यूपी का सियासी चक्रव्यूह कैसे भेदेगी कांग्रेस?

  • मधुकर उपाध्याय
  • वरिष्ठ पत्रकार

उत्तर प्रदेश के आसन्न विधानसभा चुनावों के लिए कांग्रेस पार्टी ने एक नारा गढ़ा है- 'सत्ताइस साल, उत्तर प्रदेश बेहाल.'

यह सही है कि पिछले पौने तीन दशक में पहली बार इस नारे के साथ कांग्रेस ने अंदरूनी इलाक़ों तक की दीवारों पर अपनी उपस्थिति दर्ज कराई है लेकिन इसमें 'उत्साह' की जगह 'बेचारगी' का भाव अधिक है.

राज्य में कांग्रेस की सही स्थिति संभवतः यही है. मुश्किल यह है कि कांग्रेस का उत्साह अवध के मुहावरे में 'पतली गली से' निकल लिया है और 'बेचारा' शब्द मुख्यमंत्री पर बेहतर चिपक गया है.

कांग्रेस का यह हाल केवल उत्तर प्रदेश तक सीमित नहीं है, राष्ट्रीय स्तर पर उसकी स्थिति इससे भिन्न नहीं है. वह राजनीतिक चक्रव्यूह के मुहाने पर खड़ी दिखाई देती है, जिसका कोई योद्धा न द्रोण है, न अर्जुन; न सुभद्रा, न अभिमन्यु.

चक्रव्यूह का सातवां सबसे कठिन दरवाज़ा तो दूर, वह पहले छह दरवाज़े भेदने में असमर्थ नज़र आती है. इस लिहाज़ से कांग्रेस की 2017 की पहली छह चुनौतियां पिछले वर्षों से इतर नहीं हैं.

गांव-गांव तक खड़ी अपनी अनगिनत सेनाओं पर गर्व करने वाली पार्टी दरअसल अपने सवा सौ साल से अधिक के इतिहास में ऐसी स्थिति में कभी नहीं थी.

उसकी समस्या संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) के दूसरे कार्यकाल से लगातार बनी हुई है बल्कि सुधार की संभावना निरंतर कम होती गई है.

सत्ता इस चक्रव्यूह के सातवें दरवाज़े के पार है, लेकिन कांग्रेस को उससे पहले छह भारी-भरकम दरवाज़े पार करने हैं. इनमें से एक भी फ़िलहाल टूटने के कगार पर नहीं है.

उसका अभिमन्यु बार-बार 'बांके की तरह' आस्तीनें चढ़ाकर मुहाने से लौट जाता है. इस मुहाने का नाम 'आत्मविश्वास' है जो इस क़दर लस्त-पस्त है कि जाग नहीं पाता.

पहला दरवाज़ा 'विश्वसनीयता': यह दरवाज़ा बेहद कठिन है. आत्मविश्वास हो तो दूसरों का आप पर विश्वास बने. कांग्रेस यह भरोसा बना पाने में नाकाम रही है. वह घोषित झूठ के ख़िलाफ़ भी सच की तरह खड़ी नज़र नहीं आती.

उसे समझना होगा कि सिर्फ़ ज़ुबानी जमा-ख़र्च से 'भूकंप' नहीं आता. मजबूरन उसकी सेनाएं 'आशंका' में 'संभावना' देखने लगती हैं.

दूसरा दरवाज़ा 'पक्षधरता': नियमगिरि से बुंदेलखंड और भट्टा पारसौल तक कांग्रेस ने पक्षधरता कम, उसका प्रदर्शन अधिक किया. इसे सतही प्रयास माना जा सकता है.

कांग्रेस को समझना होगा कि सकारात्मक पक्षपात पक्षधरता का ही दूसरा नाम है और उसे एक क़दम आगे बढ़ाना होगा. यह तभी संभव है जब वह विश्वसनीयता का दरवाज़ा पार करे.

तीसरा दरवाज़ा 'नेतृत्व': नेतृत्व की दृढ़ता कांग्रेस का सबल आधार रही है. विश्वसनीयता और पक्षधरता से उसकी 'गूंगी गुड़िया' 'दुर्गा' बन गई और 'बाबा लोग' संचार क्रांति के प्रणेता बने.

समस्या यह है कि उसका नेतृत्व पिछले दस साल में 'थोपा हुआ' लग रहा है. यह चर्चा गांवों तक में है कि 'भैया' की जगह 'बहिनी' होतीं तो बात बन जाती.

चौथा दरवाज़ा 'ढांचा': कांग्रेस लंबे अरसे तक 'संघीय' ढांचे वाली पार्टी रही लेकिन पिछली सदी के अंतिम वर्षों में उसने 'केंद्रीयता' का लबादा ओढ़ लिया. स्थानीय नेतृत्व बेमानी हो गया.

राष्ट्रीय स्तर पर यह लबादा खिसककर भारतीय जनता पार्टी के पास चला गया है. राज्य स्तरीय दलों का भी यही हाल है. संघीय व्यवस्था की आवश्यकता और ताक़त समझकर उस ओर लौट जाना पार्टी के लिए बड़ी चुनौती है.

वैसे, ऐसा क़दम उठाना कभी आसान नहीं रहा, अब भी नहीं होगा. पांचवां दरवाज़ा 'छवि': विज्ञापन की दुनिया का क्रूर सच है कि 'जो दिखता है वह बिकता है.' कांग्रेस की छवि में, विज्ञापन की शब्दावली में, 'रिकॉल वैल्यू' लगातार कम हुई है.

छवियां गढ़ी जाती हैं और स्मृतियां उनकी ग़ुलाम होती हैं. यह सही है कि पुरानी छवि का सच धीरे-धीरे पुराना पड़ता है और काम नहीं आता. स्मृतियों को हमेशा नई छवियों की दरकार होती है.

उन्हें बार-बार दोहराया जाना अनिवार्य होता है ताकि 'आलू की फ़ैक्ट्री' के साथ 'टिंबर का पेड़' याद रहे.

छठा दरवाज़ा 'मीडिया': चक्रव्यूह का यह दरवाज़ा बहुत पहले कांग्रेस की पहुंच से बाहर हो गया था.

ऐसा आज़ादी की लड़ाई के समय था पर आज़ादी के बाद कांग्रेस के सामने यह स्थिति सबसे प्रचंड रूप में दरपेश है. लगता है जैसे छवि का खेल कांग्रेस हार गई है. इस पुरानी सोच से उसका कुछ भला नहीं होना है कि मीडिया 'सत्ता की चेरी' है.

सत्ता बदलने पर वह एक बार फिर उसकी हामी हो जाएगी. यह चुनौती बड़ी है और समाधान दीर्घकालीन नीति से ही हो सकता है.

इन दरवाजों के साथ एक क्षेपक आभासी या मायावी मीडिया का है जिसे नज़रअंदाज़ करना कांग्रेस को भारी पड़ा है. मायावी मीडिया के इस दौर में दूसरे ख़ेमे की जितनी अक्षौहिणी सेनाएं मैदान-ए-जंग में हैं, कांग्रेस के पैदल सैनिक उनका किसी सूरत में मुक़ाबला नहीं कर सकते.

इस चुनौती में उसे याद रखना होगा—"सब माया है, इंशाजी! यह सब माया है."

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