मंदिरों की कमाई घटी, मस्जिद में हाल पहले जैसा

Image caption मथुरा स्थित श्रीकृष्ण जन्मस्थान मंदिर प्रशासन के मुताबिक दिसंबर महीने में पिछले साल के मुक़ाबले चढ़ावे में 35 फ़ीसद की कमी हुई है.

धर्म और मंदिरों के शहर मथुरा का मिजाज़ बीते 50 दिनों में बदल सा गया है. हालांकि आज भी हर तरफ़ राधे-राधे की गूंज सुनाई देती है पर भजन के सुरों के बीच एक शिकायत भी सुनाई देती है. ये शिकवा है, नोटबंदी की वजह से हो रही दिक़्क़तों का.

कृष्ण भक्तों की आस्था केंद्र मथुरा-वृंदावन के मंदिरों के प्रशासन दावा कर रहे हैं कि नोटबंदी के बाद से चढ़ावे में खासी कमी आई है तो पर्यटकों पर निर्भर रहने वाले कारोबारियों का कहना है कि उनके कारोबार की 'कमर टूट गई' है.

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पुरोहितों की पीड़ा है कि ज़्यादातर यजमानों ने धार्मिक आयोजनों और शादी विवाह के कार्यक्रम तब तक के लिए टाल दिए हैं, जब तक स्थिति पूरी तरह सामान्य नहीं हो जाती.

शहर के बीचों-बीच शाही ईदगाह मस्जिद और श्रीकृष्ण जन्मस्थान मंदिर की दीवारें सटी हुई हैं.

शाही इमाम नोटबंदी के बाद की परेशानियों का ज़िक्र करते हुए सरकार पर बरस पड़ते है. कहते हैं, "बुरा न मानें. सरकार की ज़ुबान का मैं कोई एतबार नहीं करता. सरकार सुबह कुछ कहती है तो शाम को कुछ और."

श्रीकृष्ण जन्ममंदिर में पूरी दुनिया से श्रद्धालु आते हैं. मंदिर प्रशासन का दावा है कि नोटबंदी के बाद से यहां आने वाले तीर्थयात्रियों की संख्या में बड़ी कमी आई है. मंदिर का चढ़ावा भी घटा है.

Image caption श्रीकृष्ण जन्मस्थान के मुख्य अधिशाषी अधिकारी राजीव श्रीवास्तव

मंदिर के मुख्य अधिशासी अधिकारी राजीव श्रीवास्तव बताते हैं, "दिसंबर में चढ़ावा घटा है. पिछले साल के इसी महीने के मुक़ाबले लगभग 35 फ़ीसदी चढ़ावा कम हुआ है. चेक और ड्राफ़्ट से मिलने वाले चढ़ावे में कोई अंतर नहीं आया है."

हालांकि, मंदिर में अभी ई-हुंडी की कोई व्यवस्था नहीं है. राजीव श्रीवास्तव कहते हैं कि चढ़ावे में कमी से मंदिर की व्यवस्थाओं पर असर नहीं हुआ है लेकिन सेवा के नए कार्यक्रम को लागू करने का विचार कुछ वक़्त के लिए टाल दिया गया है.

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वे कहते हैं, "मंदिर संस्थान के 180 कर्मचारियों के वेतन का आधा हिस्सा बैंक खातों में भेजा जा रहा है और आधा नक़दी में देना पड़ रहा है क्योंकि उन्हें बैंकों से पैसा निकालने में दिक़्क़त आ रही है."

वहीं, शाही मस्जिद ईदगाह के इमाम मौलाना अब्दुल वाजिद कहते हैं, "मस्जिद में बाहर से कोई चढ़ावा नहीं आता. जुमे के दिन नमाज़ी चंदा देते हैं. नोटबंदी के पहले भी हर जुमे को पांच-सात सौ रुपए आते थे. वो आज भी आ रहे हैं."

Image caption मथुरा की शाही ईदगाह के इमाम अब्दुल वाजिद

इमाम वाजिद कहते हैं कि चंदा भले न घटा हो लेकिन रोज़मर्रा की ज़िंदगी की दिक़्क़तें बढ़ गई हैं.

वह कहते हैं, "मेरे तीन बच्चे हैं. हर तीसरे महीने एक बच्चे की फ़ीस 7200 रुपए जमा करनी होती है. अब यह फ़ीस देना मुश्किल है. सरकार भले ही हफ्ते में 24 हज़ार रुपए निकालने की सुविधा देने का दावा करती हो, हमें तो अब सिर्फ़ दो हज़ार ही मिलता रहा है."

Image caption मथुरा स्थित द्वारिकाधीश मंदिर

मथुरा के प्रसिद्ध श्री द्वारिकाधीश मंदिर के अधिकारी भी नोटबंदी के बाद मंदिर में चढ़ावा कम होने की जानकारी देते हैं.

मंदिर के अधिकारी श्रीधर चतुर्वेदी कहते हैं, "भक्तों के पास पैसा घटा है. इसका मंदिर पर भी असर पड़ा है. पहले औसतन छह-सात लाख रुपए मंदिर की गुल्लक में आते थे. इस बार साढ़े चार लाख रुपए निकले हैं. इनमें पुराने नोट भी शामिल हैं."

मंदिर प्रशासन ने स्वाइप मशीन के लिए आवेदन किया है, लेकिन अभी तक बैंक की ओर से मशीन नहीं मिल पाई है. हालांकि, चतुर्वेदी बताते हैं कि बीते तीन दिनों से मंदिर में बाहर से आने वाले भक्तों की संख्या बढ़ी है.

Image caption वृंदावन के ठाकुर बांके बिहारी

वहीं वृंदावन स्थित ठाकुर बांके बिहारी मंदिर के गोस्वामियों का दावा है कि नोटबंदी के बाद भी मंदिर की गुल्लक में आने वाली राशि पर ज़्यादा असर नहीं हुआ है, लेकिन उन्हें मिलने वाली दक्षिणा में काफ़ी कमी आई है.

मंदिर के सेवायत अशोक गोस्वामी ने बताया, "आम आदमी नोटबंदी से परेशान है. इससे गोस्वामियों की दक्षिणा पर क़रीब अस्सी फ़ीसदी असर हुआ है. छप्पन भोग जैसे आयोजन भी कम हो गए हैं."

आजीविका के लिए पूजा-पाठ पर निर्भर दूसरे पुरोहित भी यही दर्द बयां करते हैं. कुछ पुरोहितों का दावा है कि आज भी कई यजमान लिफ़ाफ़े में पांच सौ और एक हज़ार रुपए के पुराने नोट थमा देते हैं.

मथुरा के पुरोहित राधा बिहारी गोस्वामी कहते हैं, "फ़िलहाल ज़्यादातर यजमान सोच रहे हैं कि जब नोट होंगे तभी पूजा कराएंगे. शादी सगाई के कार्यक्रम भी टाल दिए गए हैं. चार महीने देव सो रहे थे. फिर नोटबंदी हो गई. अब कोई काम नहीं है. ये पूरी व्यवस्था ही नक़दी पर आधारित है."

मंदिरों के आसपास के दुकानदार भी परेशान हैं. स्थितियों में सुधार के सरकारी दावों को मथुरा के व्यवसायी ग़लत बताते हैं.

श्रीकृष्ण जन्मस्थान मंदिर परिसर में क़रीब 42 साल से दुकान चला रहे नंद किशोर गुसाईं कहते हैं, "फ़िलहाल बिक्री न के बराबर है. जन्मस्थान परिसर में सुरक्षा की वजह से मोबाइल और क्रेडिट-डेबिट कार्ड लाने पर पाबंदी है. ऐसे में दुकानदार कैशलेश व्यवस्था के साथ नहीं चल सकते. "

जन्मस्थान के पास कपड़ों की दुकान चलाने वाले ओमप्रकाश कहते हैं कि वह दो महीने से दुकान का किराया तक नहीं दे सके हैं और जनवरी में भी देने की स्थिति नहीं होगी. उनके मुताबिक़ व्यवसाय की कमर टूट गई है.

एक अन्य दुकानदार पुंडरीक रत्न का कहना है, "मंदिर के पास स्थानीय लोग खरीदारी के लिए नहीं आते. पर्यटकों की संख्या घटने से कारोबार में 80 फ़ीसदी की कमी आई है."

यमुना में नाव चलाकर आजीविका कमाने वाले एक नाविक ने दावा किया कि वह दो वक़्त का भोजन भी नहीं जुटा पा रहे हैं.

नाव चालक राकेश ने बताया, "नोटबंदी के पहले यहां के दो सौ नाव चलाकों में हरेक रोज़ हज़ार रुपए कमाई कर लेता था. अब दिन में सौ रुपए भी मिलना मुश्किल है. 50 दिन बाद भी समस्या का कोई समाधान नहीं हुआ है."

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दिक़्क़तें सामाजिक संस्थाओं के सामने भी हैं. मथुरा की सामाजिक संस्था 'युगांधर' के अध्यक्ष राकेश शर्मा नोटबंदी की टाइमिंग पर सवाल उठाते हैं. बोले, "शादी के सीजन में नोटबंदी होने से ग़रीब परिवारों को खासी दिक्कत हुई. हमारी संस्था ऐसे परिवारों को जितनी मदद करती थी, इस बार उतनी मदद संभव नहीं हो सकी."

शिकायत वो तीर्थयात्री भी करते हैं जो इन दिनों मथुरा-वृंदावन पहुँचे हैं. जोधपुर से मथुरा आए एक परिवार के मुखिया विजय कुमार ने कहा, "तीन महीने पहले मथुरा आने का कार्यक्रम बना था. अब दोस्तों से मदद लेकर आए हैं"

उनकी पत्नी संगीता परेशान हैं कि नक़दी न होने से वह खरीदारी नहीं कर पा रही क्योंकि हर जगह कार्ड नहीं चलता है.

विजय कुमार को शिकवा है कि एक तरफ आम लोग परेशान हैं वहीं दूसरी तरफ कई लोगों के पास करोड़ों रुपये पकड़े जा रहे हैं. वो इसे 'सिस्टम की नाकामी' बताते हैं.

लेकिन, यह मथुरा का मिजाज़ ही है कि समस्याएं गिनाने वाला यह शहर, ये पूछने पर कि इन समस्याओं के समाधान होने की उम्मीद कब तक है, जवाब मिलता है- राधे-राधे.

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