नोटबंदी: 'बैंक अनपढ़ लोगों को एटीएम कार्ड नहीं देता'

  • इमरान कुरैशी
  • बेंगलुरु से बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए
एटीएम के बाहर खड़ी कतार

इमेज स्रोत, AFP

अगर आपको लिखना पढ़ना नहीं आता तो आप किसी कैशलेस अर्थव्यवस्था का हिस्सा नहीं हो सकते. मोबाइल बैंकिंग को भूल जाइए.

बैंकिंग नियमों के मुताबिक कोई अनपढ़ एटीएम कार्ड भी नहीं ले सकता है.

सरकार के अपने ही आंकड़ें कहते हैं कि देश में साक्षरता दर 74.04 फीसदी है.

इस नोटबंदी के अभियान के दौरान 65 साल की लक्षम्मा को इस कड़वी हकीकत से वास्ता पड़ा. कुछ दिनों पहले वह 500 और 1000 के नोट जमा कराने बैंक गई. ये पैसे उसने जरूरत के वक्त के लिए बचाकर रखे थे.

लक्षम्मा ने बीबीसी को बताया, "मैंने बैंक जाकर मैनेजर से एटीएम कार्ड देने की गुजारिश भी की.

उसने बताया कि मुझे एटीएम कार्ड नहीं दिया जा सकता क्योंकि मैं चेक पर दस्तखत नहीं कर सकती और मैं केवल अंगूठा लगाती हूं."

इमेज स्रोत, Imran Qureshi

इमेज कैप्शन,

लक्ष्मम्मा बेंगलुरु में घरों का काम करती हैं.

लक्ष्मम्मा सुबह से लेकर दोपहर तक काम करती हैं. कई बार उदार दिल वाले मालिक उनकी ईमानदारी से खुश होकर कुछ बख्शीश भी दे देते हैं. पिछले कई सालों से वे ये पैसा परिवार में किसी अनहोनी की सूरत से निपटने के लिए घर में बचाकर रखती आई हैं.

लेकिन नोटबंदी के बाद उन्होंने अपने एक मालिक के घर जाकर पुराने नोट बदलने और जमा करने को लेकर मदद मांगी. तभी उन्हें पता चला कि अनपढ़ होने की वजह से वह एटीएम कार्ड नहीं रख सकतीं.

नोटबंदी के 40 दिनों के बाद ही लक्षम्मा को गुजारे के लिए लोगों से उधार लेना पड़ रहा है. इसकी एक वजह यह भी है कि जब वह अपना काम खत्म करके बैंक पहुंचती हैं, वहां लंच ब्रेक का टाइम हो जाता है.

इमेज स्रोत, Reuters

वह बताती हैं, "फिर हम कतार में खड़े हो जाते हैं और मेरी बारी आने से पहले ही बैंक का काउंटर बंद हो जाता है."

कर्नाटक के कोलार जिले के मुलबगल की रहने वालीं लक्षम्मा का कहना है, "मुझे बैंक जाने के लिए दो किलोमीटर और चलना होता है क्योंकि केवल वही एक बैंक है जहां के लोग मेरी भाषा तेलुगु समझते हैं."

इन दिनों जिस कैशलेस समाज की बात की जा रही है, भारत में साक्षरता की दर को देखते हुए उसमें लक्षम्मा जैसी महिलाओं की स्थिति जोखिम में दिखती है. सरकार के अपने ही आंकड़ें कहते हैं कि देश में साक्षरता दर 74.04 फीसदी है.

इमेज स्रोत, Imran Qureshi

इमेज कैप्शन,

लक्षम्मा की तरह सरिता भी लोगों के घरों का काम करती हैं.

इसका मतलब यह हुआ कि भारत की आबाद के 25 फीसदी तबके को आज लक्षम्मा जैसी ही दिक्कत का सामना कर रहे हैं. एक बैंक अधिकारी ने नाम न जाहिर करने की शर्त पर बताया, "नियम के मुताबिक अनपढ़ और विकलांग लोग डेबिट कार्ड के अधिकारी नहीं हैं."

देश की बैंकिंग सिस्टम के साथ निपटना अब केवल इसी 25 फीसदी आबादी की अकेले की समस्या नहीं है. यहां तक कि जो लोग किसी तरह गुजर-बसर कर रहे हैं, उनके लिए जो हो रहा है, वह अच्छा नहीं है. लक्षम्मा की तरह सरिता भी लोगों के घरों का काम करती हैं.

उन्होंने बताया, "जिन घरों में मैं काम करती हूं, उनमें से एक से मैंने 10,000 रुपये उधार लिए थे. क्योंकि मेरा बेटा बीमार था और उसे अस्पताल में दाखिल कराया गया था. मैंने चेक जमा कराया ताकि पूरी रकम मैं बैंक से नकद निकाल सकूं. मुझे बताया कि मैं केवल 7,500 रुपये ही निकाल सकती हूं."

इमेज स्रोत, Reuters

सरिता आगे बताती हैं, "लेकिन आखिर में बैंक ने मुझे केवल 5,000 रुपये दिए क्योंकि उनके पास भी नगदी नहीं थी. मुझे सचमुच नहीं पता है कि मैं अस्पताल वालों से क्या कहूंगी. मैंने किसी तरह से थोड़ी रकम और उधार ली लेकिन ऐसे तो गुजारा करना बहुत मुश्किल है."

हालांकि लक्षम्मा के विपरीत सरिता को एटीएम कार्ड देने का वादा किया गया है क्योंकि वह पढ़-लिख सकती हैं और चेक पर दस्तखत भी कर सकती हैं. वह कहती हैं, "लेकिन मैं जब भी पूछती हूं, मुझसे कहा जाता है कि दो-तीन हफ्ते और इंतज़ार कीजिए.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)