गुजरात में दलितों के उभरते नेता मेवाणी

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गुजरात में 'दलितों के नेता' के तौर पर उभरे जिग्नेश मेवानी अपने फेसबुक प्रोफाइल पर कभी ख़ुद को 'कबाली' बताते हैं तो कभी अंबेडकर और भगत सिंह के रास्ते पर चलने वाला कार्यकर्ता.

जिग्नेश मेवाणी के नाम के साथ पिछले कुछ चंद महीनों काफी किस्से, तमगे और गिरफ्तारियां दर्ज हो चुकी हो चुकी हैं. पिछले कुछ महीनों में वह कम से कम चार बार गिरफ्तार हो चुके हैं.

सोशल मीडिया में युवाओं का एक अच्छा खासा तबका उन्हें बतौर नायक देखने लगा है. वहीं गुजरात की ज़मीन पर बरसों से दलित मसलों पर काम करने वाले पुराने अंबेडकरवादियों का एक बड़ा तबका उन्हें शक की नज़र से देखता है.

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जयपुर में क्रांतिकारी नौजवान सभा के कार्यकर्ता शैलेंद्र का मानना है- "जिग्नेश को लेकर युवाओं में एक क्रेज़ साफ तौर पर दिखाई देता है. सामाजिक सरोकारों से जुड़े किसी युवा को लेकर मैं पहली बार ऐसा क्रेज़ देख रहा हूँ."

शैलेंद्र, अपना सारा कामकाज छोड़ जिग्नेश के रेल रोको आह्वान पर जयपुर से गुजरात चले गए थे. जिग्नेश को लेकर इस क्रेज़ और शक की कई वजहें हैं. पहली वजह है उनका वामपंथी रूझान और आम आदमी पार्टी के कार्यकर्ता वाला अतीत.

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'गाय की पूंछ तुम रखो और हमें हमारी ज़मीन दो' जैसा नारा देने वाले जिग्नेश पर गुजरात और गुजरात के बाहर कई लोग सवाल उठा रहे हैं.

कई लोगों को यह नारा व्यावहारिक नहीं लग रहा तो कई व्यक्तियों और समूहों के मन में जिग्नेश की राजनीतिक मंशा को लेकर काफी सवाल हैं.

इन सवालों का जवाब जिग्नेश काफी भावुक और बेहद अप्रत्याशित ढंग से देते हैं. वे गुजरात के बजाए दिल्ली में आकर आम आदमी पार्टी छोड़ने की घोषणा एकाएक कर देते हैं.

लेकिन इसके साथ ही अपने बयान में साफ भी कर देते हैं कि वे राजनीति में हिस्सेदारी के ख़िलाफ नहीं हैं. हां, अभी परिस्थितियों की मांग है कि वह सामाजिक आंदोलन को पहले मज़बूत करें.

जिग्नेश के अनुसार, "इस मुहिम में हम हर शहर, गली और गांव में जाकर बहुजन समाज के लोगों को शपथ दिला रहे हैं कि वे लोग अपने पुरानी वर्ण व्यवस्था आधारित पेशों को छोड़ें और बाबा साहेब आंबेडकर के बताए रास्ते पर चलकर अपने पांव पर खड़े हों और शिक्षित बनें."

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जिग्नेश की दस मांगों में से प्रमुख मांग है कि अपने भरण-पोषण के लिए पांच एकड़ जमीन हर दलित परिवार को दी जाए.

उत्तराखंड में मजदूर सहयोग केंद्र से जुड़े मुकुल कुमार कहते हैं, "गुजरात जैसे राज्य के लिए यह मांग इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि दूसरा गुजरात वह राज्य है, जहां किसानों से औद्योगिकीकरण के नाम पर काफी जमीन छीनी जा रही है, दिल्ली-मुंबई कारिडोर में 60 फीसदी जमीन गुजरात की जा रही है, ऐसे में जमीन की लड़ाई वहां अलग-अलग इलाकों में चल रही है."

लेकिन गुजरात दलित संगठन के अध्यक्ष डॉक्टर जयंती माकाड़िया और समाजशास्त्री विवेक कुमार जिग्नेश को दलितों का चेहरा या नेता नहीं मानते हैं.

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जयंती का तो कहना है कि "जिग्नेश, गुजरात के दलित आंदोलन में कोई नई बात नहीं कर रहे हैं. पिछले साठ वर्षों से प्रदेश के दलित ज़मीन की मांग को अपने-अपने तरीके से उठा रहे हैं. सच्चाई तो यह है कि कुछ वक्त पहले तक जिग्नेश को अहमदाबाद से बाहर ज़्यादा लोग जानते तक नहीं थे. जो उन्हें जानता भी था तो मुकुल सिन्हा के संगठन जन संघर्ष मंच की वजह से, जिसने 2002 में गुजरात में हुए दंगों के पीड़ितों के लिए लंबी लड़ाई लड़ी."

मरी हुई गाय की चमड़ी उतारने का काम छोड़ने की जो बात जिग्नेश आज कर रहे हैं, वो तो यहां बहुत पुरानी हो चुकी. केवल पांच फ़ीसदी दलित यहां मजबूरी में आजीविका के लिए यह काम करते हैं, बाकी यह काम खुद छोड़ चुके हैं.

गुजरात में दलित आंदोलन से जुड़े कई लोगों का मानना है कि उना में 11 जुलाई को चार दलित युवकों की पिटाई के बाद बुलाई गई पदयात्रा का मकसद चुनावी राजनीति है. दूसरी ओर 'आज़ादी कूच' का आवाहन करने वाले युवा जिग्नेदश मेवाणी दावा करते हैं कि यह रैली 'ग़ैर-राजनीतिक' थी.

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15 अगस्त की रैली का तात्कालिक प्रभाव दलितों पर तेज़ हुए हिंसक हमलों के रूप में सामने आ चुका है. उना के आसपास चौबीस गांव दलितों का बहिष्कार कर चुके हैं.

'उना दलित अत्याचार लड़त समिति' के संयोजक जयेश सोलंकी के अनुसार, 'गुजरात में दलित प्रताड़ना के चलते वर्षों से दलितों के बीच आक्रोश पनप रहा है. इस आक्रोश को चेतना का संगठित रूप देने में कई लोगों ने मेहनत की है. आज इस संगठित चेतना का अगर कोई प्रतिनिधित्व करता है तो वह हमारी समिति है."

इस समिति की रीढ़ निसंदेह जिग्नेश है. आज दलितों के हक के लिए लड़ने वाले कई संगठनों को एक मंच पर लाकर गुजरात की सरकार को चुनौती देने वाले आंदोलन के पीछे जिग्नेश की सोच समझ एक अहम फैक्टर है.

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दलित चेहरा बनने से पहले जिग्नेश ने अहमदाबाद के एचके आर्ट्स कालेज से अंग्रेज़ी में स्नातक की डिग्री हासिल की और इसी दौरान उनकी डाक्यूमेंट्री बनाने में काफ़ी रुचि जगी. कुछ ही दिनों में जिग्नेश ने सौराष्ट्र में किसानों की आत्महत्या पर डाक्यूमेंट्री बनाने का काम शुरू कर दिया.

पेशे से वकील जिग्नेश ने कोर्ट में याचिका दायर कर मांग उठाई कि उन दलितों को जिन्हें लैंड सीलिंग एक्ट के तहत ज़मीन आवंटित तो की गई मगर उस ज़मीन पर कभी क़ब्ज़ा नहीं मिला, उन्हें उस पर समय-सीमा में कब्ज़ा दिलाया जाए.

35 वर्षीय जिग्नेश से यह पूछा गया कि उना के पीड़ित परिवार ने उन पर जो अनदेखी और उपेक्षा के आरोप लगाए हैं उस पर उनका क्या कहना है?

इस पर जिग्नेश सिर्फ़ इतना कहते हैं कि हमने उनकी यथासंभव मदद की है और आज उन में से कुछ के संघ समर्थित कार्यक्रमों में शामिल होने की ख़बरें भी हमें मिल रही हैं.

वे कहते हैं, करीब पिछले चार या साढ़े चार सालों से मैंने देखा है कि गुजरात में विकास की बात की जा रही है, 'वाइब्रेंट गुजरात' की बात की जा रही है. चुनाव के वक्त सांप्रदायिक वातावरण बनाया जाता है. अफवाहों का बाज़ार गर्म रहता है. मरी हुई गाय को लेकर वीडियो फैलाए गए और ये कोशिश की गई कि ऐसा लगे जैसे मुसलमानों ने गाय मारी हो."

मेवानी के पिता अहमदाबाद म्यूनिसिपल कॉर्पोरेशन में क्लर्क थे जो कि अब रिटायर हो चुके हैं. जिग्नेश ने एक गुजराती मैगज़ीन और एक गुजराती अख़बार के लिए लगभग चार वर्ष तक काम भी किया. जिग्नेश ने 'लड़त समिति' के बाद अब राष्ट्रीय दलित अधिकार मंच का गठन किया है.

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