कश्मीर में चरमपंथ की नई लहर ज्यादा खतरनाक

  • शकील अख्तर
  • बीबीसी संवाददाता, श्रीनगर
बासित रसूल डार के पोस्टर.
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बासित रसूल डार के पोस्टर

भारत प्रशासित कश्मीर में बेजबिहाड़ा के एक गांव में पिछले महीने हज़ारों लोग बासित रसूल डार के जनाज़े में शरीक हुए. बासित इंजीनियरिंग का छात्र था.

अभी ढाई महीने पहले ही उसने मिलिटेंसी ज्वाइन की थी. बासित के गांव में जगह-जगह दीवारों पर उनकी तस्वीरें प्रदर्शित की गई थीं. वे एक कम बोलने वाले और पढ़ने लिखने वाले छात्र थे.

बासित की मौत सुरक्षा बलों के साथ मुठभेड़ में पिछले साल दिसंबर में हो गई थी.

पिता गुलाम रसूल डार अपने बेटे की मौत से निढाल हैं, "मैं संकट से गुजर रहा हूँ. पता ही नहीं चला, बहुत कम बातें करता था. ऐसा कुछ नहीं लगता था कि वह ऐसा कोई कदम उठा लेगा."

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पिछले महीने हजारों लोग बासित रसूल डार के जनाज़े में शरीक हुए

बासित डार जैसे कई छात्र और किशोर लड़के पिछले कुछ समय में चरमपंथ से जुड़ गए हैं. पिछले साल लगभग डेढ़ सौ चरमपंथी घाटी में मारे गए. इनमें ज्यादातर स्थानीय नौजवान थे.

हुर्रियत कांफ्रेंस के नेता यासीन मलिक कहते हैं, "ये वे बच्चे हैं जिन्होंने 2008 और 2010 के शांतिपूर्ण आंदोलन में भाग लिया था और जिन्हें सुरक्षा बलों ने निशाना बनाया. सुरक्षा बल नई पीढ़ी को चरमपंथ की तरफ धकेल रहे हैं."

हिंसा और राजनीतिक गतिरोध के वातावरण में कश्मीरियों की नई पीढ़ी चरमपंथी की ओर आकर्षित हो रही है. मिलिटेंसी का ज़्यादा असर इस बार दक्षिण कश्मीर में है जो अपने सेब के बागानों के लिए जाना जाता है.

चरमपंथी संगठन हिजबुल मुजाहिदीन के कमांडर बुरहान वानी की मौत के बाद पुलवामा ज़िले में ज़बरदस्त प्रदर्शन हुए थे, इन प्रदर्शनों के दौरान सैकड़ों लोग घायल हुए. इनमें कई किशोर लड़के भी थे.

ऐसे एक लड़के ने बताया, "मेरे पूरे शरीर में छर्रे लगे हैं. यहाँ बहुत अत्याचार हो रहा है. हमें स्कूलों से उठा लेते हैं. अगर ऐसा ही चलता रहा तो भागना पड़ेगा." यह कहते हुए उसका चेहरा एकदम सपाट था, भावशून्य.

माता-पिता ही नहीं हुर्रियत के नेताओं को भी इस बदलते हालात पर खासी चिंता है. सैयद अली शाह गिलानी के सहयोगी और पूर्व चरमपंथी बिलाल अहमद सिद्दीकी कहते हैं, "इंडियन स्टेट को यह समझना होगा. शिकस्त के एहसास के साथ पूरी कश्मीरी कौम नहीं चल पाएगी. नई पीढ़ी का क्या होगा? वे अपने पिता की बात नहीं मानते तो हमारी क्या मानेंगे."

सुरक्षा बलों के विभिन्न अनुमानों के अनुसार सौ से अधिक नौजवान कश्मीरी इस समय नई मिलिटेंसी में सक्रिय हैं.

विश्लेषक अजहर कादरी कहते हैं, "ये लड़के सिर्फ स्थानीय नहीं हैं. ये हथियार भी अब भारतीय सुरक्षा बलों से ही छीनते हैं. यह सीमा पार नहीं जाते और यह नई टेक्नॉलॉजी से परिचित हैं. उन्हें मरने का कोई डर नहीं है. उनके अनुसार यह पाक जिहाद है. वे आत्मसमर्पण नहीं करना चाहते."

उन्होंने कहा, "इस समय जो मिलिटेंसी जमीन पर है, वह राजनीतिक छापेमारी नहीं है. वह राजनीतिक प्रतिरोध की लड़ाई नहीं लड़ रहा है. यह तेजी से एक मजहबी लड़ाई बनती जा रही है. उनके लिए यह बड़ी लंबी, गहरी और देर तक चलने वाली लड़ाई है."

भारतीय सुरक्षा बल अभी भी यही मानते हैं कि मिलिटेंसी की इस नई लहर के पीछे पाकिस्तान का ही हाथ है.

सीआरपीएफ के प्रवक्ता राजेश यादव कहते हैं, "हमारा पड़ोसी ही हर तरह की सहायता प्रदान करता रहा है, वही इन्हें भड़काता है. यहाँ कुछ लोग हैं जो पाकिस्तान के इशारे पर युवाओं को बरगलाते हैं, उनका ब्रेन वॉश करते हैं."

अजहर कादरी कहते हैं कि समय के साथ अलगाववादी संगठन हुर्रियत अपना असर खो चुकी है. नई मिलिटेंसी ने जो रोल मॉडल दिए हैं, उससे हुर्रियत का एजेंडा साइड लाइन हो चुका है."

कादरी के मुताबिक, "यह अधिक खतरनाक है, गहरा है, और देर तक कायम रहने वाला है. यह पूरी तरह से स्थानीय है. इसे रोकना बहुत मुश्किल है. अगर पाकिस्तान चाहेगा भी तो ये मिलिटेंसी बंद नहीं होगी. अगर कोई समाधान भी खोजा जाए तो यह नहीं रोका जा सकेगा."

राज्य में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर प्रतिबंध है, बातचीत के रास्ते बंद हैं और राजनीतिक प्रक्रिया ठप है. कश्मीर के युवाओं में बेबसी की भावना से बेचैनी पैदा हो रही है.

बेबसी और निराशा के माहौल में बिजबिहाड़ा के बासित जैसे कई नौजवान एक बार फिर चरमंपंथ की ओर आकर्षित हो रहे हैं. कश्मीर के सभी हलकों में यह चिंता बढ़ती जा रही है कि अतीत की तरह कश्मीरियों की नई पीढ़ी भी कहीं चरमपंथ की भेंट न चढ़ जाए.

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