नज़रिया: 'यूपी में फिर थम गए राहुल की कांग्रेस के बढ़ते कदम?'

  • 22 दिसंबर 2016
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आज से कुछ महीने पहले कांग्रेस पार्टी अपने आप को फिर से उत्तर प्रदेश में ज़िंदा करने के लिए नए तरीके खोज रही थी.

ब ऐसा लगने लगा था कि चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर 27 साल से उत्तर प्रदेश में लड़खड़ाती हुई इस पार्टी को वापस पटरी पर खड़ा करने में कामयाब हो जाएंगे.

नए-नए प्रयास किए गए. हर स्तर पर टीम बनाई गई जो कि कांग्रेस पार्टी को नींद से उठाने में जुट गई. बड़ी खोजबीन के बाद पार्टी नेतृत्व इस नतीजे पर पहुंचा कि राज्य में न केवल एक नए प्रदेश अध्यक्ष की जरूरत है बल्कि किसी ऐसे चेहरे की भी आवश्यकता है जो कि कांग्रेस की तरफ से मुख्यमंत्री पद का चेहरा हो.

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शीला दीक्षित और राज बब्बर की अहमियत

तलाश राज बब्बर और शीला दीक्षित पर जाकर रुकी. दोनों नामों पर हाई कमान की मुहर लगने में वक्त नहीं लगा क्योंकि प्रदेश में दोनों पदों के लिए ऐसे चेहरों की जरूरत थी जो यहां के नेताओं के अंदरूनी झगड़ों से उठकर सबको एक साथ लेकर काम कर सकें.

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ऐसे में ये माना जा रहा था कि राज बब्बर किसी भी कांग्रेसी गुट का हिस्सा नहीं है जो आपस में लड़ते रहते हैं. वैसे ही शीला दीक्षित को भी पार्टी की भीतरी लड़ाई से कुछ भी लेना देना नहीं है. उनके नाम के पीछे और भी कई वजहें थीं.

एक तो उनका ब्राह्मण होना जो उत्तर प्रदेश की जातिवादी राजनीति में सही समीकरण बिठा सकता है और सोनिया गांधी के साथ उनकी नज़दीकी. जहां तक उनके मुख्यमंत्री बनने का सवाल था, ये बात सबको पता थी कि उन्हें मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार बनाने के पीछे केवल सांकेतिक उद्देश्य था.

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आख़िर किसको नहीं समझ में आ रहा है कि कांग्रेस तो 2017 में सत्ता में बैठने का ख्वाब भी नहीं देख रही हैं. इसके पीछे मक़सद केवल इतना था कि लोग कांग्रेस को गंभीरता से लें. शुरुआत क़ाबिल-ए-तारीफ़ थी.

मुस्लिम वोट पर नज़र

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राहुल गांधी ने एक नए किस्म के रोड शो से शुरुआत की जिसमें वे पहले की तरह हाथ हिलाते हुए गाड़ी में गुज़रते हुए नहीं जा रहे थे.

इस बार उन्होंने लोगों से सवाल-जवाब किया और ख़ुद को आम आदमी के साथ जोड़ा. संवाद स्थापित करने की प्रक्रिया कई सालों में पहली बार की गई.

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कांग्रेस पार्टी ने मैदान में न केवल अपने आप को उतारा बल्कि अपनी मौजूदगी बाक़ायदा दर्ज़ भी करवा दी. इससे पहले कांग्रेस को उत्तर प्रदेश की राजनीति में गंभीर खिलाड़ी के रूप में नहीं देखा जा रहा था.

इसलिए ऐसी शुरुआत काफी महत्वपूर्ण साबित हुई. सालों बाद कांग्रेस पार्टी के लिए एक माहौल बनने लगा.

हालांकि ऐसा मुग़ालता किसी को नहीं था कि कांग्रेस वापस सत्ता में आ सकती है.

लेकिन कांग्रेस के लिए ये बड़ी बात समझी जा रही थी कि उसकी संख्या 2007 के 29 से 2017 में 50 तक पहुंच जाए. इसी बीच मुसलमानो का समाजवादी पार्टी से मोहभंग होते दिखने लगा जिससे कांग्रेसियों में और उम्मीद जगी.

ताबड़ तोड़ रैलियां

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आख़िर यदि मुस्लिम वोट समाजवादी पार्टी से खिसकता है तो बसपा और कांग्रेस की ओर ही झुकता. और कांग्रेस से तो मुसलमानों का पुराना रिश्ता भी था.

कांग्रेस ने मौक़े का भरपूर फायदा उठाया और जुट गई मुस्लिम वोट को अपनी ओर खींचने में.

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राहुल गांधी समेत कई कांग्रेस नेताओं ने प्रदेश के अलग-अलग इलाकों में ताबड़ तोड़ रैलियां कर डालीं. जो लोग कांग्रेस को बिलकुल भुला चुके थे, अब इतने सालों बाद उसका जिक्र करने लगे.

ऐसे वक्त पर किसी ने भी नहीं सोचा था कि उसी आगे बढ़ती कांग्रेस के लिए उसी का नेतृत्व रोड़ा बन जाएगा.

राहुल गांधी जिन्होंने बेहद सुलझे तरीके से पार्टी को वापस पटरी पर लाने के लिए कोई कसर नहीं छोड़ रखी थी, एकदम से हल्केपन के बयान देने लगे.

शायद उनका वो बयान सबसे घातक साबित हुआ जब उन्होंने नरेंद्र मोदी द्वारा पाकिस्तान पर की गई 'सर्जिकल स्ट्राइक' को 'खून की दलाली' की संज्ञा दे डाली.

मोदी पर आरोप

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इस एक बयान ने सब किए कराए पर पानी फेर दिया और कांग्रेस पार्टी सांप-सीढ़ी के इस खेल में फिर से वहीं पहुंच गई जहां से उसने बाज़ी शुरू की थी.

राहुल गांधी अब नोटबंदी के खिलाफ अपनी आवाज़ बुलंद करके पार्टी को फिर से पटरी पर तेज़ी से लाने में लगे हुए हैं.

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लेकिन रेस में एक बार पीछे रह जाने के बाद वापस अपनी जगह बनाना आसान काम नहीं है. शायद राहुल गांधी को ये बात समझ में नहीं आई.

इसलिए वो एक के बाद एक ऐसे बयान देते गए जो कांग्रेस को आगे ले जाने के बजाय पीछे धकेलते गए.

सिर्फ ग़ुस्सा करके एक ऐंग्री यंग मैन वाली इमेज बनाकर रेस में आगे बढ़ना मुमकिन नहीं. हाल में राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री पर सीधा वार करते हुए कहा कि उनके पास पीएम के व्यक्तिगत भ्रष्टाचार के सबूत हैं.

भाजपा की ओर से इसे जोक बताते हुए इसका मज़ाक उड़ाया गया और इन आरोपों का सिरे से खंडन किया गया.

सपा से गठजोड़

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लेकिन जब विपक्ष के सारे बड़े नेता राष्ट्रपति के पास नोटबंदी के खिलाफ अपनी गुहार लेकर गए तभी बिना किसी से कहे राहुल गांधी प्रधानमंत्री से मिलने चले गए.

उसके बाद न प्रधानमंत्री ने भ्रष्टाचार की बात की और न उसका कोई खुलासा ही हुआ.

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इन सब हरकतों ने न सिर्फ राहुल गांधी को एक मखौल बना दिया है बल्कि कांग्रेस पार्टी को वापस वहीं पर लाकर खड़ा कर दिया है जहां वो आज से साल भर पहले खड़ी थी.

मैदान के बाहर और रेस से मीलों दूर. यदि कांग्रेस को पटरी पर लाने की कोई संभावना बची है तो वह है समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन.

ये गठबंधन समाजवादी पार्टी के लिए भी फायदेमंद साबित हो सकता है क्योंकि वो मुसलमानों के वोट को जोड़ कर रख सकती है.

ऐसे माहौल में जब वोटिंग मोदी के समर्थन में या उनके खिलाफ - मुद्दे की बुनियाद पर हो, मुस्लिम वोट की एकजुटता से चुनाव के परिणाम पर बहुत फर्क पड़ सकता है.

अखिलेश यादव तो कई बार ऐसे प्रस्तावित गठबंधन की तारीफ कर चुके हैं. अब बात राहुल गांधी के फैसले पर अटकी है और उनका ऊंट किस करवट बैठेगा, ये कोई नहीं जानता.

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