मिलिए समाजवादी पार्टी के 'चाणक्य' से

  • 16 जनवरी 2017
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दिसंबर, 2016 की एक दोपहर समाजवादी पार्टी के दो बड़े नेता रामगोपाल यादव और नरेश अग्रवाल भोजन कर रहे थे. रामगोपाल यादव ने एकाएक कहा, "नेताजी ने तो मुझे फ़ुटबॉल बना कर रख दिया है. आज पार्टी में, कल बाहर."

पिछले दो महीनों में सपा के वरिष्ठ नेताओं में से एक और मुलायम सिंह यादव के चचेरे भाई रामगोपाल को दो-तीन दफ़ा पार्टी से निष्कासित किया गया है.

नाश्ते में दलिया और फल, दोपहर में धुली मूंग की दाल और तीन बार बिना चीनी की चाय. इस दिनचर्या पर ज़ोर देते हुए क़रीबी उन्हें 'सादगी भरा' बताते हैं.

लेकिन रामगोपाल की छवि एक 'कड़क' पार्टी नेता की रही है और उनके इर्द-गिर्द रहने वालों ने उन्हें भावुक होते यदा-कदा ही देखा है.

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एक क़रीबी के अनुसार, "2010 में जब उनकी पत्नी फूलन देवी का लंबी बीमारी के बाद दिल्ली के एम्स अस्पताल में देहांत हुआ तब उन्हें फूट-फूट कर रोते देखा गया था. इसके बाद कई आरोपों के कारण पार्टी से जब उन्हें पहली बार निष्कासित किया गया तो एक दिन अपने दिल्ली आवास में बैठकर उन्हें नम आँखों में देखा."

पार्टी के भीतर रामगोपाल यादव की छवि संभवतः 'कड़क' इसलिए भी मानी जाती है क्योंकि उन्होंने पिछले दो दशकों से ज़्यादा समय में भी राजनीति में कभी किस मंत्रिपद के लिए हामी नहीं भरी लेकिन पार्टी के अंदरूनी काम-काज में बड़ी भूमिका हमेशा निभाई है.

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बरसों पहले एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा था, "मैं राजनीति में नहीं आना चाहता था. मैं पेशे से प्राध्यापक था. एक दिन मुलायम सिंह जीप में आए और बोले कोई भी उम्मीदवार नहीं मिल रहा है तो तुम बसरेहर, इटावा से ब्लॉक प्रमुख चुनाव के लिए नामांकन कर आओ. उसे जीतने के बाद फिर ज़िला पंचायत अध्यक्ष का चुनाव हुआ और तब तक मैं सक्रिय राजनीति में पहुँच चुका था."

जानकारों का कहना है कि रामगोपाल यादव आज तक मुलायम सिंह यादव के शुक्रगुज़ार हैं.

इसकी दूसरी वजह शायद ये है कि मुलायम सिंह ने पार्टी के संविधान से लेकर चुनावी ताल-मेल बनाने तक में रामगोपाल से हमेशा मदद ली है.

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लखनऊ में एक वरिष्ठ पत्रकार को मुलायम सिंह ने कुछ वर्षों पहले बताया था, "संसद में छोटी से लेकर बड़ी से बड़ी बहस पर बोलने से पहले मैं प्रोफ़ेसर रामगोपाल से मशवरा ज़रूर करता हूँ."

मुलायम सिंह के परिवार से जुड़े कुछ लोग बताते हैं, "नेताजी ने रामगोपाल यादव की अनुपस्थिति में भी हमेशा उन्हें 'प्रोफ़ेसर साहब' कर संबोधित किया है और खुद कह चुके हैं कि हमारे यहां आगरा विश्विद्यालय तक पढ़ के लौटने वाले रामगोपाल ही सबसे पढ़े लिखे थे."

समाजवादी पार्टी के भीतर रामगोपाल की 'कड़क' छवि के पीछे एक तीसरा पहलू है समय की पाबंदी.

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सुबह चार बजे उठ कर पहले वे अपने पास आने वाले 'प्रार्थना पत्र' या 'सिफ़ारिशी चिट्ठियाँ' निबटाते हैं.

एक पत्रकार ने उनसे पिछले तीन वर्षों में चार बार मिलने का समय माँगा और 'हमेशा सुबह साढ़े-पांच से लेकर सात बजे के बीच का ही समय मिला.'

रामगोपाल तब ख़ासे नाराज़ हो उठते हैं जब उनके पास सिफ़ारिश करवाने की मंशा से लोग पूरी फ़ाइल भेज देते हैं. उनका मानना है कि 'जो 30 सेकंड में अपनी बात दूसरे को समझा न सके तब दिक्कत है.'

उत्तर प्रदेश के एक वरिष्ठ सरकारी अफ़सर रामगोपाल यादव से मिलने पहुंचे तो प्रोफ़ेसर यादव ने पूछा, 'कोई ख़ास बात करनी है क्या?"

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अफ़सर ने संकोच में पहले मना कर दिया फिर 15 मिनट बाद धीरे से बोले, "आपसे अकेले में कुछ बात करनी थी."

रामगोपाल का जवाब मिला, "अब नंबर दूसरे का है. मैंने पहले ही पूछा था आपने मना कर दिया. कल फिर आइए बात करते हैं."

वर्ष 2017 के पहले दिन पार्टी कार्यकर्ताओं की अपील पर समाजवादी पार्टी के 'आपात अधिवेशन' में भी रामगोपाल मात्र बीस मिनट बोले.

मुलायम की जगह अखिलेश को राष्ट्रीय अध्यक्ष समेत प्रदेश अध्यक्ष और मुलायम के सगे भाई शिवपाल को 'हटाने' तक के प्रस्ताव, इतनी सी देर में उन्होंने पारित भी करवा लिए.

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हालांकि डेढ़ घंटे के भीतर ही मुलायम ने नई चिट्ठी जारी कर अखिलेश यादव को राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाने वाले अधिवेशन को असंवैधानिक करार दिया और 5 जनवरी को पार्टी का नया अधिवेशन बुलाया है.

बहरहाल जानकारों को ये भी लगता है कि अपनी 'दो-टूक बात' करने के चलते रामगोपाल यादव के पार्टी में दुश्मन भी कम नहीं हैं.

रामगोपाल यादव के भाषणों पर किताब लिख चुके पत्रकार राधे कृष्ण ने बताया, "सपा में बेनी प्रसाद वर्मा, अमर सिंह, आज़म खान वगैरह के दौर आते-जाते रहे लेकिन रामगोपाल का कद अपनी जगह बना रहा. कई लोगों को ये थोड़ा अटपटा भी लगता है."

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'नाटक कर रही है समाजवादी पार्टी'

लोगों को इस बात से भी हैरानी है कि रामगोपाल यादव ने खुल कर मुलायम के बेटे और प्रदेश मुख्यमंत्री अखिलेश यादव का साथ दिया है जिसमें कई मौके ऐसे आए जिसमें 'नेताजी से भी नाइत्तेफ़ाक़ी रही.'

मुलायम के एक क़रीबी के मुताबिक, "2012 विधान सभा चुनावों में जब सपा को उम्मीद से ज़्यादा सीटें मिलीं तब रामगोपाल ने पार्टी के नेताओं की बैठक में खड़े होकर कहा कि इसका श्रेय अखिलेश को है और उन्हें ही मुख्यमंत्री बनना चाहिए. दबे स्वर के विरोध के बावजूद, सभी को इसे मानना ही पड़ा."

अखिलेश यादव को राजनीति में लाने में सपा के दो बड़े नेताओं की अहम भूमिका रही है जिसमें स्वर्गीय जनेश्वर मिश्र के अलावा रामगोपाल यादव का भी योगदान है.

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सुनिए - मुलायम कुनबे का संघर्ष

वर्षों पहले ऑस्ट्रेलिया से इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर भारत लौटे अखिलेश यादव "ऑटोमोबाइल का बिज़नेस करना चाहते थे."

अखिलेश ने एक इंटरव्यू में इस बात को दोहराया भी कि प्रोफ़ेसर रामगोपाल ने उनसे सक्रिय राजनीति और समाजवादी पार्टी से जुड़ने के लिए बात की.

शायद यही लगाव है कि अक्तूबर, 2016 में जब रामगोपाल को सपा से निष्कासित कर दिया गया तब भी अखिलेश दिवाली के मौके पर उनसे मिलने पैतृक गाँव सैफ़ई तक गए.

वैसे सच ये भी है कि रामगोपाल यादव के पुत्र अक्षय यादव भी सक्रिय राजनीति में आ चुके हैं और फ़िरोज़ाबाद से लोक सभा सांसद भी हैं.

पार्टी के वरिष्ठ लोग बताते हैं कि फ़िरोज़ाबाद लोक सभा चुनाव में अखिलेश की पत्नी डिंपल यादव के चुनाव हारने के बाद से मुलायम और रामगोपाल को बड़ा झटका लगा था. तब से रामगोपाल ने ठान लिया था कि सीट सपा को जितानी ही है. अक्षय की उम्म्मीदवारी इसी का नतीजा थी.

रामगोपाल को कवर कर चुके पत्रकार दिनेश शाक्य के अनुसार, "पार्टी और खुद यादव परिवार के ज़्यादातर युवा आज अखिलेश के साथ इसलिए भी हैं भी क्योंकि प्रोफ़ेसर उनके साथ हैं. क्योंकि इस पार्टी के चाणक्य वहीं हैं."

वैसे पार्टी के क़रीबी इस बात से भी इनकार नहीं करते कि अखिलेश अपने बचपन में चाचा शिवपाल के ज़्यादा करीब रहे.

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सीएम आवास के बाहर अखिलेश समर्थकों का शोर

शिवपाल यादव ने सार्वजनिक तौर पर कहा है कि अखिलेश को उन्होंने कंधे पर बिठाकर खिलाया है.

लेकिन वो तब की बात थी. आज हालात ये हैं कि अखिलेश अपने सगे चाचा से ज़्यादा चचेरे चाचा रामगोपाल के करीब हैं.

शायद रामगोपाल यादव ने भी नहीं सोचा होगा कि टूट के कगार पर पहुंची पार्टी में नेतृत्व की लड़ाई ये रंग दिखाएगी.

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