क्या नरेंद्र मोदी की नज़र नए वोट बैंक पर है?

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नोटबंदी का एक बड़ा असर व्यापारी, शहरी नागरिक और मध्यम वर्ग पर हुआ - वो वर्ग जो आमतौर पर भारतीय जनता पार्टी का आधार माना जाता रहा है.

लेकिन क्या प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को इनकी परवाह नहीं है. क्या वे नया आधार तलाश रहे?

वरिष्ठ पत्रकार शिवकांत शर्मा और अरविंद मोहन की इस पर राय पढ़िए:

नए साल की पूर्व संध्या पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जो ऐलान किया, वो भारतीय जनता पाटी की रणनीति में एक बड़े बदलाव का संकेत है.

मोदी ने नए साल की पूर्व संध्या पर देश को संबोधन में किसानों, बुज़ुर्गों, गर्भवती महिलाओं, ग़रीबों, लघु और मंझोले उद्योगों के लिए कई तरह की छूटों का ऐलान किया.

इस ऐलान के बाद ऐसा लगता है कि कहीं मोदी अपना वोट बैंक तो नहीं बदल रहे हैं?.

व्यापारी वर्ग, संघ के समय से लेकर आज तक भाजपा के साथ रहा है.

ऐसा लग रहा है मानो प्रधानमंत्री उन सबको नाराज़ करके ग़रीब, गांववालों और शहरी ग़रीबों पर फ़ोकस करने की कोशिश कर रहे हैं.

अब तक यह माना जाता रहा है कि ये लोग कांग्रेस के वोटर हैं.

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नरेंद्र मोदी की रणनीति में यह एक बड़ा बदलाव है. अब यह देखना है कि इसको मज़बूती देने के लिए मोदी कोई राजनीतिक क़दम भी उठाएंगे.

साथ ही, क्या संघ या भाजपा भी इस नज़रिए को आगे बढ़ाएगी?

अब तक संघ या भाजपा ने समाज के इस बड़े तबक़े को प्रभावित करने की कोशिश नहीं की थी.

अब अगर यह बदलाव हो रहा है तो क्या इसे राजनीति में भी उतारा जाएगा?. अगर ऐसा हुआ तो राजनीतिक रूप से भाजपा के लिए यह एक बड़ी उपलब्धि होगी.

पिछले चुनाव में उत्तर प्रदेश में समाज के सारे तबक़ों ने नरेंद्र मोदी को वोट दिया. उत्तर प्रदेश में, यदि मायावती को छोड़ दिया जाए तो सबसे ज्यादा दलित वोट भाजपा को ही मिले थे.

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यह बहुत बड़ा आंकड़ा है. यदि भाजपा को दलितों, पिछड़ों, गांव के लोगों का वोट मिलने लगे तो यह पार्टी के लिए फ़ायदेमंद साबित होगा.

अब तक जो राजनीति लोगों की जाति, क्षेत्रीयता के आधार पर चल रही थी, उसे यहां से निकालकर ईमानदार-ग़ैर ईमानदार, ज़िम्मेदार- ग़ैर ज़िम्मेदार, विकास-पिछड़ापन के बहस में लाने में प्रधानमंत्री काफ़ी हद तक कामयाब हुए हैं.

(वरिष्ठ पत्रकार शिवकांत शर्मा और अरविंद मोहन से बीबीसी संवाददाता इक़बाल अहमद की बातचीत पर आधारित)

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