मनमोहन की स्कीम पर मोदी ने लगा दी मुहर

  • दिव्या आर्य
  • संवाददाता, दिल्ली
गर्भवती औरत

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सरकारी आंकड़ों के मुताबिक भारत में हर साल क़रीब 1,36,000 औरतों की मौत, बच्चा पैदा करते व़क्त या उसके बाद के डेढ़ महीने में, उसी से जुड़ी किसी 'कॉम्प्लिकेशन' से हो जाती है.

इन्हीं की सेहत को ध्यान में रखते हुए प्रधानमंत्री मोदी ने 31 दिसंबर को राष्ट्र के नाम अपने संबोधन में गर्भवती औरतों को 6,000 रुपए की मदद दिए जाने का एलान किया.

पर मदद की ये योजना नई नहीं है और साल 2010 में मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली तत्कालीन यूपीए सरकार में 'इंदिरा गांधी मातृत्व सहयोग योजना' के नाम से शुरू की गई थी.

सिर्फ़ 53 ज़िलों से शुरू की गई इस योजना को पूरे देश में लागू करने के लिए साल 2013 में इसे 'नैश्नल फ़ूड सिक्योरिटी ऐक्ट' का हिस्सा बना दिया गया, पर सरकार बदलने के बाद भी आज तक ये काग़ज़ पर ही है.

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जानकारी ही नहीं?

सेंटर फार ईक्वेटी स्टडीज़ नाम की शोध संस्था ने साल 2014 में चार राज्यों में इस योजना के लागू किए जाने का विश्लेषण किया और पाया कि इसमें बहुत कमी है.

क़रीब 40 फ़ीसदी औरतों तक इस योजना की जानकारी पहुंची ही नहीं और जिनतक पहुंची उनमें से कई के पास अधूरी या ग़लत जानकारी थी.

रिपोर्ट के मुताबिक, "झारखंड की एक महिला को लगा कि उसे मिलनेवाली धन राशि 1500 रुपए है, तो कई थीं जिन्हें बताया गया था कि बच्चों के पैदा होने के बीच में तीन साल का फ़र्क होना ज़रूरी है."

इस योजना की जानकारी हो भी तो ये सब पर लागू नहीं है. इसका फ़ायदा लेने के लिए कुछ शर्तें रखी गईं. गर्भवती मां की उम्र 19 साल से ज़्यादा होनी चाहिए और योजना पहले दो बच्चों पर ही लागू होगी.

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योजना की शर्तें

ऐसी शर्तों पर दिए जाने वाली मदद के पीछे सरकार का मक़सद है लोगों का व्यवहार बदलना. मसलन कम बच्चे पैदा करना और 18 साल के बाद ही शादी करना.

नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे-3 के मुताबिक भारत में 58 फ़ीसदी महिलाओं की शादी 18 साल की उम्र से पहले हो जाती है.

लेकिन स्वास्थ्य क्षेत्र में काम करनेवाले लोगों के मुताबिक ये समझना भी ज़रूरी है कि इनमें से कई शर्तों को मानना औरतों के हाथ में नहीं है पर नुक़सान उन्हीं का है.

औरतों के स्वास्थ्य पर काम कर रही संस्था, 'सहयोग', में वरिष्ठ सलाहकार जशोदरा दासगुप्ता कहती हैं, "ग्रामीण और पिछड़े इलाकों में पैदा होने के कुछ ही दिनों में बच्चे की मौत के इतने मामले होते हैं कि दो बच्चे की शर्त रखना व्यावहारिक नहीं है."

वो ये भी ध्यान दिलाती हैं कि बेटे की चाह में कई बच्चे पैदा करने का चलन बदलना भी एक लंबी लड़ाई है, ऐसे में दो बच्चों की शर्त रख जल्दी से बदलाव की उम्मीद करना सही नहीं है.

बैंक खाते की ज़रूरत

योजना का लाभ औरत को ही मिले इसके लिए सरकार ने ये पैसे सीधा उसके अपने खाते में डालने का तरीका अपनाया पर ये उतना आसान भी नहीं है.

गुजरात के आदिवासी इलाक़े पंचमहल में औरतों के स्वास्थ्य पर काम कर रही संस्था 'आनंदी' की प्रदीपा दुबे के मुताबिक वहाँ औरतें बैंक खाते नहीं खुलवाती हैं.

बीबीसी से बातचीत में उन्होंने कहा, "ये इतनी पढ़ी-लिखी नहीं हैं ना ही इनको इतनी जानकारी है, फिर गर्भवती औरत को अपना खयाल ख़ुद ही रखना पड़ता है, उसमें बैंक का खाता खुलवाने की कवायद बहुत अखरती है, आंगनवाड़ी की वर्कर भी इस काम के लिए साथ नहीं जातीं."

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कितनी है मौजूदा मदद

उत्तर प्रदेश के मुज़फ़्फ़रनगर में गर्भवती महिलाओं के साथ 2008 से काम कर रहीं स्वास्थ्यकर्मी (आशा वर्कर) अंजु त्यागी के मुताबिक उन्होंने केंद्र की इस योजना के बारे में कभी नहीं सुना.

बीबीसी से बातचीत में उन्होंने कहा, "हमारे यहां तो राज्य स्तर पर एक योजना है उसके तहत अस्पताल या क्लीनिक में बच्चा पैदा होने पर मां को 1400 रुपए दिए जाते हैं."

वहीं गुजरात के पंचमहल की प्रदीपा दुबे के मुताबिक वहां ये मदद राशि 5,000 रुपए है.

राज्यों के स्तर पर चलाई जा रही समाज कल्याण से जुड़ी ये अलग-अलग योजनाएं हैं. ज़्यादा विकसित राज्यों में ज़्यादा धन राशि दी जा रही है और ग़रीब या कम विकसित में मदद भी कम है.

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आगे क्या होगा?

नेशनल फ़ैमिली हेल्थ सर्वे-3 के मुताबिक शादीशुदा औरतों में आधी से ज़्यादा के शरीर में ख़ून की कमी है. मां बननेवाली ज़्यादातर औरतों की मौत की बड़ी वजह अच्छे खान-पान की कमी ही है.

पर अंजु त्यागी के मुताबिक इन औरतों के बेहतर पोषण के लिए बनी ये सभी योजनाएं तभी कारगर हो सकती हैं जब इन्हें लागू करने में अहम् भूमिका निभानेवाली आशा वर्कर, एएनएम (बच्चे की डिलीवरी करनेवाली स्वास्थ्यकर्मी, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र और अस्पतालों की संख़्या बढ़े.

अंजु बताती हैं, "हर 1,000 की आबादी पर एक एनम होनी चाहिए पर हमारे इलाके का एक गांव है सुजरू, 70,000 की आबादी वाले इस गांव में सिर्फ़ दो एएनएम हैं, और दो प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र हैं जिनमें डिलीवरी की सुविधा तक नहीं है."

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तमिलनाडु सरकार ने महिलाओं के लिए सेलरी सहित नौ महीने के मातृत्व अवकाश की घोषणा की है.

जशोदरा दासगुप्ता के मुताबिक प्रधानमंत्री के योजना को लागू करने के इरादे के एलान से उम्मीद जगती है कि ये अब तो आख़िरकार पूरे देश में लागू हो जाएगा.

पर साथ ही कहती हैं, "प्रधानमंत्री ने अपने भाषण में इस योजना में दो और शर्तें डाल दीं, कि बच्चा अस्पताल में पैदा हो और राशि बच्चे के टीकाकरण के बाद दी जाए, इससे फिर बहुत सी औरतों के वंचित रह जाने का डर पैदा हो गया है."

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