तब हमें अपने ही समाज का बदतरीन चेहरा दिखाई देता है. फिर हम महिलाओं के सम्‍मान की दुहाई देते हैं.

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इसलिए सवाल है कि हम इस हिंसा के माहौल को ही ख़त्‍म करना चाहते हैं या सिर्फ किसी लड़की के निर्भया जैसी हिंसा का शिकार होने के बाद कुछ दिनों के लिए आवाज़ बुलंद करना चाहते हैं? अगर हम वाकई में हिंसा के हर रूप को खत्‍म करना चाहते हैं तो मर्दों को इस काम में सक्रिय भागीदार और साझीदार बनना होगा. बदलने की जरूरत लड़कों/मर्दों को है.

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लड़के, मर्द बनाए जाते हैं. चूंकि वे मर्द बनाए जाते हैं, इसलिए बदले भी जा सकते हैं. बदलने की कोशिश घर से शुरू हो तो बेहतर है. उनके लालन-पालन पर अलग से गौर करने की जरूरत है.

मर्द वाला सांचा तोड़ना होगा. लड़कों को इंसान के सांचे में ढालने की जरूरत है. तब ही शायद हम लड़कियों के साथ होने वाली को कुछ हद तक काबू में कर पाएं. यही निर्भया जैसी लड़कियों को याद करने का सही मतलब और असली मक़सद होगा.

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