शीतल के गीतों में है दलित संघर्ष की तपिश

  • संजीव माथुर
  • बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए
शीतल साठे
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'जय भीम कॉमरेड' फिल्म से शीतल और उनके साथियों को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पहचान मिली थी.

शीतल और उनके नौजवान साथियों का 'विद्रोही शाइर जलसा' रोहित वेमूला और जेएनयू के छात्रों के पक्ष में गाने गाते हैं.

वे महाराष्ट्र से हैं लेकिन बिहार के मज़दूरों, पंजाब के किसानों से लेकर देश के हर वंचित तबके का दर्द उनकी आवाज़ और गायन में झलकता है.

शीतल के अनुसार वे "देश दुनिया में फैली असमानता और शोषण को खत्म करने के लिए जनता को जगाने के वास्ते" गाती हैं.

दिल्ली स्कूल ऑफ़ सोशल वर्क के युवा शोधकर्ता प्रशांत कहते हैं, "पुणे की एक दलित बस्ती कासेवाड़ी में जन्मी शीतल के गीतों के बोल हिंदीभाषी होने के कारण मुझे समझ नहीं आते लेकिन उनकी आवाज़ की लरज मेरे भीतर के अंधेरों को चुनौती देती है. उनकी भूमिका मेरे जीवन में गायिका से अधिक है."

महाराष्ट्र के दलित और ओबीसी आंदोलन का चेहरा रहे विलास सोनवणे कहते हैं, "यह बात सही भी है कि शीतल और उनके साथियों का जीवन बेहद संघर्ष का रहा है इसके बावजूद इन्होंने कला, विचार और इंसानियत को लगातार समृद्ध किया है."

मशहूर डॉक्यूमेंटरी फिल्ममेकर आंनद पटवर्धन का मानना है कि शीतल और उनके साथियों के आवाज़ की भारतीय लोकतंत्र को बेहद जरूरत है. हमारे समाज और लोकतंत्र इनके गानों और कविताओं के बिना अधूरा है.

पटवर्धन की फिल्म, 'जय भीम कॉमरेड' से शीतल और उनके साथियों को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पहचान मिली थी. फिल्म' को राष्ट्रीय पुरस्कार और महराष्ट्र राज्य का पुरस्कार मिला.

पुरस्कार की राशि से कबीर कला मंच डिफेन्स कमेटी का गठन किया गया. शीतल और उनके पति सचिन माली और उनके 15 साथियों को नक्सली गतिविधियों का समर्थन करने के इल्ज़ाम में 2011 में महाराष्ट्र एटीएस ने भगोड़ा घोषित कर दिया था.

इसके अलावा इन दोनों समेत अन्य साथियों पर गैर-कानूनी गतिविधि निवारण अधिनियम की कई अन्य धारओं के तहत आरोप भी लगाए गए हैं.

शीतल का मामला कोर्ट में होने के कारण इन आरोपों पर कुछ नहीं कहना चाहती हैं लेकिन वह बताती हैं, ''हमने खुद को पूछताछ के लिए पुलिस को सौंपने का निर्णय लिया था.''

जब शीतल गिरफ्तार हुईं, तब वे गर्भवती थी. बाद में शीतल को कोर्ट ने मानवीय आधार पर जमानत दी ताकि वे बच्चे को जन्म दे सकें.

शीतल ने अपने बच्चे का नाम अभंग रखा है. शीतल के अनुसार ढाई साल का अभंग "अब तक अपने पिता को नाम से ही जानता है. वह अपने पिता के स्नेह से वंचित है क्योंकि वे जेल में बंद हैं. अभंग के इस मानसिक, सामाजिक और मानवाधिकार की बात कौन करेगा?"

यह पूछने पर बेटे का नाम अभंग क्यों रखा शीतल आंखों में आई नमी को पोंछते हुए बताती है कि "अंभग महाराष्ट्र के लोक गायन की शैली है और हमने बहुत से गीतों की रचना इस शैली में की है. सो यह नाम हमारे दिल के काफी करीब है सो रख दिया."

वह बताती हैं, "मैंने अपनी पढ़ाई पूणे के फर्ग्यूसन कॉलेज़ से की है लेकिन कॉलेज में जाने से पहले ही मैंने गाना शुरू कर दिया था. इस बीच में सचिन और कबीर कला मंच के साथियों के संपर्क में आई. शुरू-शुरू में मेरा कोई वैचारिक रूझान नहीं था. मैं सिर्फ़ संगीत की दुनिया में कुछ करना चाहती थी. सचिन और मंच के साथियों ने मेरे व्यक्तित्व के विकास में बहुत योगदान दिया."

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गुजरात में दलित आंदोलन के प्रतीक जिग्नेश मेवानी के साथ शीतल.

अनुवादक कपिल स्वामी का मानना है कि "उनके गाने हज़ारों सुइयों की तरह चुभते हैं. वे सामंतवादी, ब्राह्मणवादी और पूंजीवादी सत्ता के लिए सहज चुनौती बन जाते हैं. उनके गाने हथियार भी है और वार भी हैं."

समाजशास्त्री प्रो विवेक कुमार शीतल और उभरते अन्य बहुजन युवाओं की लगन और मेहनत की तारीफ तो करते हैं लेकिन वह इन्हें कोई आइकन नहीं मानते हैं.

विवेक कुमार के अनुसार, "अभी इन लोगों ने समाज का आइकन कहलाने के लिए जरूरी बहुत से इम्तिहान पास नहीं किए हैं."

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