तमिलनाडु की राजनीति में नए दौर की शुरुआत है?

  • इमरान कुरैशी
  • बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए
स्टालिन

तमिलनाडु में एआईएडीएमके सुप्रीमो जयराम जयललिता के निधन और बीमारी की वजह से उनके मुख्य प्रतिदंद्धी डीएमके प्रमुख करुणानिधि की अनुपस्थिति को राज्य की राजनीति में नए दौर की शुरुआत के तौर पर देखा जा रहा है.

जब ये दोनों ही नेता राजनीति में सक्रिय थे तो उन्होंने अपने-अपने राजनीतिक कार्ड खेल कर केंद्र में चाहे किसी की भी सरकार हो, राज्य के लिए अपनी मांगें मनवाईं, इसमें चाहे बाढ़ के लिए राहत हो या राज्य में हिंदी को अनिवार्य बनाने का विरोध हो.

लेकिन इन दोनों नेताओं की प्रतिद्वंद्विता में इतनी कड़वाहट थी कि उसने न केवल तमिलनाडु की राजनीति को प्रभावित किया बल्कि उसका असर ज़मीनी स्तर पर भी दिखाई दिया.

पिछले महीने जयललिता के निधन के बाद एक राजनीतिक विश्लेषक ने कहा था, ''जयललिता और करुणानिधि के बीच कट्टर प्रतिद्वंदिता ने ही इन दोनों को राज्य की राजनीति में प्रासंगिक बनाए रखा.''

अब जयललिता के जाने के बाद नेतृत्व की ज़िम्मेदारी एआईडीएमके में मुख्यमंत्री ओ पनीरसेल्वम और शशिकला के कंधों पर है तो करुणानिधि के बीमार पड़ने के बाद डीएमके में कमान एमके स्टालिन के हाथों में है.

हालांकि दोनों नेताओं के अस्पताल पहुंचने के बाद तमिलनाडु की राजनीति में एक बदलाव दिखा जिसे विश्लेषक अच्छी शुरुआत मानते हैं.

जयललिता के अपोलो में भर्ती होने के बाद स्टालिन ने अस्पताल जाकर उनकी ख़ैरख़बर ली थी. इसके बाद एआईएडीएमके नेता थंबीदुरई और राज्य के मत्स्यपालन मंत्री जयकुमार भी पिछले महीने करुणानिधि को देखने अस्पताल पहुंचे.

एक वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक मुरारी कहते हैं, ''अब ये साफ़ है कि किसी व्यक्ति या नेता के इर्द गिर्द बुनी हुई राजनीति नहीं होगी. अब ये काम के आधार पर होगी.''

अगर अपने सर्वोच्च नेता के बाद पार्टी में नेतृत्व की बात करें तो डीएमके अच्छी स्थिति में है क्योंकि करुणानिधि ये सुनिश्चित कर चुके थे कि स्टालिन के हाथ में ही पार्टी की बागडोर होगी.

स्टालिन ने ही साल 2014 में हुए संसदीय चुनाव और साल 2016 में हुए विधानसभा चुनाव में पार्टी का नेतृत्व किया था.

हालांकि इसके विपरीत एआईएडीएमके की नेता जयललिता ने अपने उत्तराधिकारी की घोषणा नहीं की थी.

ऑब्ज़र्वर रिसर्च फ़ाउंडेशन के एन सत्यामूर्ति कहते हैं, ''वास्तव में एआईएडीएमके के समक्ष चुनौती स्टालिन को टक्कर देने वाले नेता को तलाशने की है.''

चेन्नई में डेक्कन क्रॉनिकल के रेसिडेंट एडिटर भगवान सिंह का कहना है, ''डीएमके एक संगठित पार्टी है और स्टालिन की पार्टी संगठन पर मज़बूत पकड़ है. कई चुनावों में करुणानिधि की हार के बावजूद पार्टी काडर ने कभी उनका साथ नहीं छोड़ा. ये सच है कि एआईएडीएमके के पास 1.5 करोड़ काडर है लेकिन जयललिता नहीं है. मुझे अब उनकी निष्ठा पर शक है.''

मुरारी का कहना था, ''देखा जाए तो पनीरसेल्वम आम सहमति की नीति अपनाएंगे लेकिन अभी ये स्पष्ट नहीं है कि शशिकला भविष्य में क्या करेंगी.''

सत्यामूर्ति कहते हैं, ''दरअसल एआईएडीएमके बदलाव से गुज़र रही है. पार्टी को एक ऐसा नेता तलाशने में समय लगेगा जो उन्हें चुनाव जीतवा सके. फिलहाल उनके पास ऐसा कोई नेता नहीं है जिसकी चुनाव जीतने की क्षमता को टेस्ट किया गया है.''

इसलिए अब सभी का ध्यान एआईएडीएमके पर है कि कैसे 'एक महिला की पार्टी' किसी क्षेत्रीय पार्टी की तरह काम शुरू कर पाती है. वहीं एक और बात पर ध्यान देना होगा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस स्थिति में क्या करते हैं.

भगवान सिंह मानना है, ''क्योंकि राज्य फंड के लिए केंद्र पर निर्भर है तो हो सकता है कि बीजेपी भी पर्दे के पीछे से दखलंदाजी करे.''

जहां शशिकला एआईएडीएमके की महासचिव बन गई है वहीं स्टालिन का डीएमके पार्टी का कार्यकारी अध्यक्ष बनना इस बात का संकेत देता है कि ये तमिलनाडु में नए दौर की शुरुआत है.

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