नज़रिया- क्या कश्मीर में सरकार पुरानी गलतियों से सबक लेगी?

  • उर्मिलेश
  • वरिष्ठ पत्रकार
जम्मू और कश्मीर

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अगर 2016 में कश्मीर के घटनाक्रमों, सरकार की स्थिति और कार्रवाई पर नजर डालें तो यह बात आईने की तरह साफ है कि पूरे साल भर सरहदी सूबे में किसी तरह की कारगर राजनीतिक पहल ही नहीं हुई.

ऐसा लगता रहा, मानो सरकार ने पेलेट-गनों की बौछार, उग्र कश्मीरी युवाओं की पत्थरबाजियों, और कर्फ्यू के बीच फंसे कश्मीर को उसके भाग्य पर छोड़ दिया है!

इस मायने में एनडीए-2 की नरेंद्र मोदी सरकार अपनी पूर्ववर्ती एनडीए-1 और यूपीए, दोनों सरकारों से अलग दिखी.

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भारत प्रशासित कश्मीर में चरमपंथी बुरहान वानी की पुलिस मुठभेड़ में मौत के बाद लगातार क़र्फ्यू

एनडीए-1 की वाजपेयी सरकार ने विपरीत परिस्थितियों के बावजूद कश्मीर में कई बार महत्वपूर्ण राजनीतिक पहलकदमी ली. यहां तक कि कश्मीरी अलगाववादियों से भी कई दौर की बातचीत की.

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यूपीए सरकार का कार्यकाल भ्रष्टाचार के कुछ मामलों को लेकर चाहे जितना विवादास्पद हुआ हो, सच ये है कि कश्मीर मामले में सरकार को बड़ी कामयाबी मिली.

सन् 90-92 के बाद सरहदी सूबे में इतने अच्छे हालात कभी नहीं रहे. आतंकी घटनाओं में कमी आई थी. नागरिकों एवं सुरक्षा बलों पर हमले में भारी कमी दर्ज हुई थी. घाटी के हालात में बेहतर बदलाव को सबने महसूस किया था.

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होटलों, झीलों के हाउसबोट, शिकारे और बाजार में रौनक लौटी. उतार-चढ़ाव के बावजूद भारत-पाक रिश्तों में अपेक्षाकृत सुधार दिखा. लेकिन सन् 2014 में नई सरकार आने के बाद कश्मीर के हालात क्रमशः बिगड़ते लगे.

8 जुलाई को हिजबुल के कथित कमांडर बुरहान बानी के सुरक्षा बलों द्वारा मारे जाने के बाद घाटी में अचानक जनाक्रोश फूट पड़ा, जो सर्दियां बढ़ने तक जारी रहा. अभी वहां जो अपेक्षाकृत शांति और खामोशी दिख रही है, वह किसी ठोस राजनीतिक कोशिश का नतीजा न होकर परिस्थितिजन्य है.

फिलहाल, सुरक्षा बलों की 'पेलेट गनें' बैरकों में जमा हो गई हैं और नाराज युवाओं ने पत्थरबाजी भी बंद कर दी है. पर घाटी के मसले अपनी जगह कायम हैं. ये मसले बुनियादी तौर पर राजनीतिक हैं.

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भारत जैसे देश में कानून व्यवस्था और विकास का सवाल हर जगह, हर वक्त प्रासंगिक है. पर कश्मीर में अशांति, आतंक, उग्रवाद और अलगाववाद के पीछे असल मसला राजनीतिक है, कानून व्यवस्था और विकास नहीं.

मौजूदा सरकार शुरू से ही कश्मीर मसले को कानून व्यवस्था का मसला समझने की भूल कर रही है. इसकी एक बड़ी वजह है कि इसके ज्यादातर कश्मीर-रणनीतिकार या तो खुफिया एजेंसियों के रिटायर उच्चाधिकारी हैं या आरएसएस जैसे संगठनों के कार्यकर्ता.

पर यह समझ अनैतिहासिक, बेमानी और बेमतलब है. लगता है, हमारी सरकार अतीत के अनुभवों से कुछ भी सबक नहीं लेना चाहती.

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निकट अतीत में कश्मीर मसले का जब-जब गंभीरता से अध्ययन किया गया, हमेशा एक ही नतीजा सामने आया कि यह मसला बुनियादी तौर पर राजनीतिक है और इसका समाधान भी राजनीतिक तरीके से ही संभव होगा.

यूपीए-1 के दौर में बने पांच विशेष कार्यसमूह हों या बाद की तीन सदस्यीय दिलीप पडगांवकर कमिटी, सबने इस बात की पुष्टि की. यहां तक कि वाजपेयी दौर के सभी प्रमुख सलाहकारों और ट्रैक-2 से जुड़े वार्ताकारों की भी यही सिफारिशें थीं.

कुछ ही महीने पहले भारतीय सेना की उत्तरी कमान के प्रमुख लेफ्टिनेंट जनरल डीएस हुड्डा ने भी कहा कि 'कश्मीर की समस्या बुनियादी तौर पर राजनीतिक है, कानून व्यवस्था की नहीं. सभी पक्षों को इसके समाधान की पहल करनी चाहिए.'

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सेना का एक शीर्ष अधिकारी इससे ज्यादा क्या कहता? कश्मीर में किसी भी सार्थक राजनीतिक प्रक्रिया और संवाद को आगे बढ़ाने के लिये भारत-पाक रिश्तों में अपेक्षाकृत सहजता जरूरी है.

हम चाहे जितनी तेज आवाज में बोलते रहें कि कश्मीर भारत का अविभाज्य अंग है पर एक बात ईमानदारी से माननी होगी कि उसी कश्मीर का एक हिस्सा पाकिस्तान के नियंत्रण में है और जो हिस्सा भारत के साथ है, वहां की आबादी का बहुत बड़ा हिस्सा अपनी स्वायत्तता के लगातार सिकुड़ने, आर्म्ड फोर्सेज स्पेशल पावर एक्ट सहित कई कानूनों की छांव में जारी कथित जुल्मो-सितम से बेहद नाखुश है.

ऐसे मुद्दों को बिजली-पानी, जनधन खाता, नोटबंदी, कैशलेस अर्थव्यवस्था या स्वच्छता अभियान जैसे कदमों से कैसे संबोधित किया जा सकता है?

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भारत प्रशासित कश्मीर के महिलाओं के संघर्ष और सफलता की कहानी

कश्मीर समस्या के समाधान का कोई भी रास्ता बंदूकों-पत्थरों-ग्रेनेडों या पेलेट गनों से होकर नहीं गुजरता. सिर्फ संवाद ही एक रास्ता है, जिसका दरवाजा परस्पर विश्वास की बहाली से खुलेगा.

क्या उसके लिये सभी पक्ष तैयार हैं? 2016 में इस सवाल का जवाब ना में मिला. यक्ष प्रश्न है-'क्या 2017 में बीते ढाई सालों की गलतियों से सरकार सबक लेगी? क्या सोच, समझ और रणनीति के स्तर पर बदलाव दिखेगा?'

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