दलितों की हीन भावना को मिटाने में लगे हैं सूरजपाल

  • संजीव माथुर
  • बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए
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दलित समाज में जागरूकता बढ़ाने के मिशन में जुटे सूरजपाल राक्षस.

जातिवाद और मनुवाद के ख़िलाफ़ पश्चिमी उत्तर प्रदेश के गांव-गांव में सूरजपाल 'राक्षस' भीम ज्ञान चर्चा का आयोजन करते हैं.

इस मुहिम में उनका साथ देते हैं राखी रावण, वीरेंद्र कुंभकर्ण, रवींद्र बौद्ध अंबेडकर जैसे अनेकों युवा साथी. गौर करें कि इन सबके नाम के साथ रावण, कुंभकर्ण, बौद्ध या अंबेडकर का उपनाम लगा हुआ है.

सूरजपाल का जीवन अनेक उतार-चढ़ावों से गुजरा है. बुलंदशहर में जन्मे सूरजपाल की शादी 1998 में दसवीं पास करते ही घरवालों ने कर दी थी. शादी के बाद इनकी पढ़ाई बंद हो गई और इन्हें गृहस्थी चलाने के लिए कबाड़ी से लेकर कई तरह के काम करने पड़े.

सूरजपाल ने मज़दूरी और कबाड़ी का काम किया. वे बताते हैं कि उनके जीवन की दशा कैसे बदली, "मैं बोरी में भरकर शराब की बोतलें बेचने जा रहा था, मैंने ज़िंदगी में कभी शराब नहीं पी, बोतल की बची हुई शराब मेरे ऊपर गिरने लगी और मेरे पूरे शरीर से बू आने लगी, मुझे बहुत ग़ुस्सा आया, इस घटना ने मेरी ज़िंदगी की दिशा बदल दी."

सूरजपाल बताते हैं कि "पढ़ाई बंद होने के बाद जीवन दिशाहीन-सा हो गया था लेकिन मेरे अंदर पढ़ने की चाह कभी मरी नहीं और मैंने बारह वर्ष बाद 2009 में 12वीं पास की, चौधरी चरण सिंह यूनिवर्सिटी मेरठ से प्राइवेट से बीए पास किया और एलएलबी की डिग्री वर्ष 2015 में हासिल की."

अभी उनकी एमए राजनीति विज्ञान की पढ़ाई जारी है. उनकी पढ़ने की चाह को साकार करने में उनके मार्गदर्शक रमेश गौतम की बड़ी भूमिका थी. सूरजपाल कहते हैं, "वर्ष 2009 में इनसे संपर्क में आने के बाद मेरा पुर्नजन्म हुआ".

ग्रेटर नोएडा के निवासी और स्थानीय राजनीति में सक्रिय नौरतन सिंह नाम में 'राक्षस' जोड़ने की इस सोच पर कई सवाल उठाते हैं. नौरतन के अनुसार इस तरह की चर्चाओं से समाज नहीं बदलने वाला है.

नौरतन के अनुसार वह अपने इन सवालों को ज्ञान चर्चाओं की बैठकों में उठा चुके हैं लेकिन उन्हें आज तक कोई संतोषजनक जवाब नहीं मिला.

सूरजपाल के मुताबिक आज हर माह इन चर्चाओं का संचालन कई जगहों पर एक साथ हो रहा है. इसके अलावा 'भीम ज्ञान चेतना केंद्र' के जरिए युवाओं को मॉर्शल आर्ट्स और रोजगार संबंधी प्रशिक्षण भी दिया जा रहा है.

इन चर्चाओं से शुरू में जुड़े गाजियाबाद निवासी और पेशे से पत्रकार धमेंद्र आर्य इन चर्चाओं को 'कट्टरता का जवाब कट्टरता से' देना मानते हैं.

धर्मेंद्र कहते हैं, "शुरू में हमें लगता था कि इन चर्चाओं से बदलाव आएगा लेकिन आज की परिस्थितियों को देखने के बाद लगता है कि इस प्रक्रिया में कहीं कुछ कमी है. हम बौद्धिक बनने के बजाए दूसरे किस्म के भक्त बन जाते हैं."

ये पूछे जाने पर कि आप जैसे युवाओं को इस 'मिशन में सक्रिय' होने की जरूरत क्यों पड़ी जबकि पहले से ही बहुत सारे दलित नेता जैसे मायावती, प्रकाश अंबेडकर, उदितराज आदि अपने अपने ढंग से सक्रिय हैं. इस पर सूरजपाल जो जवाब देते हैं वह इस आंदोलन के भीतर उठ रहे सवालों की ओर इशारा करता है.

सूरजपाल कहते हैं, "यह पूरे देश में आज भी बहुजन युवा चाहे वह कितना भी पढ़ा लिखा हो उसके अंदर एक हीन भावना भरी होती है कि वह नीच है, दलित है. यह जो चीज़ भारत के संविधान लागू होने छह दशक के बाद भी एक समाज के अंदर भरी हुई है हम इसको खत्म करना चाहते हैं."

वे कहते हैं, "आरएसएस जैसे हिंदुवादी संगठन हमें कभी बराबारी का दर्जा नहीं देंगे. सामाजिक सांस्कृतिक क्षेत्र में सक्रिय हूँ राजनीति में नहीं."

वे मानते हैं कि सोशल मीडिया के कारण दलितों के एक हिस्से में जागृति आई है. वे कहते हैं, "इसे चेतना तो कह सकते हैं लेकिन आंदोलन नहीं कह सकते हैं; यह स्मार्टफोन संस्कृति इस नई जागृति का स्त्रोत हैं. हमारे बीच में पहले बाबा साहेब के चित्र तो पहुंचे लेकिन विचार नहीं पहुंचते थे."

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दलितों के आंदोलन से जुड़ी फ़ाइल तस्वीर

वे बचपन की एक घटना को याद करते हैं, "मैं एक भोज में गया था, मैंने देखा कि अछूतों के लिए भोजन की अलग व्यवस्था थी और सवर्णों के लिए अलग. अछूतों को जानवरों के बाड़े में बिठाकर खिलाया जा रहा था जबकि सवर्णों को साफ-सुथरी जगह बैठाकर खिलाया जा रहा था. मेरे मन में कई सवाल उठने लगे. मुझे मिठाई बेहद पसंद है लेकिन उस वक्त मुझे वो मिठाई ज़हर जैसी लग रही थी."

सूरजपाल अपने निजी और पारिवारिक जीवन के बारे में बात करने में काफी संकोच महसूस करते हैं. वे बताते हैं कि उनके दो बेटे हैं प्रियांशु और रोहित और एक बेटी है जिसका नाम प्रज्ञा रखा है. सूरजपाल की पत्नी भी उनके सामाजिक कार्यों में कदम से कदम मिलाकर साथ देती हैं.

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