धर्म नापसंद तो अपराध जायज़ ठहराना कितना सही?

  • 17 जनवरी 2017
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मुंबई हाई कोर्ट ने एक आदमी की हत्या के दो दोषियों को ज़मानत देते हुए कहा है कि, "मरनेवाले शख़्स की ग़लती सिर्फ़ ये थी कि वो दूसरे धर्म का था."

शेख़ मोहसिन की हत्या का ये मामला जून 2014 का है जब सोशल नेटवर्किंग साइट फ़ेसबुक पर छत्रपति शिवाजी सहित कई हस्तियों की आपत्तिजनक तस्वीरों की ख़बरें आने के बाद महाराष्ट्र के पुणे शहर में हिंदू राष्ट्र सेना ने एक बैठक की.

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कोर्ट के ऑर्डर के मुताबिक, बैठक में भड़काऊ भाषण दिए गए जिसके बाद कई लोग हथियारों से लैस होकर शहर में घूमने लगे.

शेख़ मोहसिन और उनके दोस्त को दाढ़ी और कुर्ते में देखकर उनपर हमला किया गया जिसमें मोहसिन की मौत हो गई.

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सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील राजीव धवन के मुताबिक मुंबई हाई कोर्ट के जज के फ़ैसले में ज़ाहिर की गई राय उनके अधिकार-क्षेत्र से बाहर की बात है और निंदनीय है.

ज़मानत पर फ़ैसला सुनाते हुए मुंबई हाई कोर्ट की जज मृदुला भटकर ने कहा है कि, "दोनों आरोपियों की मोहसिन से ना जाति दुश्मनी थी ना ही उनका कोई आपराधिक रिकॉर्ड है, ऐसा लगता है कि उन्हें धर्म के नाम पर उकसाया गया था."

फ़ैसले में जज ने कहा कि, "मरनेवाले शख़्स का दूसरे धर्म का होना आरोपियों के हक़ में जाता है."

राजीन धवन के मुताबिक, "ये कहना कि किसी व्यक्ति का धर्म उसपर हमला करनेवाले आदमी के अपराध को सही ठहराने की दलील हो सकती है, एकदम ग़लत होगा, क्योंकि ये तो ऐसा कहना होगा कि हिटलर का यहूदियों को मारना ठीक था क्योंकि उसे उनका धर्म नापसंद था."

मानवाधिकार वकील रेबेक्का जॉन के मुताबिक भी जज का इस तरह राय देना सही नहीं है.

बीबीसी से बातचीत में उन्होंने कहा, "ज़मानत तो मामले के सभी पहलुओं को देखकर दी जाती है, उसे देना या ना देना जज के हाथ में है लेकिन धर्म और भड़काने पर इस तरह की राय देना बहुत परेशान करनेवाला है."

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इस मामले में गिरफ़्तार किए लोगों में से 11 को पिछले डेढ़ साल में ज़मानत मिल चुकी है. हालांकि उस दिन भड़काऊ भाषण देने वाले मुख़्य आरोपी की ज़मानत साल 2015 में ही ख़ारिज की जा चुकी है.

राज्य सभा सांसद और आपराधिक वकील माजिद मेमन के मुताबिक ऐसा तर्क पहले कभी इस्तेमाल नहीं किया गया.

उन्होंने कहा, "धर्म को आधार बनाकर ज़मानत देना अजीब है, अगर इस फ़ैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई तो ये पलट सकता है."

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