शमी की पत्नी की तस्वीर पर नसीहत देने वालों से नाराज़ हैं ये

शमी

भारतीय क्रिकेट खिलाड़ी मोहम्मद शमी ने अपनी पत्नी की तस्वीर सोशल मीडिया पर डाली तो कुछ लोगों ने उनकी पत्नी के कपड़ों पर आपत्ति जतानी शुरू कर दी.

आइए जानते हैं कि इस बारे में मुसलमान महिलाएं क्या कह रही हैं?

साबिका अब्बास नक़वी - कवयित्री, सामाजिक कार्यकर्ता

अन्य लोगों को ज्ञान देने की लोगों की पुरानी आदत है, खासकर औरतों को. धार्मिक, पुरुष प्रधान समाज का नेतृत्व करने वाले लोगों को लगता है कि अपनी सोच को दूसरों, खासकर महिलाओं पर लादना उनका जन्मसिद्ध अधिकार है.

उन्हें लगता है कि औरत संस्कृति, मज़हब का संग्रह है. अगर कोई मर्द स्लीवलेस तस्वीर डालता तो वो ऐसी बातें नहीं लिखते. किसी की तस्वीर देखकर अगर आपको परेशानी होती है तो आप उसे न देखें, उसे अनफॉलो कर दें. कौन आपसे ज़ोर ज़बरदस्ती कर रहा है दूसरों की तस्वीर देखने की?

तस्वीर डालने का मोहम्मद शमी का मक़सद कुछ भी रहा हो, अगर आपको उसमें खराबी नज़र आती है तो मेरी सोच में इसका मतलब है कि आप में खराबी है.

अगर कोई उस ढांचे के खिलाफ़ जाता है तो उसके मज़हब पर सवाल उठाए जाते हैं. ये सवाल किसी मर्द की वेशभूषा पर सवाल नहीं उठाए जाते हैं.

ये आपकी मर्ज़ी है कि आप क्या पहनें. अच्छा या खराब ऐसा कुछ नहीं होता.

पूरी दुनिया में महिलाओं को लेकर मॉरल पुलिसिंग आम है.

अगर किसी लड़की के साथ यौन दुर्व्यवहार होता है तो ये कोई नहीं पूछता है कि आदमी क्या कर रहा था. सवाल यही उठाए जाते हैं कि लड़की ने क्या कपड़े पहने थे, मामला कितनी रात में हुआ, उसका आचार विचार कैसा था, वो बात कैसे कर रही थी.

आरफ़ा अनीस - दिल्ली विश्वविद्यालय में एमफ़िल छात्रा

ये समस्या सिर्फ़ मुसलमानों में नहीं, सभी धर्मों के माननेवालों में है. कुछ मंदिरों में भी महिलाओं के कपड़ों को लेकर निर्देश होते हैं. वो भी वक्त था जब पश्चिमी देशों में महिलाओं को गाऊन पहनने के लिए मजबूर किया जाता था ताकि वो ज़्यादा इधर उधर न जाएं.

ये पितृसत्ता की विरासत है. इसमें राजनीति और वर्गीकरण भी है.

इस मामले से ऐसा लगता है कि लोग महिलाओं को नियंत्रित करना चाहते हैं. अगर आप एक तरह के कपड़े पहनते हैं तो आपको उचित माना जाता है लेकिन अगर नहीं तो आपके चरित्र पर सवाल उठाए जाते हैं.

एक वक्त था जब दलित महिलाएं अपना सीना नहीं ढक सकती थीं. ये दिखाता है कि समाज किस तरह से वर्गों में बंटा था.

मैं खुद मुस्लिम बहुल इलाके में रहती हूं. मुझे सोचना पड़ता है कि मैं क्या पहन रही हूं ताकि लोग मुझे आंकना न शुरू कर दें. मैं वहां शॉर्ट्स नहीं पहनती. मुझ पर एक नैतिक दबाव होता है लेकिन ये खुद की पसंद और सहिष्णुता का मामला है.

नाज़िया अय्यूबी - जामिया विश्वविद्यालय में कानून कीछात्रा

समाज और लोगों को अपने काम से मतलब होना चाहिए. ये महिला की मर्ज़ी है कि वो किस तरह से तैयार हो, वो किस तरह से खुद को दिखाए.

समाज को अपनी सीमा पता होनी चाहिए. जो लोग इस्लाम की बात कर रहे हैं, मैं उनसे पूछना चाहूंगी कि जिस तरह से महिला के बारे लोग टिप्पणी कर रहे हैं क्या वो इस्लाम में जायज़ है?

वीडियो कैप्शन,

सोशल मीडिया पर ट्रोलिंग पर दिल्ली की नाज़िया ने खुलकर बात रखी.

जो लोग इस्लाम की बात करते हैं, वो खुद पढ़ लें कि इस बारे में इस्लाम क्या कहता है. जब मैंने मोहम्मद शमी और उनकी पत्नी के बारे में की गई टिप्पणियों को पढ़ा तो मुझे शर्म आई को वो लोग खुद को कैसे एक मुसलमान मर्द कहते हैं.

सऊदी अरब में एक संस्था ने अपना जन्म दिवस मनाया था तब मैंने उसे ढोंगी बताकर उस पर टिप्पणी की थी. इस पर एक टिप्पणी आई कि आपको ऐसा नहीं कहना चाहिए.

उस पर मैंने कहा, महिलाओं से बात करना हराम है, अपना डीपी (डिस्प्ले पिक्चर) लगाना हराम है और फ़ेसबुक भी हराम है, आप मुझसे बात कर रहे हैं, ये भी हराम है, आप टाइमलाइन छोड़ दीजिए. तुरंत उस व्यक्ति ने अपना कमेंट हटा दिया.

एक बार मैंने लिखा था, न मंदिर बनेगा न मस्जिद बनेगा, खुदा का घर वही होगा जहां गरीबों की बस्ती होगी. इस पर दोनो तरफ़ से मुझे लोगों ने कई बातें कही थी. रूढ़िवादी दोनो तरफ़ है और ये खत्म होनी चाहिए.

तल्हा रहमान - जामिया से पीएचडी (विषय: इस्लामिक स्टडीज़, कंटेंपररी फ़ेमिनिस्ट डिस्करोर्स इन इस्लाम)

जो महिला है , जो बीवी है, वो खुद अपने आप में इंसान है और वो फ़ैसला कर सकती हैं कि वो क्या पहनेंगी या नही.

वो कोई चीज़ नहीं है. कपड़े बहुत ही निजी चीज़ है. उस पर सवाल उठाना चिंताजनक है क्योंकि ये बलात्कार को बढ़ावा देता है क्योंकि ये माना जाता है कि महिलाओं के कपड़े बलात्कार को बढ़ावा देते हैं.

जिस तरह से हम महिलाओं को उनके कपड़ों से आंकते हैं वो गलत है.

इससे समाज में गलत संदेश जाता है. अगर आपको कोई कपड़ा नहीं पसंद है तो मत पहनिए.

आप किसी और को नहीं बोल सकते. ऐसी ही बातें हिजाब को लेकर की जाती हैं, कि आप हिजाब क्यों पहनती हैं, आप बुर्का क्यों पहनती हैं, आप बिकनी क्यों पहनती हैं.

ये सारी बातें औरत से अपने फ़ैसले खुद लेने के अधिकार को छीनने जैसा है. ये बहुत तकलीफ़देह है.

सुंबुल मशहदी - डेवलपमेंट कम्युनिकेंशस छात्रा, जामिया विश्वविद्यालय

इस्लाम एक प्रगतिशील धर्म की तरह आया था जिसमें महिलाओं को बहुत सारे अधिकार दिए गए. लेकिन पता नहीं लोगों ने कैसे धर्म को अपने हिसाब से ढाल लिया है.

महिलाएं चाहे जितना भी आगे बढ़ जाएं, ऐसी बातें उन्हे पीछे खींच लेती हैं. ये मोहम्मद शमी की मर्ज़ी है कि वो कौन सी तस्वीर अपने फ़ेसबुक प्रोफ़ाइल में डालें.

लोगों को इस बात से बहुत मतलब है कि उनकी पत्नी क्या कर रही हैं.

घर में ही मेरे मां-बाप बोलते हैं कि लड़कों के साथ ज़्यादा तस्वीर मत डालना. कोई ऐसे वैसे कपड़े पहन कर फ़ोटो मत डालना.

अगर फोटो से मां-बाप को समस्या नहीं है तो रिश्तेदार फ़ोन कर देते हैं. उसकी वजह से मुझे फ़ोटो फ़ेसबुक से हटानी पड़ जाती हैं. मैंने अपने फ़ेसबुक में सेंटिंग्स में बदलाव किया है ताकि तस्वीरें मैं ही देख पाऊं.

जामिया में मैंने कपड़ों को लेकर मॉरल पुलिसिंग देखी है. जब मैंने 2010 में जामिया में दाखिला लिया था, उस वक्त तो कपड़ों को लेकर बहुत कमेंट्स होते थे.

अगर किसी ने छोटे कपड़े पहने हैं यां टाइट कपड़े पहनें हैं तो कमेंट्स आ रहे हैं कि इन कपड़ों के कारण तो हमारा रोज़ा टूट जाता है.

ये ऐसी जगह का हाल है जहां लोग पढ़ने आते हैं, जहां इंटेलेक्चुएल बहस होनी चाहिए.

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