पेरिस में झलका झारखंड के गाँवों की महिलाओं का हुनर

  • नीरज सिन्हा
  • बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए हज़ारीबाग से लौटकर
पुतली गंझू

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ठेठ गंवई, दुबली-पतली काया की पुतली गंझू को पढ़ना-लिखना नहीं आता. इन्हें देख कर कोई यकीन भी नहीं कर सकता कि मिट्टी की दीवारों पर उनका हुनर बोलता है और ये हुनर है कोहबर तथा सोहराई.

पुतली को इसका गुमान है कि 'पापा' ने इसे चमकाने में सालों का वक़्त लगाया है, मीलों की दूरियां नापी हैं. अब सभी लोग बेहद खुश हैं कि आदिवासी महिलाओं का हुनर बड़े फ़लक के साथ पेरिस में जा चमका है.

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हजारीबाग के बुलू इमाम को आदिवासी महिलाएं पापा कहकर बुलाती हैं.

पुतली अकेली नहीं. रुकमनी, बेला, रूदन, दयामंती, पार्वती समेत गांवों की बहुत सारी महिलाएं हज़ारीबाग के बुज़ुर्ग बुलू इमाम को पापा के नाम से जानती-पुकारती हैं, जो तीन दशकों से ज्यादा वक्त से इस कला को मुकाम देने की कोशिशो में जुटे हैं.

पर्यावरण कार्यकर्ता इमाम, ट्राइबल विमेन आर्टिस्ट कोऑपरेटिव के निदेशक तथा इंडियन नेशनल ट्रस्ट फ़ॉर आर्ट एंड कल्चरल हेरिटेज हज़ारीबाग चैप्टर के संयोजक भी हैं. उन्होंने वहाँ एक संग्रहालय भी बनाया है.

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हाल ही में पेरिस की एक आर्ट गैलरी में मशहूर फोटोग्राफर डैडी वॉनशावन ने हज़ारीबाग में खींची इन्हीं तस्वीरों की प्रदर्शनी लगाई थी.

बुलू इमाम बताते हैं कि इन कलाओं को कई दफ़ा देश-विदेश के छायाकारों ने कैमरे में कैद किए हैं, सुदूर गांवों की महिलाओं ने महानगरों-विदेशों में हुनर की नुमाइश भी की हैं, पर वॉनशावन ने पहली दफ़ा बिल्कुल अलग और ख़ूबसूरत अंदाज़ में इसे पेश किया है, जिस पर पूरी दुनिया की नज़रें हैं.

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वे बताने लगे कि, "गहराइयों के साथ खींची गई ये तस्वीरें त्रिआयामी आभास के साथ लंबे-चौड़े (सोलह गुना सात फीट) आकार में पेश की गई, जो लोगों को मिट्टी के घरों में मौजूदगी का अहसास कराती रहीं."

कोहबर तथा सोहराई झारखंड की जनजातीय कला है, हालांकि दूसरे समुदायों की महिलाएं भी इस हुनर की मुरीद हैं. उत्तरी छोटानागपुर ख़ासकर हज़ारीबाग के दूरदराज़ के इलाक़ों में यह परंपरा सालों पुरानी है. इन कलाओं के जरिए वंश तथा फसल वृद्धि का चित्रण होता है.

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लोक कला-संस्कृति पर पैनी नजर रखने वाले वरिष्ठ पत्रकार शंभुनाथ चौधरी बताते हैं कि झारखंड के समाज में शादी-ब्याह के मौके पर कोहबर तथा दीपावली से पहले यानी फसल कटाई पर सोहराय कला की परंपरा सदियों पुरानी है, जिसे बुलू इमाम ने एक पहचान दिलाई है.

इस हुनर के ज़रिए ग्रामीण महिलाओं में रोज़गार के अवसर बढ़ें- इसके लिए सरकारी प्रयास बेहद जरूरी हैं. इन कलाओं में पशु-पक्षी प्रेम, डोली पर जाती दुल्हन, राजा-रानी, फसलों की बुवाई कटाई समेत कई आकृतियां दीवारों पर उकेरी जाती हैं.

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दुल्हन के कमरे में कलाकृतियां बड़े आकर्षक ढंग से उकेरी जाती रही हैं. तब गांवों में इस हुनर को जानने वाली इक्के-दुक्के महिलाओं की बड़ी पूछ होती थी.

हज़ारीबाग के सुदूर जोराकाठ की रूदन देवी ने एक हादसे में अपना दाहिना हाथ गंवा दिया है. लेकिन इससे उनके हौसले कम नहीं पड़े. बाईं हाथ से उनकी कलाकारी देखते बनती है. इसी हुनर के ज़रिए मुट्ठी में चंद पैसे आने लगे हैं जिससे घर का ख़र्च निकलता है.

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वे कहती हैं कि ज़िंदगी की दुश्वारियां परेशान करती हैं तो मन को तसल्ली भी देती हैं कि इस हुनर ने उन्हें मुंबई-दिल्ली तक पहुंचाया है. वे चाहती हैं कि सरकार की तरफ़ से उन्हें नियमित तौर पर काम मिलता रहे.

बुलू इमाम के मुताबिक इस कला को हड़प्पा संस्कृति के समकालीन माना गया है. बड़कागांव की घाटियों में उन्होंने गुफाओं में पत्थरों पर भी इन आकृतियों को पाया है.

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सालों पहले इमाम ने इस कला पर पढ़ना-लिखना शुरू किया और साल 1990 में छह महिलाओं को लेकर एक संगठन बनाया फिर कपड़े, कागजों के साथ दीवारों पर उनकी मेहनत को मांजा. और अब वो वक्त आया है जब ढाई से तीन सौ महिलाएं सीधे तौर पर सरकारी-ग़ैर सरकारी स्तरों पर इस काम से जुड़ गई हैं.

वे बताने लगे कि वॉनशावन चार सालों के दौरान चार बार हजारीबाग के दौरे पर आईं. अपने संग्रहालय के पास एक कच्चे घर की दीवारों पर आकृतियां दिखाते हुए कहते हैं पेरिस की प्रदर्शनी में ये भी शामिल है.

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हमने पुतली गंझू से कुछ यादें साझा करने को कहा तो वो गंवई लहजे में कहती है, "थैलिया में रंग- रोगन और कंघिया रइख के कै दफ़ा हवाई जहाज पर उड़ले हियो" (मैंने थैली में रंग-रोगन लेकर कई दफा हवाई जहाज से यात्रा की है).

वो सोहराय के गीत भी सुनाती हैं. पुतली बताती हैं पापा ( बुलु इमाम) ने उनलोगों को देहरी से निकाला, वरना वे जंगली ही रह जातीं.

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बुलू इमाम के बेटे जस्टिन इमाम बताते हैं कि भित्ति चित्रों की कंघी से कटाई देखते बनती हैं. तब कला की बारीकियों को समझना बड़ा कठिन होता है. ग्रामीण महिलाओं तथा नई पीढ़ी की जनजातीय लड़कियों को इस कला की ओर वे प्रेरित करते रहे हैं.

वे कहते हैं कि अब वे लोग विदेशी कला के साथ इस जनजातीय कला को जोड़कर फ्यूज़न आर्ट पर काम कर रहे हैं, ताकि रोज़गार के अवसर बढ़ें और युवा पीढ़ी भी हुनर का मर्म समझ सकें.

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खराटी गांव की रूकमनी देवी इस कला में पारंगत हैं. वे फूली नहीं समाती कि मोदी जी ने इस कला की तारीफ़ की है. गौरतलब है कि हज़ारीबाग दौरे के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी यहां की दीवारों पर इन कला को देख मुरीद हुए थे.

इसके बाद अपने 'मन की बात' में चर्चा भी की थी कि किस तरीके से गांवों की आदिवासी महिलाओं ने दीवारों को सजाया-संवारा है.

रुकमनी कहती हैं, "हम ककहरा भी नहीं जानते पर हमरा नाम और मोबाइल नंबर कई शहरों की दीवारों पर उकेरी गई आकृतियों के नीचे जरूर मिल जाएगा. उन्होंने अपनी तीन बहुओं को भी इस कला में निपुण कर दिया है और वे अब इसके ज़रिए कमाने लगी हैं."

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हज़ारीबाग की रहने वाली रिसर्च एडिटर जया राय बताती हैं कि इस कला की ख़ासियत यह है कि पूरे दीवार पर एक बार में ही चित्र बनाया जाता है तथा प्राकृतिक तथा खनिज संपदाओं से प्राप्त रंगों का इस्तेमाल होता है.

ज़ाहिर है इन कलाओं को सहेजने और पेरिस तक पहुंचाने में इमाम के पूरे परिवार ने बड़े जतन किए हैं. उन्हें अफ़सोस है कि झारखंड में कला को लेकर कोई अकादमी नहीं है.

हज़ारीबाग के तत्कालीन उपायुक्त मुकेश कुमार ने इस कला के ज़रिए सरकारी भवनों की चहारदीवारियों को सजाने में खासी दिलचस्पी दिखाई थी.

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अब मोदी की सराहना के बाद झारखंड की राजधानी रांची में भी सरकार यह काम करवा रही है. इसके ज़रिए ग्रामीण महिलाओं को रोजगार के अवसर मुहैया होने लगे हैं.

भेलवारा गांव की हुनरमंद पार्वती देवी कहती हैं कि गांवों की लड़कियां इस बात पर ज़ोर देती हैं कि इस परंपरा के ज़रिए रोज़गार मिले, वरना मिट्टी-रंग घिसने से क्या फायदे.

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