समाजवादी पार्टी के समर्थकों की अखिलेश-मुलायम जंग पर क्या है राय?

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लखनऊ में इटौजा गांव के रहने वाले 62 साल के नन्हेलाल यादव के लिए इस बात की कोई अहमियत नहीं है कि समाजवादी पार्टी का चुनाव निशान साइकिल पार्टी के किसी गुट को मिलता है या नहीं.

वो कहते हैं कि वोट जिसे देने का मन बना लेंगे, उसे ही देंगे, चुनाव निशान से कोई फ़र्क नहीं पड़ता.

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नन्हेलाल कहते हैं, "चुनाव निशान अखिलेश यादव को मिलना चाहिए. वो युवा हैं, मुलायम सिंह को ख़ुद ही पार्टी का नेतृत्व अखिलेश को सौंप देना चाहिए, इस पचड़े में पड़ना ही नहीं चाहिए."

वहीं मौजूद सुदर्शन कुमार लंबे समय से समाजवादी पार्टी के समर्थक रहे हैं लेकिन पार्टी में चल रहे झगड़े को वो पार्टी के लिए शुभ संकेत नहीं मानते.

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Image caption सुदर्शन कुमार

वो कहते हैं, "पार्टी में जो कुछ हो रहा है इसका नुक़सान तो उसे होगा ही, चाहे जो हो जाए. साइकिल निशान मिले या न मिले, आम मतदाता इस झगड़े से खुश नहीं है. उसे ये सब बिल्कुल अच्छा नहीं लग रहा है. पब्लिक समझदार है."

उत्तर प्रदेश में सत्तारूढ़ समाजवादी पार्टी के भीतर चल रहे संकट का मामला अब चुनाव आयोग की चौखट पर पहुंच चुका है. दोनों ही गुटों ने आयोग में अपने- अपने पक्ष में तर्क और प्रमाण प्रस्तुत कर दिए हैं और सभी को अब आयोग के फ़ैसले का इंतज़ार है.

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लेकिन चुनावों की घोषणा के बाद पार्टी कार्यकर्ताओं में जिस तरह भ्रम की स्थिति है, आम मतदाता भी इसे लेकर हैरान है. ऐसी भी आशंका है कि चुनाव आयोग पार्टी के चुनाव निशान साइकिल को किसी गुट को देने की बजाय फ्रीज भी कर सकता है, यानी अपने पास रख सक सकता है.

ज़ाहिर है, ऐसे में मतदाताओं, ख़ासकर पार्टी समर्थक मतदाताओं में इस बात को लेकर भ्रम ज़रूर रहेगा कि वो किसे वोट दें. लेकिन इलाहाबाद के कैलाशपुरी मोहल्ले की विमला यादव के विचार इस मामले में स्पष्ट हैं.

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Image caption विमला यादव

वो कहती हैं, "कोई भी निशान हो, हमें पता तो चल ही जाएगा. पर्ची देने जो लोग आएंगे, वो बता ही देंगे कि किस निशान पर कौन लड़ रहा है. इससे अखिलेश को साइकिल मिले या कोई और निशान, फ़र्क नहीं पड़ता."

लेकिन कैलाश पुरी के ही युवक राहुल यादव मुलायम परिवार में चल रहे वर्चस्व की लड़ाई से खुश नहीं हैं.

उनका कहना है, "अखिलेश ने पिता को हटाकर अच्छा नहीं किया. मुलायम के समर्थक उन्हीं को वोट देंगे चाहे उनके पास साइकिल निशान हो या कुछ और."

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राहुल कहते हैं कि समाजवादी पार्टी की पहचान मुलायम सिंह से है, न कि किसी अन्य नेता से या चुनाव निशान से. ऐसे में मुलायम सिंह यादव जिधर रहेंगे, समर्थक उसी को वोट देगा.

लेकिन जानकारों का कहना है कि चूंकि लड़ाई परिवार के बीच है और इस पार्टी का समर्पित मतदाता एक ख़ास समुदाय का होता है, ऐसे में दो खेमों में बँटने से नुक़सान होना तय है.

लखनऊ में वरिष्ठ पत्रकार राधेकृष्ण कहते हैं, "समाजवादी पार्टी भले ही पूर्ण बहुमत से 2012 में सत्ता में आई हो लेकिन उसका समर्पित मतदाता अभी भी ज़्यादा संख्या में गांवों में ही रहता है. हालांकि अखिलेश समर्थक दावा कर रहे हैं कि उनको नया चुनाव निशान मिलता है तो उसका भी वो जन-जन तक प्रचार कर लेंगे, लेकिन ग्रामीण मतदाताओं तक उसे पहुंचा पाना और उन्हें समझा पाना इतना आसा नहीं है."

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Image caption राहुल कुमार

राधेकृष्ण कहते हैं कि पार्टी का चुनाव निशान बदलने से दोनों ही गुटों को नुक़सान होना तय है.

बहरहाल साइकिल निशान का फ़ैसला तो चुनाव आयोग आने वाले कुछ दिन में कर देगा, लेकिन इस निशान के होने या न होने से समाजवादी पार्टी को हुए राजनीतिक नफ़ा- नुक़सान का फ़ैसला तो जनता ही करेगी.

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