नज़रिया: 'रोहित वेमुला की बेचैनी कोई समझना नहीं चाहता'

  • 17 जनवरी 2017
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रोहित वेमुला की ख़ुदकुशी को एक साल बीत गया. सभाएँ हो रही हैं, जुलूस निकलेंगे. लेख भी लिखे जा रहे हैं.

क्या हम इस आत्महत्या की ज़िम्मेदारी महसूस करते हैं या उससे पीछा छुड़ाना चाहते हैं? बीते एक साल के दौरान जो प्रतिक्रिया हुई है, उसने हमारे समाज और राजनीति के फूहड़पन, असभ्यता, संकीर्णता, बेहिसी और बेरहमी को और उजागर कर दिया है.

विश्वविद्यालय प्रशासन ने सरकारों के पीछे मुँह छिपा लिया. सरकारें यह साबित करने में लग गईं कि रोहित वेमुला की ख़ुदकुशी को इसलिए ख़ास नहीं माना जाना चाहिए कि वह दलित था ही नहीं.

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यह आत्महत्या हमें हिला न पाती, अगर उस ख़बर के साथ हम वह नोट न पढ़ते जो रोहित ने आत्महत्या के पहले लिखा था. रोहित इस नौजवानी में ही अपने माहौल से निराश हो गया था. एक ख़ालीपन उसे महसूस हो रहा था.

अपने भीतर की सारी मानवीय संभावना को सिर्फ़ एक पहचान में शेष कर दिए जाने का दर्द. एक आज़ाद दिल और दिमाग़ के तौर पर क़बूल न किए जाने की तकलीफ़.

रोहित ने लिखा कि अकेलेपन से उसका दम घुट रहा था और अब यह अहसास इतना तीखा हो उठा था कि जीते रहने के कोई मायने नहीं रह गए थे.

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एक हिंदू विश्वविद्यालय परिसर में रहने के बाद सिर्फ़ हिंदू नहीं रहता, एक मणिपुरी सिर्फ़ मणिपुर का नहीं रह जाता, एक दलित अपनी पहचान को और विस्तार दे पाता है. लेकिन रोहित के ख़त ने याद दिलाया कि हमारे शिक्षा संस्थान इसके उल्टा काम कर रहे हैं. वे पहचानों के बीच रास्ते बनाने की जगह उनके इर्द-गिर्द ऊँची दीवारें खड़ी कर रहे हैं.

विश्वविद्यालय हम सबको अपने अकेलेपन का सामना करने और उससे बाहर निकलने में मदद भी करते हैं. या उन्हें ऐसा करना चाहिए. रोहित का विश्वविद्यालय इसमें नाकाम रहा.

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रोहित की आत्महत्या को सांस्थानिक हत्या कहा गया है. रोहित ने ख़ुदकुशी के फ़ैसले के लिए किसी शख़्स या संस्था को ज़िम्मेदार नहीं ठहराया. लेकिन आत्महत्या के पहले और उसके बाद उसके विश्वविद्यालय ने जो सलूक किया, वह व्यक्ति के प्रति संस्थान की उदासीनता की क्रूरता का सिर्फ़ एक उदाहरण है.

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सिर्फ़ विश्वविद्यालय नहीं, राज्य सरकार और केंद्र सरकार ने जो रुख़ लिया, उससे भी ज़ाहिर हुआ कि किसी आत्मपरीक्षण और पश्चात्ताप की जगह, अपनी ज़िम्मेवारी क़बूल करने के बजाय, जो मारा गया, उसे ही बदनाम करके वे ख़ुदकुशी की गंभीरता को ख़त्म कर देना चाहती हैं.

राज्य सरकार और केंद्र सरकार का पूरा ज़ोर यह साबित करने पर है कि रोहित दलित नहीं था, कि रोहित की माँ ने झूठ बोलकर अनुसूचित जाति का प्रमाण पत्र ले लिया था. इशारा यह है कि रोहित को तो क़ायदे से विश्वविद्यालय में होना ही न था, कि उसने झूठे जाति प्रमाणपत्र से फ़ायदा उठाया. सरकारी तंत्र की पूरी ताक़त एक औरत के ख़िलाफ़ इस्तेमाल की जा रही है जिसका वह जवाब नहीं दे सकती.

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रोहित की आत्महत्या के बाद के साल ने साबित किया है कि समाज के भीतर की विभाजन रेखाओं को गहरा करने में ही हमारी दिलचस्पी है. दलित समुदाय को अगर यह लग रहा है कि ग़ैर दलित समाज की सहानुभूति उथली है और उसमें ईमानदारी नहीं है, तो क्या यह उनकी कल्पना मात्र है? दलित को सिर्फ़ और सिर्फ़ क़ानूनी इकाई में घटा कर उसके प्रति अपने रवैए की जाँच करने से क्या यह साबित नहीं होता कि सुविधाप्राप्त समुदाय मात्र अपनी सुविधाओं की रक्षा में जुटा है?

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रोहित की मौत क़ुदरती न थी. इसीलिए रोहित की माँ राधिका की माँग इंसाफ़ की है. एक बड़े समूह को भय है कि न्याय की इस खोज में वह कहीं अभियुक्त और अपराधी साबित न हो. इसलिए इंसाफ़ की इस माँग को ही ग़लत साबित करने की कोशिश की जा रही है.

रोहित वेमुला की मौत आख़िरकार सिर्फ़ एक दलित सवाल बनकर रह गई है. रोहित का पत्र इस पूरे घटनाक्रम पर एक विडंबनापूर्ण व्यंग्य है. वह अपनी पहचान को संकुचित कर दिए जाने और उससे पैदा हुए एकाकीपन से जूझने में अपनी नाकामयाबी क़बूल करता है और इस ज़िंदगी से इस्तीफ़ा देने का एलान करता है. लेकिन उसकी इस बेचैन उदासी को महसूस कर पाने के हम क़ाबिल नहीं, यह हमने साबित किया है.

रोहित की आत्महत्या के पहले अख़लाक की हत्या, उसके बाद झारखंड में मोहम्मद मज़लूम और इनायतुल्लाह ख़ान की हत्या और गुजरात में दलितों की बेरहम पिटाई से भी साबित हुआ है कि भारत दलितों और मुसलमानों के लिए असुरक्षित बना हुआ है. राज्य, व्यापक राजनीतिक वर्ग, समाज में हमसाएपन के अहसास की कमी से मालूम होता है कि समाज स्वस्थ नहीं है.

रोहित वेमुला ने हमारी मदद करने की कोशिश की थी. नाइंसाफ़ी, हमदर्दी की कमी की बाढ़ ख़तरे का निशान पार कर गई है, वह उसमें डूबते हुए हमें बताने की कोशिश कर रहा था. वह पानी इस एक साल में और ऊपर चला गया है और हमने ख़ुद को उससे बचाने के उपाय नहीं किए हैं.

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रोहित ने लिखा था, "शायद मैंने ही दुनिया को समझने में ग़लती की है. प्रेम, दर्द, ज़िंदगी और मौत को समझने में. (मैंने पाया कि इन मामलों में) किसी को कोई जल्दी न थी. शायद मैं ही हड़बड़ी में था."

रोहित की इस छटपटाहट को समझने की कोई जल्दी आज भी नहीं दीखती.

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